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करुनाकर रमायन : अयोध्या काण्ड (१ ला किस्त)

जय स्री सीताराम
रामजी के किरपा से करुनाकर रमायन के बालकांड रउआ सभे के सामने परोस के हम रखनी। हमरा भाव के रसोई सब के नीक लागल ई जान के मन गदगद हो गइल बा। हौसला बढ़ला से आगे के कथा परोसे के मन बन गइल बा। अब हम अयोध्या कांड परोस के सबके सोझा भेज रहल बानी। जइसन लागे वइसन विचार आवे के चाहीं। 
जय भोजपुरी।

अयोध्या कांड के महातम

कुंडलियाँ-
गुरु चरनन के धूर से चित चित्ती कऽ साफ
सुमिरीं सकती धाम के मिले जहाँ इन्साफ
मिले जहाँ इन्साफ सही सरनागत सब के
गलती होला माफ कली ना आके हबके
माया धऽ के देंह रचावेली जे दुनिया।
पसरावेली नेह बरम के बन दुलहिनिया।।१।।

दोसर सीढ़ी मुकुति के हऽ जवन हरिदुआर
उहे अजोधा कांड हऽ रघुबर के दरबार
रघुबर के दरबार बरम के डाँड़ कहाला
सुख के जँह भरमार, हमेसा पावल जाला
बरतराज गुनगान महातम के ओ गावे।
बरमा करें बखान उहे बतिया दुहरावे।।२।।

दोहा-
कहले बरमा सुनऽ अब नारद दे के ध्यान।
महिमा भारी अवध के सुनते मिले तरान।।३।।

चौपाई-
दूसर सीढ़ी मुकुती वाला। हरिदुआर ईहे कहलाला।।
जँह पहाड़ से उतरे धारा। मुकुती के कहलाय किनारा।।
रिसी मुनिन के जमघट लागे। सगरे दूख दरीदर भागे।।
त्याग हवे मुकुती के साधन। मिले अजोधा में ई छन-छन।।
जिउआ के ई ग्यान सिखावे। जीये के रस्ता बतलावे।
मोह छोह हऽ गर के फँसरी। काटे अवध रोग के रसरी।।
परसन होली तीनू माया। करें जीव पर हरदम दाया।।
संतन के सहजोग मिलेला। धिर बुधिया के राह खुलेला।।
सुमन खिले समता के मन में। रस आवे नीरस जीवन में।।
भव के सुख से मनवा भागे। अधयातम सुख अच्छा लागे।।
इरसा के आगी बुझ जाला। डाह रहे ना डाहे वाला।।
संतोसे में सुख झलकेला। परमानंद अवध ई देला।।

दोहा-
भगवन के भगती मिले जीवन में सुख चैन।
दरसन होखे राम के, खुले गुपुत सब नैन।।४।।

चौपाई-
मन में अनुपम आस्था जागे। सत करमन में मनवा लागे।।
मन में बइठल भरम भगावे। नियम धरम के रूप दिखावे।।
लालच के सोखेला पानी। होखे ना दे कवनो हानी।
बढ़े प्रेम जीवन में पलपल। करुना जल छलकेला छल-छल।।
करम कठोर न होखे देला। अवध विपत सगरे हर लेला।।
कथा अवध के जे गावेला। सिवजी के किरपा पावेला।।
मन में भाव भरे अस ऊँचा। काटे चिन्ता फिकिर समूचा।।
लोभ छोभ सगरे खतमावे। कांड अजोधा के जे गावे।।
दुरलभ ना कुछऊ रह जाला। कांड अजोधा जहाँ कहाला।।
नेह देंह से इहे हटावे। अविरल भगती मन में लावे।।
बिसवसवा के हऽ ई थाती। नर जीवन के सही सँघाती।।
खड़ा रहे के सकती देला। कमजोरी सगरे हर लेला।।
डाँड़ कसत मंजिल मिल जाला। टूटत डाँड़-हाड़ छितराला।।
जे अन्हे में डाँड़ चलावे। ओके अवध राह पर लावे।।

दोहा-
कांड अजोधा धरम हऽ राखे खुलल दुआर।
बाँचे जे सरधा सहित, होखे तुरत उधार।।५।।

जय स्री सीता राम

...............

करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
अयोध्या कांड (१ ला किस्त)

 कुंडलियाँ-

राम कथा जे कहेला रखत राम से नेह
गिरिजा के सँघ गिरिपर रहे बना के गेह
रहे बना के गेह देंह पर भसम रमावे
गरे साँप विसकंठ चनरमा माथे भावे
जटवा में जे गंग हाथ में डमरू ले ले।
भाँज-भाँज तिरसूल भगत के पीर हरेले।।१।।

विनय करीं महदेव के सँघही उनके राम
बिचरे जे सीता सहित नीक अजोधा धाम
नीक अजोधा धाम काम सब करें भगत के
राखें लीलाधाम बना के पुरा जगत के
समझ राम के काम हाथ व्रतराज बटावें।
रघुबर रहे उदार हिया के बेसी भावें।।२।।

दोहा-
राम कथा बिस्तार से, सुने लगा जे ध्यान।
मरजी से महदेव के, हरदम हो कल्यान।।३।।

चौपाई-
सीता के सँघ राम विराजें। पतनी सँघ सब भाई गाजें।।
पूत पताहू घर में अइले। दसरथ के मन हरसित भइले।।
हरसित बाड़ें महल निवासी। मगन बहुत बाड़ें पुरबासी।।
होखेला घर-घर में चरचा। होता बहुत खुसी में खरचा।।
हाँड़ी छूवे के दिन आइल। सबहर सबके भोज दिआइल।।
सीता जी कहली समुझा के। पंघत लागी विप्र जेंवा के।।
उहे बराम्हन खइहें पहिले। जे केहू घर ना हो खइले।।
दान कबो ना होखे लहले। खीस कबो ना होखे सहले।।
पहिले ओकर चरन पुजाई। पाछे होई भोज खवाई।।
बाभन ऊ लगले तलसाये। पहुँचे जे दसरथ घर खाये।।

दोहा-
खोजत-खोजत लोक में, मिलले तब लंकेस।
बिनती सँघ पहुँचल उहाँ, सिय के सुखद सनेस।।४।।

चौपाई-
सुन के रावन सोचे लागल। मन में ग्यान अलौकिक जागल।।
कहलस मन में बात विचारी। आयब हम होके तइयारी।।
माई के जब किरपा भेंटी। मन के सगरे चिन्ता मेटी।।
पंडित के ऊ भेस चढ़वलस। भाग सराहत डेग बढ़वलस।।
भइल तयारी पुरा भोज के। आइल सब सामान खोज के।।
रावन अवध समय पर आइल। राजा से कहलस हरसाइल।।
पहिले जब दछिना पा जायब। तब पाछे हम कवर उठायब।।
दसरथ जी बहुते हरसा के। बचन सुनवले हाथ उठा के।।
माँगऽ रावन पुरा हुलस के। देहब सब जे बाटे बस के।।
रावन बोलल मधुरी बानी। इच्छा अपन बतावऽ तानी।।
ना कवनो धन संपत चाहीं। लेहब राउर समरथ नाहीं।।
खाली करब राम से बतिया। कुछ सीता के जानब मतिया।।

दोहा-
बात अकेले में करब, अलग-अलग बइठाय।
केहू से बतिया कइल, केहू जान न पाय।।५क।।
दसरथ कहलें ठीक बा, जइसन तहर बिचार।
ब्राम्हन खातिर खुलल बा, सगरे इहाँ दुआर।।५ख।।

चौपाई-

रावन रघुवर से बतिअवलस। मिलते ऊ अरदास लगवलस।।
राकस जोनी छूटे जइसे। परी करे के रउआ वइसे।।
कहिया अब हमरा के तारब। बान उठा के हाथे मारब।।
पहिले ई बतिया बतलाईं। फेरू चाहें जवन कराईं।।
कहले राम बताईं का हम। बा ईहो रुपवा पुरुसोतम।।
बिना खसूरे कइसे मारब। कइसे तोहर कार सँवारब।।
रावन कहलस तब सरिया के। करब कार हम अइसन जाके।।
रउआ मारे के पर जाई। केहू नाहीं दोस लगाई।।
रघुवर कहलें ई कऽ देहब। तहरे खातिर धनुहा लेहब।।
ईहो बात न केहू जानी। साँच-साँच बतलावऽ तानी।।

