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करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (३० वाँ किस्त)
चौपाई-
कनिया सब बइठेली डोली। बिलखेली सखिया मुँहबोली।।
चिघरऽ ताड़ी मातु सुनैना। सुसुकेले सब सुग्गा मैना।।
जनक नयन से लोर चुवेला। नाजुक मन के कोर छुवेला।।
परिजन पुरजन रोअऽ ताड़े। बीज नेह के बोअऽ ताड़े।।
फाटऽ ताटे सभकर छाती। रोयेले सब जीव सँघाती।।
परकिरती के आँख भरल बा। घास-फूस पर ओस परल बा।।
पसिजल सब देवन के दिल बा। करुनामय संसार भइल बा।।
आवे जब बिछुरे के बेरा। टूटेला मनवा के डेरा।।
मनई के बन के कमजोरी। सरकेला पियार के डोरी।।
लछमी के जब ऊठल पउरा। लागेला मलीन जनकौरा।।
दोहा-
महल अटारी से लगे, सोभा भागल जाय।
फुलवारी के फूल सब, झुक गइल कुम्हिलाय।।२७०।।
चौपाई-
सब रानिन से मिले सुनयना। बिलख-बिलख बोलेली बयना।।
बेटी हमर आँख के पुतरी। कइसे अब अँखिया से उतरी।।
हई बड़ दुलार के जोगवल। जोखल हई फूल से पल-पल।।
हाथ जोर अरदास करीने। रउआ सभके पाँव परीने।।
इनकर भूल-चूक बिसरायब। बेटी निअर राख जोगायब।।
रउये सब महतारी बानी। हो गइनी हम आज बिरानी।।
कुल के नियम धरम सिखलायब। सबके अपना जोग बनायब।।
का बेटिन के करीं बड़ाई। समय परी तऽ सोझा आईं।।
बेटी जात बड़ा दुखियारी। छूटेला घर बाप-मतारी।।
होखेली बाकिर व्यवहारी। काम लगे ना कवनो भारी।।
दोहा-
जे जइसन जहँवा मिले, सभकर सुने बिचार।
सेवा सरधा से करें, कुल के करें सिंगार।।२७१।।
चौपाई-
दसरथ जी नेगी बुलववले। सबके जोग नेग बँटववले।।
पूज पुरोहित पनिहारिन के। धोबी नाई चुरिहारिन के।।
नोकर-चाकर सब बुलवा के। धन बस्तर सगरे सरिया के।।
देंहे-देंहे सब बँटववले। सभकर हियरा के जुड़ववले।।
हाथ जोर के माथ नवा के। दसरथ जी चलनी अजोधा के।।
चलल जनकपुर बा पहुँचावे। देत लुटावत जे मन भावे।।
उठली सब दुलहिन के डोली। सँघे चलल सखियन के टोली।।
पोंछे सब अँखिअन से पानी। अँखिया लउके गुल्लर खानी।।
जिअरा सबके भइले झाँझर। गाली पर कुहुकेला काजर।।
आपन सब सुध-बुध बिसरा के। डोली के सँघ चलें खिंचा के।।
दोहा-
गीत बिदाई के गुँजे, रीत नीत अनुसार।
छोह-मोह सब हिया के लागे करत चिघार।।२७२क।।
गीते में गा-गा सभे, धरम सिखावत जाय।
रखिहऽ कुल मरजाद के, कहें बात समुझाय।।२७२ख।।
चौपाई-
डोली जब सिवान पर आइल। धरती पर कुछ देर धराइल।।
मिलत-जुलत जलवा दिखलावत। वापस होली लोर बहावत।।
भर-भर अँखिया आँसू लेके। जनक न चाहेले लौटे के।।
दसरथ जी कहनी समुझा के। राज-काज देखीं अब जाके।।
नाता नेह लगल ना छूटी। ना परेम के डोरी टूटी।।
बाटे जवन नियम जिनगी के। परी करे के ऊ हमनी के।।
लोभ परनवा के हऽ बेसी। बाकिर हऽ ऊहो परदेसी।।
जिनगी के सुख हवे तियागे। आवेला ई सभका आगे।।
