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अस्पतालन के उजडल छपर, टूटल छानी बा
टुटहा कल,भखड़ल ईनार के मटईल पानी बा !!
भायं भायं करत सुनसान रस्ता बा
पाठशाला के हालत बहुते खस्ता बा !!
चौउपाल पर अब गाय गोरु के डेरा बा
हक हिस्सा खातिर भाई भाई में दुश्मनी बा
नात रिश्तेदारी कहे के रह गईल तनी मनी बा !!
पहिले जे सुनात रहे कजरी ,चईता ,बिरहा ठाँव ठाँव
अब चमेली बाई और हलकट जवानी के सोर बा गाँव गाँव !!
किसानन के उपज के कमाई से बेसी घाटा बा
कवनो अनचीन्ह से केहू ना पूछे नांव गाँव
बेटा सहर गईल बा पावे वेतन भत्ता
Comment by Brij Kishor Tiwari on September 25, 2012 at 8:34pm जय भोजपुरी आ प्रणाम बहिन ........
केतना साँच बात रउवा लिखनी .........कौनो जवाब नईखे ..
बहुत सुन्दर चित्रण गाव से पलायन के ......
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 26, 2012 at 12:18am बहिन प्रनाम आ जय भोजपुरी
सांच आ एक दम साफ । माने इहे हाल बा गांव एक दम इहे हाल बा ।
सोचे के बात बा , लोग खलिहा लगी से पानी पिआवत बा , मुसीबत के जरि सोरि असल मे शहर आ शहरीपन के हर चीझ प कब्जा करे वाला ( सोच दिमाग से तन मन ले ) भाव सब केहु के मन डगमगावत बा ।
राउर कविता मय चीझु देखा रहल बा खेती बारी से ले के दरकत टुटत भुरकुस होत समाज के ।
बेजोड रचना !
Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 12:15pm सरोज जी प्रनाम,
शायद एगो दुखात नस प राउआ हाथ रख देहले बानी। कुछु कहल बहुत कठीन बावे अउर समझ मे भी नईंखे आवत कि आखीर कही का? अभी कुछ दिन पहिले ही, टटके, ऊत्तर बिहार के कुछ जिलन के गाँव-गाँव मे अपना एगो पत्रकार संघतीया के संगे घुमे के मौका मिलल हवे। साँच पुछी त बुहत तबाही बा ओने...। मन उछीट जात बावे ऊ दशा देख के, अउर आदमी अपना आगा एगो अजीब अंधकार के महसुस करे लागत बावे।
ऐह कविता मे झलकत बावे ऊ सभ कुछ जवन अपना आँखी से देख के आईल बा आदमी। बाकीर...।
सरोज जी, प्रणाम आ जय भोजपुरी,
वाकई, दिल के झकझोर देवे वाला अउर बहुत कुछ सोचे खातिर मजबूर करे वाला सवाल पर राउर ई सटीक विश्लेषण हमनी के सरकार, सामाजिक संस्था अउर हर ओह व्यक्ति पर सवाल उठा रहल बाटे, जेकरा एह हालात के बदले के जिम्मेदारी मिलल बाटे।
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