दोहा-
रावन तब खुस होइके, गइल सिया के पास।
हाथ जोड़ खड़िआईके, फेरू भइल उदास।।६क।।
छन में कहलस सोच के, सुनी ध्यान से बात।
माई हम रउआ सँघे, करब कबो ना घात।।६ख।।

चौपाई-
परी करेके हमर भलाई। ऊ सहजे ना होखे पाई।।
बिना उठवले मन में संका। परी चले के रउआ लंका।।
पहिले सुखद सनेस पठायब। तब पाछे ले जाये आयब।।
वादा पहिले हमसे कऽ दीं। तब पीढ़ा चैका में धऽ दीं।।
सीता कहली ईहो होई। करब कार सुख आपन खोई।।
रावन भोज कचर के खइलस। तब उहँवा से लंका गइलस।।
अवध पुरा अगराइल लउके। सुख के समुद समाइल लउके।।
भोजन कऽ कऽ लोग अघाइल। दसरथ जी के जिया जुड़ाइल।।
हीत नात सब घरवा गइले। सोहरत सुनत कान अघइले।।
लगले चले भरत के मामा। ओढ़ पहिर के जोड़ा जामा।।

दोहा-
घुलल मिलल रहले बहुत, लइकन में जुधजीत।
अलगे होखत देख के, उछड़े लगल पिरीत।।७।।

चौपाई-
जुधाजीत कहलें दसरथ से। बोलीने हमहूँ स्वारथ से।।
जायब जो भगिनन के त्यागी। जात अकेले मन ना लागी।।
भरत अउर सतरोहन जाके। चल अइते हमके पहुँचा के।।
कुछ दिन सँघ हमरा रह जइते। ममहर के आनंद उठइते।।
भरत लाल से कहलें दसरथ। सरिया लऽ तूँहू आपन रथ।।
मामा के चल जा पहुँचावे। ममहर से आसिस लेआवे।।
सतरोहन के ले लऽ साथे। घुम आवऽ ममहर ये लाथे।।
खुस होके ई दूनू भाई। चल दहले घूमे पहुनाई।।
येन्ने पूरा अवध नगर में। चरचा होखेला घर-घर में।।
राजा जोग राम हो गइले। दसरथ जी अब बहुत बुढ़इले।।

दोहा-
दे देते जो राम के ऊ सब आपन भार।
होखित सबसे नीक ई, सबका खातिर कार।।८।।

 फेरू आगे.....

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Tags: Ayodhyakand, Bhojpuri, Karunakar, Ramayan, vikal, vratraj, अयोध्याकांड, करुनाकर, भोजपुरी, महाकाव्य, More…रमायन, विकल, व्रतराज

Comment by sanjay panday on October 12, 2012 at 10:58am

guru ji god lagatbani |

baht sunnar rachana milal sacho man gadgad ho gail ba |

ayodhya kand ke suruat bahut sunnar bhail |

raur apan kirpa banavale rahi |

feru se parnam |

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on October 12, 2012 at 4:47pm

गुरु जी गोड लागत बानी 

करुणाकर रामायन के अगिला डेग अयोध्या कांड मे प्रवेश कईला प बहुत बहुत बधाई बा आ अयोध्या कांड के शुरुवात बेजोड रहल , भाव से भरल महिमा बतावत बहुत कुछ सीखावत सांचो एक दम बेजोड बडुवे । 

जय  भोजपुरी 

Comment by Rajnandan singh on October 16, 2012 at 3:21pm

आदरणीय गुरुजी,

सादर प्रणाम

हलाकि कहे में बहुत संकोच हो रहल बा मगर हमरा बुझात बा कि

"खोजत-खोजत   लोक में,    मिलले तब लंकेस।
बिनती सँघ पहुँचल उहाँ, सिय के सुखद सनेस।।४।।" से लेके

"रावन रघुवर से बतिअवलस। ...........     साँच-साँच बतलावऽ तानी।।

  परी करेके हमर भलाई।.. …......…........करब कार सुख आपन खोई।। "

तक के प्रसंग अयोध्या कांड के कथा में जुड़ला से राम आ सीता दुनो चरित्र के महिमा हानि आ मुख्य कथा के स्वभाविकता में कमी संभावित बा। बाकि राम कथा के विद्वान रउवा बानीं  जइसन उचित बुझी जारी रखीं। बड़ी बेसब्री से ग्रंथ पुरा होखे के इंतजार बा।