लोर पोंछ मन हलका कइनी। फेरू तब अँकवारी धइनी।।
लौटवनी बहुते समुझा के। अपने चलनी डेग बढ़ा के।।
दोहा-
आगे दूत पठाई के, पहुँचल अवध सनेस।
बहु बेटन से साथ में, आईने अवधेस।।२७३।।
चौपाई-
अगुआनी में जुटल अजोधा। लीप-पोत घर आँगन धो धा।।
भर-भर कलसा लगल धराये। डगर-डगर पर इतर छिटाये।।
रूप सजे लागल महलन के। सेज बिछे लागल फुलवन के।।
खड़िअइली सब गाय बिआइल। जीअत मछरी थार धराइल।।
टिका-फना के धोबिन अइली। माह दुआरी पर खड़िअइली।।
चउक-चउक पर बनल रँगोली। जवना रहिया आई डोली।।
लगे अवध सोभा के डासन। मोहित बा सँउसे इनरासन।।
किसिम-किसिम के बनल रसोई। जेकर जइसन इच्छा होई।।
रँग-रँग के आइल सब दउरा। परी पहिल दुलहिन के पउरा।।
मधुरे धुन सब बाजे बाजा। फहर-फहर सब फहरे धाजा।।
भाग-अवध के बा अगराइल। डोली सब दुअरा पर आइल।।
दोहा
तरसें सुरगन सरग के, देख अवध के भाग।
नंदन बन के सुमन में, लउकेला अनुराग।।२७४क।।
दउरा में पउरा परल, गउरा लगें निहाल।
धरे डेग जे ठीक से, सदा रहे खुसहाल।।२७४ख।।
दउरा भव सागर हवे, घूमें जेमें जीव।
थाह-थाह जे चलेला, भटके नाहीं टीव।।२७४ग।।
चौपाई-
घर में खनकल कँगना चूरी। दुलहिन सब पहुँचल देवकुरी।।
भइल सुआगत मंगल गा के। देव लोक झाँके हरसा के।।
दुलहिन सब के लगल बिछावन। भवन भइल बेसी मनभावन।।
साज सिंगार सुगन्ध सुहावन। ललित लाल लागे ललचावन।।
पहिले दुलहिन परिछल गइली। तब ऊ अपना महल समइली।।
लगल गलीचा बा फूलन के। सुख पहुँचावे जे चरनन के।।
बड़का-बड़का लागल अयना। टाँगल गइले तोता मयना।।
नेगी नेग निछावर पवले। दसरथ बहुते रतन लुटवले।।
पंडित सब के भइल बिदाई। बाँटल गइली दुधगर गाई।।
माइन में बा हरस समाइल। लछमी सब बा घर में आइल।।
दोहा-
तीनू माई खुसी से, अपन मनावें भाग।
अनके जामल धिया से। जूटल मन के राग।।२७५क।।
जागेला भगिया जबे, तबे जुटे ई नेह।
लछमी अनका गेहके, आवें अपना गेह।।२७५ख।।
चौपाई-
जहिया से सब दुलहिन आइल। सोच अजोधा के खतमाइल।।
खेले खुसी दुआरे अँगना। बजा-बजा पैजनिया कँगना।।
होते भोर बहुरिया जागें। सास-ससुर के पउँआ लागें।।
सासू आपन नेह दिखावें। बहुअन के कुल रीत सिखावें।।
सासू जानें बेटी खानी। बहु पूजें महतारी मानी।।
लउके राजभवन के कन-कन। सनल दुलार प्यार में छनछन।।
बरसेला आनंद भवन में। देख सिहालें देव गगन में।।
सबके मनसा पूजल जाले। तनको ना केहू दुखिताले।।
लागे आसा पुरा अघाइल। रिधी-सिधी लउकें लरिआइल।।
लउके अवध धाम अति पावन। इनरासन से अधिक सुहावन।।
दोहा-
जन जन में आदरस बा, भरल नेह बिसवास।
सगरे सुख संसार के, करे अवध में बास।।२७६।।
चौपाई-
कुछ दिन ले कौसिक जी रहनी। तब जायेके बतिया कहनी।।
दसरथ जी कहलें दुखिताई। कहाँ केहु रउआ के पाई।।
कुछ दिन अउरी रूकीं रउआ। मत छीनी किरपा परभउआ।।
