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"कसहूँ गाँव से सहर के पलायन रुक पाईत "

हमारे गांव मे आज एक और घर पे ताला लग गया । पिता पुत्र पुत्रवधु छोटे छोटे बच्चो समेत   पिछले हफ्ते सभी लोग शहर के लिये पलायन कर गये । पुछने पे एक जन ने क्या कहा कि "  
हिहिस रहल ह गांव प रहे के ना त खेती बारी मे कुछ धईल बा बेकारे मे पईसा आ टाईम दुनो जिआन होता  , शहर मे जाई त दु पईसा बचईबे करी आदमी ".......हमारे मुह से केवल " हँ "  निकला ..(नवीन भोजपुरिया)
......
काल फेसबुक पर "नवीन भाई" के इ  स्टेटस  पढनी और इ  विषय  सोचे पर  मजबूर कर दिहलस कि आखीर का कारण बा जे गाँव से सहर के तरफ पलायन  हो रहल बावे .?.ओही सम्बन्ध में कुछ विचार आईल हा मन में ........................
 
 
 
गावं में अब का रह गईल बा? जे रहता उहे जानी
कवनो कम दुर्दसा गावं के नइखे इ रौउआ सभे  मानी !!

 

अस्पतालन के उजडल छपर, टूटल छानी बा

टुटहा कल,भखड़ल ईनार के मटईल पानी बा !!

 

भायं भायं करत सुनसान रस्ता बा

पाठशाला के हालत बहुते  खस्ता बा !!

 

चौउपाल  पर अब गाय गोरु के डेरा बा

खाली घरन में चमगादड़न के बसेरा बा !!

 

हक हिस्सा खातिर भाई भाई में दुश्मनी बा

नात रिश्तेदारी कहे के रह गईल तनी मनी बा !!

 

पहिले जे सुनात रहे कजरी ,चईता ,बिरहा ठाँव ठाँव

अब चमेली बाई और हलकट जवानी के सोर बा गाँव गाँव !!

 

किसानन के उपज के कमाई से बेसी घाटा बा

सुविधा के नाम पे जीरो बटा सन्नाटा बा !!

 


कवनो अनचीन्ह से केहू ना पूछे नांव  गाँव

जोहले ना मिली अब कउअन  के काँव काँव !!

बेटा सहर गईल बा पावे वेतन भत्ता

माई बाबू जोहत बाड़े उनकर आवे के रस्ता !!
 
आपन देस में सब गावं के अइसने हाल बा, इ बात ना बा
पंजाब, हरियाणा पछमी यु पी के गाँव,सहर से बेसी नीक बा !!
 
उहाँ "फारम हॉउस  वाले रिच फारमर"बाडन
हमरा इहाँ करज लिहल "मचान वाला किसान" बाडन!!
 
उहाँ के लोग सहर से खेती की ओर लौटत बा
सादी बियाह धूमधाम से फार्म हाउस  में करत बा!!
 
आपन प्रयास से सहर गावं के अंतर मिटा देले बा लोग
नया तकनीक,व्यावसयिक फसल के अपना लेले बा लोग !!
 
एके देस में ,एतना विषम अंतर काहें बा
एह विषय में बड़ा गहराई से सोचे के बा !!

कसहूँ गाँव से सहर के पलायन रुक पाईत
आपन गाँव गवई फेर से गुलज़ार हो जाईत !!
~s-roz~
"
जय भोजपुरी"

 

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Comment by Anoop Srivastava on September 25, 2012 at 3:22pm
बहिन जी प्रणाम,

बहुत नीमन रचना के जरिए रउआ पूरा खांका खीच देहले बानी ... ईहे सच बा, ईहे सवाल बा आ ईहे जवाब बा । ई एगो अइसन दुखद सच्चाई बा, जवना खातिर अफसोस जतइला के अलावा कौनो दूसर असान रस्ता नइखे लउकत .... हाँलाकि, अइसन हालात हर जगहि नाही बा । आजु जहँवा लोग मिलजुल के खेती आ लघु भा घरेलू उद्योग में समर्पित बा उहँवा परिणाम सामने बा, लोग में, कुछु कइला के सकारात्मक जज्बा होखे के चाही । कमी सोच में भी बा, खाली सरकार के कोसल ठीक नइखे । आजु देखल जा त एगो निमिन मध्यम वर्गीय भा गरीब आदमी पटेदारी के झगरा ले के थाना, पुलिस आ कोर्ट कचहरी ले पहुँचला में नइखे चूकत बाति जाहे खूँटा के होखे भा नाद के, अगर एतने जोर ऊ सरकारी योजना के अपना गाँव-जवार में पहुँचवला में चाहे कौनो काम-धाम में लगावे त कुछु मुश्किल नइखे ..... बस सोच के बदले के पड़ी आ शिक्षा पे जोर देवे के पड़ी .... धन्यवाद आ जय भोजपुरी ।
Comment by Brij Kishor Tiwari on September 25, 2012 at 8:34pm

जय भोजपुरी आ प्रणाम बहिन ........

केतना साँच बात रउवा लिखनी .........कौनो जवाब नईखे ..
बहुत सुन्दर चित्रण गाव से पलायन के ......

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 26, 2012 at 12:18am

बहिन प्रनाम आ जय भोजपुरी 

सांच आ एक दम साफ । माने इहे हाल बा गांव एक दम इहे हाल बा । 

सोचे के बात बा , लोग खलिहा लगी से पानी पिआवत बा , मुसीबत के जरि सोरि असल मे शहर आ शहरीपन के हर चीझ प कब्जा करे वाला ( सोच दिमाग से तन मन ले ) भाव सब केहु के मन डगमगावत बा । 

राउर कविता मय चीझु देखा रहल बा खेती बारी से ले के दरकत टुटत भुरकुस होत समाज के । 

बेजोड रचना ! 

Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 12:15pm

सरोज जी प्रनाम,

शायद एगो दुखात नस प राउआ हाथ रख देहले बानी। कुछु कहल बहुत कठीन बावे अउर समझ मे भी नईंखे आवत कि आखीर कही का? अभी कुछ दिन पहिले ही, टटके, ऊत्तर बिहार के कुछ जिलन के गाँव-गाँव मे अपना एगो पत्रकार संघतीया के संगे घुमे के मौका मिलल हवे। साँच पुछी त बुहत तबाही बा ओने...। मन उछीट जात बावे ऊ दशा देख के, अउर आदमी अपना आगा एगो अजीब अंधकार के महसुस करे लागत बावे।

ऐह कविता मे झलकत बावे ऊ सभ कुछ जवन अपना आँखी से देख के आईल बा आदमी। बाकीर...।  

Comment by Ashutosh Ranjan on September 27, 2012 at 11:09am
सरोज जी परनाम,

एगो दुखद सांच आ एगो निमन सन्देश देत राउर इ जबरदस्त रचना....

धन्यवाद,

जय भोजपुरी
Comment by Sudhir Kumar on September 30, 2012 at 3:57pm

सरोज जी, प्रणाम आ जय भोजपुरी,
वाकई, दिल के झकझोर देवे वाला अउर बहुत कुछ सोचे खातिर मजबूर करे वाला सवाल पर राउर ई सटीक विश्लेषण हमनी के सरकार, सामाजिक संस्था अउर हर ओह व्यक्ति पर सवाल उठा रहल बाटे, जेकरा एह हालात के बदले के जिम्मेदारी मिलल बाटे।

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