धन्यवाद आ क्षमा याचना सहितः- राजनन्दन

Comment by Vratraj Dubey 'Vikal' on October 17, 2012 at 9:06pm

प्रिय राजनन्दन बाबू,
भगवान के आसीस रउआ सीस पर सदा बनल रहे।
रउआ अइसन सुधी पाठक के पा के हमार मन गदगद हो गइल बा। आँख मून के कवनो बात मान लेहल ठीक ना होला। कवनो चीज जबले तनी रगराला ना तबले ओमें निखार ना आवेला। राउर विचार करुनाकर के कथा में निखार लावे खातिर येगो सुग्घर हथियार बन के हमरा सोझा आइल बा।
कवनो कथा के दूगो रूप होला। येगो भीतरी आ येगो बाहरी। भीतरी कथा साँच कथा हऽ आ बाहरी कथा ओकर लीला कथा हऽ। रामकथा ये बेरा ले जेतना लिखाइल बा सब लीला कथा हऽ। रामकथा के सुरुआत स्रिस्टी के सँघही भगवान सिव से रामे जी करवले बानी। येकर चरचा अध्यात्म रामायन के उत्तर कांड के 9वाँ सर्ग में कइल गइल बा। जवना कथा के लिख के सिव जी अपना मानस में धऽ लेहनी संसार के जीव के कल्यान खातिर उहे कथा अध्यात्म रामायन हऽ। जवन भगवाने के अवतार महरसी ब्यास जी लिपि के सरूप दहले बानी। ओही रामायन में राम आ रामकथा के सही सरूप के कुछ बरनन बा। बाकी अउर कथा छछात लीला कथा हऽ। जेतना रामकथा बा सबके घटना आ मदजाद में बड़ा फरक बा। भगवान राम के सही सरूप के जबले दरसन ना होई तबले रामकथा कहला आ सुनला के कवनो परभाव ना होला। ईहे कारन बा कि रामायन के पोथी हर घर में पावल जाता बाकिर ओकर परभाव कहीं लउकत नइखे। येही दुख के निवारन खातिर करुनाकर रमायन के रचना के जरूरत परल। करुनाकर रमायन में राम आ रामकथा के सही सरूप सरिआवे के कोसिस कइल गइल बा।
रामकथा के बहुत अंस दोसरा-दोसरा ग्रंथन में पावल जाला। रामकथा के कुछ अंस लोककथा में घुसिआइल बा। हाड़ी छूअे आ रावन के अजोधा में आवे के कथा भोजपुरी धरती के लोककथा में सुने के मिलल बा। येही से कहल बा ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता।’ ये कथा के करुनाकर कथा में घुसिया के आगे जोरे वाला तार के मजबूत बनावल गइल बा। राम आ सीता के चरित्र येतना व्यापक आ साफ सुथरा बा कि ओमें दाग लागिये नइखे सकत। जहाँ ले रावन के अइला अउर बतिअवला के बात बा उहाँ कथा के गहीराई में जाये के परी। जब कथा के गहिराई में जाइल जाई तऽ राम, सीता आ रावन में कवनो भेद नजर ना आई। येही से नू तुलसी बाबा कहले बानी- ‘‘सियाराममय सब जग जानी। करहू प्रनाम जोर जुग पानी।’’ रावन के जीवनी भगवान के पारसद से सुरु होता आ राम के हिरदय में समा के अंत होता।
राम के सिवा ये संसार में दोसर कुछ हइये नइखे-
रामे से संसार बा रामे के संसार।
रामे में संसार बा रामे बा आधार।।