रउये हऽ सब काज सँवारल। अवध नगर के भाग सुधारल।।
रउआ जो अब्बे चल जायब। अपना के अनाथ हम पायब।।
सेवा से मन भरल न बाटे। सरधा तनिक न छूटऽ ताटे।।
रउआ सजी बजार बसवनी। हमरा जिनगी के लवटवनी।।
इहें रहीं अब कुटी बना के। खुसी मिली नित दरसन पाके।।
संत जहाँ पर डेरा डाले। दुख उहँवा से भाग पराले।।
रउआ रहब हमर दुखभागी। किरपा बरसी भगिया जागी।।
दोहा-
कौसिक कहले सोच के, हमरा बाटे ग्यान।
अउरी रुकला से इहाँ, ना लउके कलयान।।२७७क।।
मन मसोस राजा तुरत, हो गइले तइयार।
भइल बिदाई मुनी के, सार-भार सइहार।।२७७ख।।
चौपाई-
मुनी के जोग बिदाई भइल। आसरम ले पंहुचावल गइल।।
गुरु बसीठ सँघ चारू भाई। लौटे जब लगले पहुँचाई।।
करत दंडवत सीस नवा के। धन-धन सब बूझे अपना के।।
अवध भइल डेरा अनंद के। गूँजे घर-घर गीत छंद के।।
राम बिआह जनक के स्वागत। कहत सुनत बा मनवा लागत।।
दसरथ के सब भाग सराहें। खुसी वइसने अपनो चाहें।।
दुलहिन सबके करत बड़ाई। मन लागे ना कबो अघाई।।
जे ई कथवा सूने गावे। दुनिया के सुख उहँवा आवे।।
मन के ना छूवे पछतावा। बाजे सदा अनंद बधावा।।
दोहा-
चरचा करत बिआह के, भागेला भव-भूत।
सुख संपत बरसत रहे, आ के उहाँ अकूत।।२७८क।।
लछमी आ के बसेली, मने-मने मुस्कात।
पावे सुखवा सरग के, मनई इहें छछात।।२७८ख।।
पूगे सब मनकामना, मिले भुलाइल राह।
सुन के कथा बिआह के, होखे तुरत बिआह।।२७८ग।।
मन के सब खटपट मिटे, भेंटे सुखद अराम।
ढेर दिन ले जीये ऊ, रहें दयालू राम।।२७८घ।।
सियाराम के चरन में, चित ना डिगे हमार।
बिगड़े ना दीं राम जी, बरतराज के कार।।२७८ङ।।
।। जय सियाराम ।।
.....
।। बालकांड पूरा ।।
.......
Comment by sanjay kumar singh on September 23, 2012 at 12:29pm गुरु जी सादर प्रणाम ,
बिदाई आ ओह से जुडल सम्वेदना के अद्भुत वर्णन ..............
जय भोजपुरी
Comment by Manoj Kumar on September 25, 2012 at 1:12am गुरुजी प्रणाम आ जय भोजपुरी!
गीत बिदाई के गुँजे, रीत नीत अनुसार।
छोह-मोह सब हिया के लागे करत चिघार।।२७२क।।
बालकांड के बहुत सुनर ढंग़ से समापन भईल. आगे के कथा के इंतजार बा.
धन्यवाद आ जय भोजपुरी.
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 25, 2012 at 8:29am गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी
बालकांड के अदभुत वर्णनन पढे के मिलल , एह अनुभव के शब्दन मे ना कहल जा सकेला !
करुणाकर रामायन के एह अंश के पान बहुत बरिआर रहल ।
जय भोजपुरी
Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 12:07pm गुरू जी प्रनाम,
भोजपुरी के अनमोल शब्दन के सहोर-बिटोर के बहुत सुनर आकृति दिया रहल बावे। बहुत बढीया...।
जय भोजपुरी
Comment
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