संपूर्ण संस्कृति की देवी के रूप में दूध के समान श्वेत रंग वाली सरस्वती (Saraswati Devi) के रूप को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वाग्देवी को चार भुजायुक्त व आभूषणों से सुसज्जित दर्शाया गया है। स्कंद पुराण में सरस्वती (Saraswati Devi) जटाजुटयुक्त, अर्धचन्द्र मस्तक पर धारण किए, कमलासन पर सुशोभित, नील ग्रीवा वाली एवं तीन नेत्रों वाली कही गई हैं। रूप मंडन में वाग्देवी का शांत, सौभ्य व शास्त्रोक्त वर्णन मिलता है।
बसंत पंचमी (Basant Panchami) के पर्व को मनाने का एक कारण बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन सरस्वती जयंती का होना भी बताया जाता है। कहते हैं कि देवी सरस्वती (Saraswati Devi) बसंत पंचमी के दिन ब्रह्मा के मानस से अवतीर्ण हुई थीं। बसंत के फूल, चंद्रमा व हिम तुषार जैसा उनका रंग था।
बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन जगह-जगह माँ शारदा की पूजा-अर्चना की जाती है। माँ सरस्वती (Saraswati Devi) की कृपा से प्राप्त ज्ञान व कला के समावेश से मनुष्य जीवन में सुख व सौभाग्य प्राप्त होता है। माघ शुक्ल पंचमी को सबसे पहले श्रीकृष्ण (shri krishna) ने देवी सरस्वती (Saraswati Devi) का पूजन किया था, तब से सरस्वती पूजन (Saraswati Pujan) का प्रचलन बसंत पंचमी (Basant Panchami) के दिन से मनाने की परंपरा चली आ रही है।
सरस्वती (Saraswati Devi) ने अपने चातुर्य से देवों को राक्षसराज कुंभकर्ण से कैसे बचाया, इसकी एक मनोरम कथा वाल्मिकी रामायण के उत्तरकांड में आती है। कहते हैं देवी वर प्राप्त करने के लिए कुंभकर्ण ने दस हजार वर्षों तक गोवर्ण में घोर तपस्या की। जब ब्रह्मा वर देने को तैयार हुए तो देवों ने कहा कि यह राक्षस पहले से ही है, वर पाने के बाद तो और भी उन्मत्त हो जाएगा तब ब्रह्मा ने सरस्वती (Saraswati Devi) का स्मरण किया।
सरस्वती (Saraswati Devi) राक्षस की जीभ पर सवार हुईं। सरस्वती (Saraswati Devi) के प्रभाव से कुंभकर्ण ने ब्रह्मा से कहा- 'स्वप्न वर्षाव्यनेकानि। देव देव ममाप्सिनम।' यानी मैं कई वर्षों तक सोता रहूँ, यही मेरी इच्छा है। इस तरह देवों को बचाने के लिए सरस्वती और भी पूज्य हो गईं।
You need to be a member of JaiBhojpuri.com to add comments!
Join JaiBhojpuri.com