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लौह पथ गामिनी को देखो , कर रही हवा से बातें ।

रेलगाड़ी
लौह पथ गामिनी को देखो , कर रही हवा से बातें ।
तेल और बिजली से चलती , नहीं देखती दिन रातें ।
जाती रहती हर कोने में , सब लोग सफर में जाते ।
खाना पीना है घर जैसा , खुशी खुशी वापस आते ।
देखो ये कितने लोगों का , दाना पानी लाती है ।
लोहा लकड़ या चिट्ठी पाती , पल भर में ले जाती है ।
कोयले पर चलने वाली , बिजली से अब चलती है ।
गाँव हो या वयस्त शहर हो , रोज दौड़ती रहती है ।
कितने लोगों को दे रोटी, कितनो का करे गुजारा ।
साधु संत या भिखारी हो , सब को दे रही सहारा ।
जिस दिन जाने से मना करे , बड़ी होती परेशानी ।
वर्मा रेलगाड़ी की महिमा , जो ही गया वो बखानी ।
श्याम नारायण वर्मा

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Tags: KAVITA

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