जय भोजपुरी जय भोजपुरिया।

Comment by Rajnandan singh on October 18, 2012 at 8:40am

आदरणीय गुरुजी,
सादर प्रणाम,
राउर असिरवाद पा के हम धन्य भइनीं। शंको समाधान भइल। किरपा करि के आगहुं आपन सनेह बनवले रखीं।
"करुणाकर रामायण" चुकि भोजपुरी साहित्य के एगो महान उपलब्धि बने जा रहल बा, शुभेच्छा इहे बा कि अब तक अलगा-अलगा भाषा में जेतना भी रामायण लिखल गइल "करुणाकर रामायण" सभनी पर बीस पड़े। तुलसी बाबा गिरहस्थ ना होके संत रहलें एह से उनुकरा "श्री रामचरित मानस" में ईश्वर महिमा आ सुभाषित के प्रधानता जरुर बा मगर ओह घड़ी के स्थानीय सामाजिक रिति-रिवाज, रहन-सहन आ लोक परंपरा के पर्याप्त वर्णन रहि गइल जवन कि अब "करुणाकर रामायण" में देखे के मिलि रहल बा। भोजपुरी चुकि मिथिला आ अवध दुनो भाषा संस्कृति के बीच के सेतु क्षेत्र ह, एह से ई अपेक्षा आउर बढ़ जाता कि "करुणाकर रामायण" भोजपुरी महाकाव्य के संगे-संगे रामायण काल से लेके अब तक चलल आ रहल सतत् भारतीय संसकृति आ लोक परंपरा के एगो महत्वपूर्ण दस्तावेज ग्रंथ भी साबित होई। शुरुआत हो गइल बा तऽ परभु किरपा से ई जरुर होई, होके रही।

धन्यवाद - राजनन्दन

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on October 18, 2012 at 10:17pm

गजब , आनन्द आ गईल राजनन्दन जी आ गुरुजी के बतकही पढि के । 

सांचो बहुत बेजोड जानकारी आ भाव देखे के भेटाईल । 

जय भोजपुरी 

Comment by Manoj Kumar on October 19, 2012 at 5:12am

प्रणाम आ जय भोजपुरी.

करुनाकर रामायन के अयोध्या कांड में प्रवेश कईला पर बधाई. पहिलके किस्त में कुछु नया चिझु देखे आ पढे के मिलल, जे पहिले कहीं ना पढे के मिलल रहे. राजनंदन जी के शंका वाजिब रहे, जेकर समाधान भी गुरुजी से मिल गईल. कहल जा सकेला कि एह करुनाकर रामायन के रूप में हमनी के भोजपुरी के एगो मौलिक आ श्रेष्ठ साहित्य के साछात दर्शन हो रहल बा.

 

जय भोजपुरी !

Comment by Vratraj Dubey 'Vikal' on October 19, 2012 at 2:28pm

प्रिय राजनंदन बाबू,
करुनाकर भगवान के किरपा रउआ पर सदा बरसत रहे।

मन में कवनो भाव जगावल, ओकरा अनुसार कार के सरिआवल, मरजादा के बढ़ावल आ मरजादा के घटावल सब भगवाने जी कराईने। हमरा विचार से राउर विचार येतना हाली मिल गइल ईहो भगवाने जी के किरपा बा। करुनाकर रमायन के रचना- हर मरजादा के ध्यान, हर समस्या के समाधान आ हर जीव के कल्यान के उदेस से भइल बा।
कथा निरमान के सिलसिला में हमरा जवन कुछ पढ़े के मौका मिलल बा ओकर सार इहे भेंटाइल बा कि स्रिस्टी के सुरुआत ओम से, ओम के सुरुआत राम से, भासा के सुरुआत भोजपुरी से, आ स्रिस्टी के पहिलका सरूप के दरसन भोजपुरिया माटी पर भइल बा। स्रिस्टी के पहिलकी नदी गंडक, पहिलका पत्थर सालीग्राम, पहिलका देवता सिव जी आ पहिलका कथा रामकथा हऽ। भोजपुरिये माटी से पहिलका ग्यान, सभ्यता संस्कार के अभियान आ संसकिरती के पहचान सुरू बा। येही कारन से भोजपुरी में करुनाकर रमायन लिखे के परेरना मिलल।
जेकरा-जेकरा ये करुनाकर रमायन के देखे-पढ़े के अवसर मिलता ओकरा से हमार ईहे अरज बा कि ये रमायन में जहाँ कवनो भाव खटके तऽ निधड़क ओपर आपन विचार देहल जाव। रउआ सब के विचार से हमरा कार में सदा निखार आई। ये रमायन से सगरे भोजपुरिया समाज के मरजादा जुरल बा।

जय भोजपुरी जय भोजपुरिया।

Comment by Rajnandan singh on October 22, 2012 at 3:46am

आदरणीय गुरुजी, सादर प्रणाम

परम संतोष मिलल, मार्ग दरसनो भइल। किरपा बनवले रहीं धन्यवाद आ शुभकामना सहित- राजनन्दन

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