सब केहू के प्रणाम,
हमार काम, हमार जॉब अईसन बा की साईट साईट जा के निरिक्षण करे के, देखे के आ मैनेजमेंट के एह बात से आगाह करावे के कवन काम कईसन चल रहल बा, कान्हा कान्हा गड़बड़ी बा, कईसे ओयिमें सुधार लावल जा सकत बा आ साथे साथे मैनेजमेंट के guidelines भा सरकारी नियम के कवनो उल्लंघन होत पवले पर साईट के इन्टरनल नोटिस देवे के ..एही सिलसिला में तथाकथीत विकाश के गाथा कहत आ फिलहाल में प्रांत के मुखिया पर कुपोषण के वजह पर तर्क से परे आ विवादास्पद बयान देवेवाला प्रांत के ही एगो साईट पर हाल में ही जाए के मौक़ा मिलल...बाकी सब के अलावा जवन एगो चीझ हमरा उन्हा देखे के मिलल ओयिमें कुछ बाल श्रमिक भी नजर अईलन (हालांकि उ काम काफी कम शारीरिक श्रम के रहे ), हम ओह लोगन के फोटो प्रूफ खातीर खिंच लेहनी आ एगो सहकर्मी के उपस्थिति में ही ठेकेदार के खरी खोटी सुनवनी की भाई एह तरह के अपराध काहे करत बाड़? खैर उ त तुरत फुरत ओन्हनी के ओह बेरा साईट से निकाल देहले...फेर सुपरवाईजर जी के बारी रहे..हम उनुकरा से पूछनी की भाई रउवा काहे ना ध्यान देहनी..उ कहलन की का करी महाराज..हम त कहते बानी लेकिन इ सब सुनते नईखे..एक हाली निकाल देहले रहनी त सगरो मिल के कामे के बंद क देहलन स..हम कहनी की चली राउर बात मान भी लेत बानी, त इ बतायी की अबगे उ हमार बात कईसे मान गईल ह...उ कहलन की रउवा आईल बानी एक-दू दिन ला..आ इ उहो बुझत बा.. हेने रउवा जाएम आ होने उ काम शुरू क दिही..हम कहनी की काहे? उ कहलन की का करेम एह लोग के आजीविका के इहे साधन ही बा...अब या त काम करेवाला मजूर मिलते नईखन आ यदि मिळत बाडन त उ एतना गरीब बाडन की जबले मरदे मेहरारू लईका फईका सभे ना कमाई तलेले एह मंहगी के दौर में गुजर मुश्किल बा..
खैर हम त उनुकरा के समझा बुझा के निकल लेहनी..लेकिन हमरा दिमाग में एगो बात कौंधे लागल...इ कवन विकास के माडल हमनी के परोस रहल बानी जा..जन्हवा अमीर औरी अमीर होत जात बाडन आ गरीब औरी गरीब...एक तरफ विकास दर में बढ़ोत्तरी हो रहल बा, पर कैपिटा इनकम में बढ़ोत्तरी हो रहल बा त दुसरे ओर कुपोषण आ भुखमरी में कमी के बजाय इजाफा ही हो रहल बा....................
फेर ध्यान आईल श्रम कानून पर..उ इ त प्रावधान कर रहल बा की चौदह बारिश से कम उम्र के लईका, लईकी के काम पर लगावल जुर्म बा..लेकिन सामाजिक सुरक्षा आ संरक्षण के का? सामाजिक संरक्षण से जुडल स्कीम के धरातल आ खासकर जरूरतमंद तक पहुंचल आजो बाकी ही बा.....आजादी के आन्दोलन के समय शायद इहे सपना हर भारतीय अपना आँखी में पलले होयिहन की गैर बराबरी दूर होई सबके सामजिक आ आर्थिक संरक्षण मिली...लेकिन ओह दिशा में आज साठ पैंसठ साल बाद भी हमनी के सफलता मिल पायिल बा? आजो मंत्री जी संतरी जी, कलेक्टर साहेब, बी डी ओ साहेब जनता के सेवक कम आ मालिक जादा बाडन...आजो सामजिक सुरक्षा के नाम पर भारत केतना पिछडल बा उ गरीबी आ कुपोषण के शिकार मरे वाला लोगन के आंकड़ा, किसानन के आत्महत्या, गरीबी के कारण अशिक्षा, भुखमरी के कारण बालश्रम.....आदि इत्यादि बतला रहल बा........
का चाय के दोकान पर चाय देवेवाला छोटू के आँखी के कवनो सपना देखे के अधिकार नईखे?....का ओह मईल गंजी के पीछे छुपल छोटू के दिल के कवनो अरमान नईखे? का ओह नन्हा हाँथ के तकदीर में खाली जूठन ही धोवे/उठावे के लिखल बा? का उ एह देश के कवनो अवैध नागरीक/संतान हउवन? का उनुकरा पढ़े-लिखे के अधिकार नईखे? का एयिमें ओह लईका के कवनो गलती बा की उ एगो गरीब माँ बाप के बेटा/बेटी भईलन? यदि ना त उनुकरा के बाकी लईकन, लईकीयन जईसन जीवन में आगे बढे के सामान अवसर काहे नईखे मिल पावत? काहे उनुकरा कवनो सामाजिक संरक्षण नईखे मिल पावत, जन्हवा उनुकरा दू पईसा कमाए के फिकिर ना होखो बलुक पढ़े लिखे के समय में उनुकरो पढ़े लिखे के सामान अवसर मिलो??........................
खैर मिली भी त कईसे? इंहवा त शिक्षा भी बिकाऊ बा आ कैरियर भी...शिक्षा के व्यवसायीकरण के एह दौर में सरकारी संरक्षण टिक भी कान्हा पाई? शिक्षा सीन्दीकेट के तोड़े के माद्दा एह राजनितिक इक्छाशाक्ती में कान्हा बा? जन्हवा खुदे राजनीतिज्ञ लोग एह व्यवसाय से फल फुल रहल बा लो....सामाजिक सुरक्षा आ संरक्षण के माद्दा केकरा में बा? कम से कम एह सामंतसाही सोंच से जनमल राजनितिक विरासत में त कत्तई ना.....
खैर तलेले रौवो सोंची, गुनी...आ हमहूँ सोंचत बानी...हमनी के का हमनी के आपन मन के भंडास एह कंप्यूटर के की बोर्ड तक ले ही नु बा? त निकल गईल नु भंडास...अब चली छोटुवा कीन्हा चाय पिये...चाय के तलब लागत बा...
जय भोजपुरी
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