भोजपुरी भाषाई परिवार के स्तर पर एक आर्य भाषा है और मुख्य रुप से पश्चिम बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी झारखण्ड के क्षेत्र में बोली जाती है। भोजपुरी हिन्दी की एक उपभाषा या बोली है। भोजपुरी अपने शब्दावली के लिये मुख्यतः संस्कृत एवं हिन्दी पर निर्भर है कुछ शब्द इसने उर्दू से भी ग्रहण किये हैं। भोजपुरी जानने-समझने वालों का विस्तार विश्व के सभी महाद्वीपों पर है जिसका कारण ब्रिटिश राज के दौरान उत्तर भारत से अंग्रेजों द्वारा ले जाये गये मजदूर हैं जिनके वंशज अब जहाँ उनके पूर्वज गये थे वहीं बस गये हैं। इनमे सूरिनाम, गुयाना, ट्रिनिदाद, फीजी और टोबैगो आदि देश प्रमुख है। भारत के जनगणना आंकडो़ के अनुसार भारत मे लगभग 3.3 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं। पूरे विश्व मे भोजपुरी जानने वालों की संख्या लगभग 5 करोड़ है।
डॉ0 ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं को अंतरंग ओर बहिरंग इन दो श्रेणियों में विभक्त किया है जिसमें बहिरंग के अंतर्गत उन्होंने तीन प्रधान शाखाएँ स्वीकार की हैं -
(1.) उत्तर पश्चिमी शाखा
(2) दक्षिणी शाखा और
(3) पूर्वी शाखा।
इस अंतिम शाखा के अंतर्गत उड़िया, असमी, बँग्ला और बिहारी भाषाओं की गणना की जाती है। बिहारी भाषाओं में मैथिली, मगही और भोजपुरी - ये तीन बोलियाँ मानी जाती हैं। क्षेत्रविस्तार और भाषाभाषियों की संख्या के आधार पर भोजपुरी अपनी बहनों मैथिली और मगही में सबसे बड़ी है।
भोजपुरी भाषा का नामकरण बिहार राज्य के आरा (शाहाबाद) जिले में स्थित भोजपुर नामक गाँव के नाम पर हुआ है। पूर्ववर्ती आरा जिले के बक्सर सब-डिविजन (अब बक्सर अलग जिला है) में भोजपुर नाम का एक बड़ा परगना है जिसमें "नवका भोजपुर" और "पुरनका भोजपुर" दो गाँव हैं। मध्य काल में इस स्थान को मध्य प्रदेश के उज्जैन से आए भोजवंशी परमार राजाओं ने बसाया था। उन्होंने अपनी इस राजधानी को अपने पूर्वज राजा भोज के नाम पर भोजपुर रखा था। इसी कारण इसके पास बोली जाने वाली भाषा का नाम "भोजपुरी" पड़ गया
भोजपुरी भाषा प्रधानतया उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों ओर बिहार राज्य के पश्चिमी जिलों में बोली जाती है। उत्तर प्रदेश के वाराणसी, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती जिलों के निवासियों ओर बिहार राज्य के शाहाबाद, सारन, चंपारन जिलों में रहनेवाली जनता की मातृभाषा भोजपुरी है1 इसके अतिरिक्त कलकत्ता नगर में, बंगाल के "चटकलों" में असम राज्य के चाय बगानों में और बंबई के अंधेरी और जोगेश्वरी नामक स्थानों में लाखों की संख्या में, भोजपुरी लोग निवास करते हैं। इतना ही नहीं, मारिशस, फिजी, ट्रिनीडाड, केनिया, नैरोबी, ब्रिटिश गाइना, दक्षिण अफ्रीका, बर्मा (टांगू जिला) आदि देशों में काफी बड़ी संख्या में भोजपुरी लोग पाए जाते हैं।
भोजपुरी की प्रधान बोलिया:--
(1) आदर्श भोजपुरी,
(2) पश्चिमी भोजपुरी और
(३) अन्य दो उपबोलियाँ (सब डाइलेक्ट्स) "मघेसी" तथा "थारु" के नाम से प्रसिद्ध हैं।
आदर्श भोजपुरी
जिसे डॉ0 ग्रियर्सन ने स्टैंडर्ड भोजपुरी कहा है वह प्रधानतया बिहार राज्य के आरा जिला और उत्तर प्रदेश के बलिया, गाजीपुर जिले के पूर्वी भाग और घाघरा (सरयू) एवं गंडक के दोआब में बोली जाती है। यह एक लंबें भूभाग में फैली हुई है। इसमें अनेक स्थानीय विशेताएँ पाई जाती है। जहाँ शाहाबाद, बलिया और गाजीपुर आदि दक्षिणी जिलों में "ड़" का प्रयोग किया जाता है वहाँ उत्तरी जिलों में "ट" का प्रयोग होता है। इस प्रकार उत्तरी आदर्श भोजपुरी में जहां "बाटे" का प्रयोग किया जाता है वहाँ दक्षिणी आदर्श भोजपुरी में "बाड़े" प्रयुक्त होता है। गोरखपुर की भोजपुरी में "मोहन घर में बाटे" कहते परंतु बलिया में "मोहन घर में बाड़े" बोला जाता है।
पूर्वी गोरखपुर की भाषा को गोरखपुरी कहा जाता है परंतु पश्चिमी गोरखपुर और बस्ती जिले की भाषा को "सरवरिया" नाम दिया गया है। "सरवरिया" शब्द "सरुआर" से निकला हुआ है जो "सरयूपार" का अपभ्रंश रूप है। "सरवरिया" और गोरखपुरी के शब्दों - विशेषत: संज्ञा शब्दों- के प्रयोग में भिन्नता पाई जाती है।
बलिया (उत्तर प्रदेश) और सारन (बिहार) इन दोनों जिलों में आदर्श भोजपुरी बोली जाती है। परंतु कुछ शब्दों के उच्चारण में थोड़ा अंतर है। सारन के लोग "ड" का उच्चारण "र" करते हैं। जहाँ बलिया निवासी "घोड़ागाड़ी आवत बा" कहता है, वहाँ छपरा या सारन का निवासी "घोरा गारी आवत बा" बोलता है आदर्श भोजपुरी का नितांत निखरा रूप बलिया और आरा जिले में बोला जाता है।
पश्चिमी भोजपुरी
जौनपुर, आजमगढ़, बनारस, गाजीपुर के पश्चिमी भाग और मिर्जापुर में बोली जाती है। आदर्श भोजपुरी ओर पश्चिमी भोजपुरी में बहुत अधिक अंतर है। पश्चिमी भोजपुरी में आदर सूचक के लिये "तुँह" का प्रयोग दीख पड़ता है परंतु आदर्श भोजपुरी में इसके लिये "रउरा" प्रयुक्त होता है। संप्रदान कारक का परसर्ग (प्रत्यय) इन दोनों बोलियों में भिन्न भिन्न पाया जाता है। आदर्श भोजपुरी में संप्रदान कारक का प्रत्यय "लागि" है परंतु वाराणसी की पश्चिमी भोजपुरी में इसके लिये "बदे" या "वास्ते" का प्रयोग होता है।
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