Come, let's do something for Bhojpuri...
करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
अयोध्या काण्ड (३ रा किस्त)
चौपाई-
कहलस लँउड़ी मुँह बिजुका के। का डाँटेलू तू हमरा के।।
हम त रहब लौंड़िये बन के। भोगे के ना बा ये धन के।।
केहू होई राजा-रानी। हम पँहुचायब दतुअन पानी।।
झंखऽ तू अपना दिनवा के। सौतिन के सुख के सनवा के।।
कवन दुरगती तोहर होई। बेटा अनकर जूता ढोई।।
तूँ सवतिन के हुकुम बजइहऽ। छोड़न-छाड़न सबके खइहऽ।।
जे पर चढ़ जाला सरसतिया। नीक न लागे नीमन बतिया।।
जे मन भावे ऊहे करिहऽ। जिनगी भर अनके बह भरिहऽ।।
तहरा खातिर मुदई बानी। तऽ इहँवा से हम जा तानी।।
ना तहरा लगवा हम आयब। ना कवनो बतिया बतिआयब।।
दोहा-
चलल मंथरा तमक के, लपक धरेली बाँह।
सूरसती के फेर में, लगली करे सलाह।।१८।।
चौपाई-
कतनो जतन करी अब कोई। अनके पूत न आपन होई।।
बोलेलिस बतिया ई ठीके। लागेला सब बात सटीके।।
रहित न मन में छाँका-पाँजा। सूने कार न नधते राजा।।
बेटा हमरो बाड़े ममहर। इहँवा होता उत्सव लमहर।।
कहलस लँउड़ी तब समुझा के। बइठऽ कोप भवन में जाके।।
जब्बे राजा लगवा अइहें। तहरा से कूछो बतिअइहें।।
मँगिहऽ आपन दूनू बरवा। बन जाई सब तोहर करवा।।
भरत तहर राजा बन जइहें। बन में राम निकारल जइहें।।
आह कोप में तूँ मत परिहऽ। माँगे में तनको मत डरिहऽ।।
बतिया बइठल बड़ा सठाने। गइली कोप भवन वर आने।।
दोहा-
वादा देहल राम के, लागल परे इयाद।
ठान-ठून हठ में लगल लउके बड़ा सवाद।।१९।।
चौपाई-
कोप भवन में रानी गइली। सनकहिया के रुपवा धइली।।
नीमन लूगा फेंक-फाँक के। फाटल चीटल टाँक-टाँक के।।
गहना गुरिया सजी हटवली। माथा के जूड़ा छितरवली।।
बइठेली ऊ भुँइया जा के। कोना में माथा निहुरा के।।
खुसी बहुत दसरथ के बाटे। मन में जवन कहीं ना आँटे।।
भवन केकई के ऊ गइले। धिधिआइल घर में घुसिअइले।।
सून-सान सब लगे बिछावन। लउकेला घरवा भकसावन।।
कहँवा बाड़ू रूप कुमारी। मिरिगनयनी हमर हितकारी।।
हाली हमरा सोझा आवऽ। आपन सुग्घर रूप दिखावऽ।।
अवसर नीमन आइल बाटे। मन हमरो अगराइल बाटे।।
दोहा-
सोझा आवऽ बइठ के तनी करीं जा बात।
सुख बरसी ये महल में जइसे बीती रात।।२०क।।
मिलली जब ना केकई, भइलें तनिक उदास।
पुछलें दासी से तुरत रहे जे घर के पास।।२०ख।।
चौपाई-
कहलस दासी सोचत मन में । रानी बाड़ी कोप भवन में।।
का जाने का मन में धइली। काहें कोप भवन में गइली।।
सुनते कोप भवन के बतिया। राजा के पथराइल मतिया।।
तुरते कोप भवन में जा के। केकई के लगे खड़िया के।।
कहलें हे सुग्घर सुकुमारी। काहें दहलू रूप बिगारी।।
लुगरी-फटरी धारन कइलू। काहें कोप भवन में अइलू।।
बोलऽ के का तोहर लेहल। के तहरा के दुखवा देहल।।
बोलऽ के के देस निकारीं। बोलऽ केकर माथ उतारी।।
