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अक्सर मुझे अपने बचपन के दिन याद आते है। हर रात अपनी तन्हाईयों में अपने पुरे परिवार को याद करता हूँ। वो बचपन के दिन कितने हसीं थे जब मैं अपने पा, माँ, दी, और भाई के साथ रहता था। मेरा घर बिहार के एक छोटे से शहर पूर्णिया में है। छोटा सा सही पर हर कुछ मौजूद है वहां. वहां लोगों में प्यार है, एक दुसरे के लिए सम्मान है। छोटो में बड़े के लिए आदर है, बडो के मन में छोटों के लिए ढेर सारा आर्शीवाद। मोहल्ले में रहने वाला हर बच्चा अपने मोहाले के बच्चे-बच्चे को जानता है और यहाँ दिल्ली में मेरे मकान मालिक को शायद ही मेरा नाम याद हो। यहाँ दोस्त भी बनते है तो सिर्फ़ अपने मतलब के लिए या फ़िर जॉब के मजबूरी के लिए।
खैर ये सब तो अलग बात है। इस पर भी चर्चा करूँगा पर फ़िर कभी। अभी तो ख़ुद को, अपनी जिंदगी को याद कर रहा हूँ। उन बचपन के दिनों को याद कर रहा हूँ जब हम सब एक साथ रहते थे। जब हमारा एक छोटा सा खुबसूरत घर हुआ करता था और आज वो एक घर चार मकानों में बदल गया है। जहाँ अब हम पॉँच लोग अलग-अलग अकेले अपनी जिंदगी जीते है।
समय के साथ सब कुछ बदलता चला गया। 1२वि के बाद अपनी higher study के लिए सबसे पहले मैंने अपना घर छोड़ा। अपनी study पुरी की और अब दिल्ली में एक अदद नौकरी कर रहा हूँ। Graduation के बाद दीदी ने घर छोड़ा ताकि पत्रकारिता की शिक्षा हासिल कर सके और आज वो भी रायपुर में एक प्रतिष्ठित news channel के लिए काम कर रही है। मेरे भाई ने १२वि की और आज biotechnology की पढाई के लिए फगवारा, पंजाब में है। पीछे घर पर रह गए अकेले मेरे पा और माँ।
सालों बीत गए पा के साथ बैठकर राजनीती पर बात किए हुए। याद नही कब मैंने उनसे सुबह लेट सोकर उठने के लिए, exams में कम number लेन के लिए, स्कूल-कॉलेज में बदमाशियां करने के लिए डांट सुने हुए। कितना समय गुजर गया माँ को पा के डांट से मुझे बचाए हुए। याद नही कब प्यार से उनके साथ बैठकर गर्म-गर्म दो रोटियाँ खायी थी। सालों बीत गए जब दीदी के साथ लड़ाई नही हुई। आठ साल बीत गए उसके हाथों से राखी बंधवाए हुए। यूँ तो हर साल हाथों में ढेर सारी राखियाँ होती है पर उन राखियों की भीड़ में अपनी दीदी की राखियों को आँखें ढूँढती ही रह जाती है। न जाने कितने समय गुजर गए भाई के साथ क्रिकेट खेले हुए। रोज रात उशे math के सवाल समझाते समय पिटाई करते हुए। सालों बीत गए मुझे जिंदगी जिए हुए।
लगभग आठ साल हो गए एक घर के टुकड़े हुए। पहले एक के दो फ़िर तीन और अब चार। पर क्यों? आख़िर क्यों हम इतने दूर है अपनी जिंदगी से? लोग कहते है हम अपनी जिंदगी बनाने आए है पर मुझे तो लगता है मैंने अपनी जिंदगी ही खो दी। कभी-कभी सोंचता हूँ मैं क्यों हूँ यहाँ। पैसे कमाने के लिए? क्या उन पैसों से मुझे पा का प्यार, माँ की ममता, मेरी दी की राखी और भाई का साथ मिल सकता है? क्या पैसे मेरी माँ की तबियत ख़राब होने पर उनकी देखभाल कर सकता है? क्या जब पा परेशान होंगे तो पैसे उनकी परेशानी दूर कर सकते है? क्या मैं पैसों से अपने लिए एक और दी ला सकता हूँ? क्या मैं पैसों के साथ क्रिकेट खेल सकता हूँ?
आख़िर हमें क्यों इतने पैसे चाहिए? दिल्ली में जहाँ मैं रहता हूँ थोडी ही दूर पर मजदूरों की एक बस्ती है। जब उनके तरफ़ देखता हूँ तो वो मुझे मुझसे कहीं ज्यादा धनी नजर आते है। गरीबी में ही सही वो अपने परिवार के साथ तो रहते है।
मुझ जैसे करोड़ों लोग है जो इसी तरह अपने परिवार से दूर है सिर्फ़ पैसे कमाने के लिए। कुछ अपनी इक्छा से, कुछ अपने परिवार की ख्वाहिश पुरी करने, किसी के साथ अपने परिवार का पेट भरने की मजबूरी है तो किसी को बंगले और कार का शौक है। दूर रहने का नतीजा ये होता है कि लोगों के मन से धीरे-धीरे भावनाए ख़त्म होती जाती है और वो अपने ही परिवार से मीलों दूर होते जाते है। पर ये पैसों के अंधी दौड़, पलायनवादिता कब जाकर ख़त्म होगी बस यही देखना है…
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on February 19, 2010 at 6:02pm
Comment by Rajnish Kumar Singh on February 19, 2010 at 6:18pm
Comment by CHANDAN SINGH on February 19, 2010 at 7:55pm
Comment by jitendra rs chauhan on February 19, 2010 at 8:53pm
Comment by mrs. saroj on February 19, 2010 at 9:14pm
Comment by शशि कुमार सिंह (SHASHI) on February 20, 2010 at 12:45am
Comment by Rajesh Kumar on February 20, 2010 at 12:23pm
Comment by Ashok Kumar on February 20, 2010 at 4:48pm © 2013 Created by Admin.
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