राजा जे के कहऽ बना दीं। जेके कहऽ भीख मँगवा दीं।।
प्रान हमर बा तहरा बस में। नेह तहर दउरे नस-नस में।।
दोहा-
किरिया खा के राम के बोली ने ई बात।
कहऽ तवन कऽ दीं अबे, बीत न पाई रात।।२१।।
चौपाई-
रानी कहली तब दुखिता के। तोख न दीं अब बात बना के।।
दिनवा आपन अगिला जानी। ऊहे रूप बनवले बानी।।
बेसी मत हमके फुसिलाईं। बड़को के अब लगवा जाईं।।
अब हम रहब सदा बन दासी। ना जिनगी के मिटी उदासी।।
बेटा के सुख में महतारी। देली सब सुख अपन बिसारी।।
बेटा बनिहें हमर टहलुआ। घर में रहब हमू उठेलुआ।।
ई ना हमसे देखल जाई। देहब आपन जान गँवाई।।
मुँह बाई दसरथ के घइलस। अइसन के चलुआई कइलस।।
के रानी के मतिया फोरल। के मनवा में माहुर घोरल।।
पकड़ केकई के ऊ कोरा। लगलें उनके करे निहोरा।।
दोहा-
केकई कहली सुन लीं, हमर बात महराज।
बरवा हमरो पहिलका, दे दीं रउआ आज।।२२क।।
गादी सौंपी भरत के, लेके उहे समान।
उहे मुहूरत घरी में, होखे जबे बिहान।।२२ख।।
चौपाई-
दीं दोसर बर हमर सजनवा। रामचनर के भेजीं बनवा।।
चौदे बरिस रहें ऊ बन में। पहिर मुनि के बस्तर तन में।।
आगे जइसन समय बुझाई। फेरू ओके देखल जाई।।
सुनत बात दसरथ थहरइलें। काटल गाछ निअर गिर गइले।।
ई का तूँ कह दहलू रानी। मछरी कइसे तेजी पानी।।
देहब राज भरत के हँस के। छोड़ल राम न बाटे बस के।।
बिन उनके हो जायब अइसे। मनी बिना मनिआरा जइसे।।
जीअल हमर काल हो जाई। जान न केहू हमर बँचाई।।
मनवा के अपना समुझावऽ। उल्टा मत तूँऽ जोर लगावऽ।।
दोसर बर तूँ कवनो मागऽ। फँसरी में परान मत टाँगऽ।।
तुरत केकई हाथ झार के। कहली मनवा तनिक मार के।।
हमरा दोसर कुछ ना चाहीं। ना देहब तऽ कह दीं नाहीं।।
दोहा-
हम जानत रहनी हईं, रउआ मन के हाल।
मँगला पर होखे लगी, येही तरे सवाल।।२३क।।
फँसरी गरे लगाइके देहब आपन जान।
रउआ जा के नरक में पायब तब असथान।।२३ख।।
मान मनौअल करत में, बीतन सगरी रात।
हठवा ना तनको हटल, बनल न कवनो बात।।२३ग।।
चौपाई-
होत परात करत तइयारी। जूटल भीर दुआरे भारी।।
सोरे सुग्घर सजल कुँआरी। आ खड़िअइली माह दुआरी।।
चार दाँत के हाथी सुग्घर। खड़ा भइल आ के दुअरा पर।।
कलस हजारन में जल आइल। सोभे ओपर दीप बराइल।।
आइल नया तीन बघछाला। उज्जर छत्तर मड़िअन वाला।।
दीब हार सब गहना गुरिया। कुसल गवैया सुघर पुतुरिया।।
किसिम-किसिम बाजा बजवैया। हाथी घोड़ा रथ लड़वैया।।
पूजा सुरू भइल मंदिर के। लगली सजी अपसरा थिरके।।
भारी बा उल्लास नगर में। मंगल होखेला घर-घर में।।
भइल लोग के बा हैरानी। दसरथ जी लउकत ना बानी।।
दोहा-
जा के तुरत सुमंत जी, लगलें करे पुकार।
निकली राजा महल से, लेके राजकुमार।।२४।।
चौपाई-
सुन पुकार राजा ना अइले। तब सुमंत जी कुछ घबड़इले।।
जब सुमंत जी गइले भीतर। नजर परल राजा दसरथ पर।।
रहें मुखुड़िया उहो पटाइल। काटल भथुआ अस छितराइल।।
काहें हाल भइल बा अइसन। सोच पकड़ले बा ई कइसन।।
केकई कहेली समुझा के। थाकल बानी हमू उठा के।।
छन-छन नाव राम के रटके। रात बितवनी उलट पलट के।।
का जाने का सोचऽ तानी। बेसुध इहाँ पटाइल बानी।।
जा के भेजीं रामलला के। ले जइहें अब उहे चला के।।
तुरत मंतरी डेग बढ़वले। रघुबर के सब हाल सुनवले।।
सुनते भइलें राम तयारी। गइले जँह बपसी महतारी।।
दोहा-
पाँव पकड़ के पिता के, कहलें खोली आँख।
बाबूजी बोलीं तनी, कवन बात के माख।।२५।।
चौपाई-
दसरथ जी के अँखिया खूलल। भगती में करुनारस घूलल।।
लागल बहे लोर के धारा। पलकन से छूटल पवनारा।।
निकसत नइखे मुँह से बोली। ताकेलें बस अँखिया खोली।।
केकई कहेली फरिया के। कारन सगरे सही सुना के।।
बतिया तोहर बन जाये के। कारन बाटे दुखिताये के।।
चाहे इनकर लाज बँचावऽ। चाहें हमरो गला दबावऽ।।
करऽ उहे जे मन के भावे। जइसन तोहर धरम बतावे।।
कहलें रघुबर तब सरिया के। पूत धरम के बात बता के।।
बिन कहले पितु इच्छा पाले। ऊहे उतीम पूत कहाले।।
कहला माफिक जे कर पावे। मधीम पूत उहे कहलावे।।
कहल बात जे करे न बेटा। समझी ओके बिस्टा नेटा।।
दोहा-
आजे हम बन में चलब, बना मुनी के भेस।
तिलक दिआई भरत के, बनिहें उहे नरेस।।२६।।
चौपाई-
तीन बेर परिकरमा कइले। फेर पिता के पँउआ धइले।।
तब फफकत बोलेले राजा। बेटा तनी गोद में आ जा।।
तुरत राम गोदी में गइले। दसरथ उनके बँहिया धइले।।
कहलें तूँ हकवा मत छोड़ऽ। लाज सरम से नाता तोड़ऽ।।
जेठ पूत तँू हउअऽ कुल के। भागऽ मत हक आपन भुल के।।
हक ना आपन छोड़ल जाला। छोड़े जे कादर कहलाला।।
बाड़ऽ गादी के अधिकारी। कुछ ना केहू तहर बिगारी।।
परजा जब तहरा के चाहें। बोलऽ बन तूँऽ जइबऽ काहें।।
छोड़ऽ तू मन के कदराई। हमरा के बान्ह बरीआईं।।
गादी जा के तुरत सँभारऽ। राज काज आपन सइहारऽ।।
दोहा-
कहलें राम विचार के, सुन बपसी के बात।
निकल ताटे मोह बस, बतिया राउर तात।।२७।।
फेरू आगे....
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on November 2, 2012 at 1:11am गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी
शब्दन के सुनर सटीक भाव आ ओइसही प्रवाह । भक्ति के रस मे अतना सरल भाव बहुत कम पढे के भेटाला , शब्द अईसन जईसे आरी कगरी कहाला खुद कहेला आदमी आ ओह के माने अईसन जईसे की आपुसे मे बतियावत होखे आदमी ।
राम जी त बस आपन हो गईल बुझाता की अयोध्या , हमनी के सोझा के बात ह ।
जय भोजपुरी
guru ji god lagile |
ek baar fin man gadgad ho gail raur ashirvad pake |
bahut sunnar guru asahi hamani par kirpa barsawat rahi |
feru palaggi ba |
jai bhojpuri
Comment
© 2013 Created by Admin.
You need to be a member of JaiBhojpuri.com to add comments!
Join JaiBhojpuri.com