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करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२९ वाँ किस्त)
चौपाई-
समधी के बिधिया खतमा के। माड़ो के बान्हा सरका के।।
दसरथ जी के निकलल बानी। जाये के अब चाहऽ तानी।।
जल्दी से अब करीं बिदाई। बहुअन के ले नगरी जाईं।।
जे सतकार मिलल मिथिला से। कतहीं ना मिली खोजला से।।
सुनले जब विदेह ई बानी। उतर गइल मुँहवा के पानी।।
कहलें ई का बचन कढ़वनी। हमनी के अपसोच बढ़वनी।।
कुछ दिन सेवा अउर करे दीं। मनवा के कुछ धीर धरे दीं।।
सुनके ई जाये के बतिया। धड़के लागल बाटे छतिया।।
चूक भइल सेवा में कवना। जाये के निकलल ई बयना।।
साँच-साँच हमके बतलाईं। दिल के मत अब अउर दुखाईं।।
दोहा-
रउआ तऽ बड़का हईं, बड़को में कुछ बीस।
जेके बपसी रूप में, अपनवले जगदीस।।२६२।।
चौपाई-
सुन कातर बानी बिदेह के। छलके लागल नयन नेह के।।
अवधपति आदर से कहनी। सुख से हम रउआ घर रहनी।।
का राउर सतकार बखानी। कहत साँच हमहूँ सकुचानी।।
ई सतकार कबो ना भूली। चरचा करते छाती फूली।।
पहिले के पुनवा बा जागल। तब रउआ से नाता लागल।।
जे मन में सरधा के सानी। ऊहे रउआ के पहचानी।।
बानी रउआ बड़ उपकारी। दानवीर सबका से भारी।।
कन्यादनवा महा दान हऽ। बंस बढ़ावल विधि विधान हऽ।।
विनय भाव मनवा में ले के। अपना घर के लछमी दे के।।
जे दोसर के भाग बनावे। अनके घर भर खुसी मनावे।।
दोहा-
ओसे बढ़ संसार में, के बा चतुर सुजान।
जेकरा घर माँगे कुछु, पँहुचेले भगवान।।२६३।।
चौपाई-
पहुनाई तऽ हऽ पहुनाई। बसत ढेर महिमा घट जाई।।
स्वागत में सब कार रुकेला। तन मन धन सब धरम झुकेला।।
स्वागत सोभेला सीमा में। आवत रहे सदा जे कामें।।
अधिक नेह परिसान करेला। जिनगी के सुख चैन हरेला।।
भाव समरपन के जब आवे। स्वागत ऊहे सही कहावे।।
येमें कार सजी रुक जाला। समय बितत ना तनिक बुझाला।।
राज काज रूकल बा सगरे। दूनू ओरी डगरे-डगरे।।
अवध गइल बा बहुत जरूरी। सेवा से करतब ना पूरी।।
सून अवध के कइसन गत बा। रह-रह मनवा उहो परत बा।।
मरजी कऽ दी अब हम जाईं। बहुअन से घर-बार बसाईं।।
दोहा-
मिलल जवन रउआ इहाँ, सुख सरधा सम्मान।
हरदम रही इयाद ई, जबले रही परान।।२६४क।।
सुन समधिन के बतकही, बोले मुनी बसीठ।
ना बा कम केहू सुनी, दूनू हईं सिरीठ।।२६४ख।।
चौपाई-
मानुस जिनगी बड़ा कठिन हऽ। दुरलभ येकर हर पल छिन हऽ।।
मानुस तन मुकती के रथ हऽ। करम धरम सब येकर पथ हऽ।।
जूटल बा इनरिन के घोड़ा। हाथे बा इच्छा के कोड़ा।।
ठीक चली तऽ मुकुती पाई। गलत चली तऽ गच्चा खाईं।।
भूसन बन के भरम सतावे। सुख साधन बन दूसन आवे।।
बीते येकर जिनगी सारी। जीये के करते तइयारी।।
लालच के लाचारी पावे। चिन्ता के बेमारी आवे।।
हुसियारी में हीत मिले ना। स्वारथ कारन मीत मिले ना।।
समय कटेला सपराई में। आसा के बस अगुआई में।।
भीतर के ना देखे अयना। बाहर खोजे दिल में चयना।।
दोहा-
असथिर ना होखे कबो, काई पर के गोड़।
हिरिस करत हारत रहे, घुमत उमर के मोड़।।२६५।।
चौपाई-
रह-रह के कुछ गरभ गरेसे। छटक लोभ के लुतिया लेसे।।
कुफुत बटोरे करता बन के। दुख से भागे धीरज मन के।।
भाग बनावे में भीड़ेला। धन खातिर पाँकी हीड़ेला।।
टूटेला झूठे अगरा के। लुट जाला ई खुसी मना के।।
येके झूठ बड़ाई भावे। साँच बात दिल के घबड़ावे।।
सबसे ई काबिल बन जाला। अपने बतिया पर अड़िआला।।
भगवन में बिसवास घटेला। झूठे उनकर नाव रटेला।।
हरदम आपन बल अजमावे। झूठे मन के दुखी बनावे।।
मजा गँवावे में जे होला। पावे में ओके खोजेला।।
देखे हरदम अनके गलती। सदा चलावे आपन चलती।।
दोहा-
सपना के संसार से, जोरेला ई नेह।।
भोगेला सब करम फल, बदल-बदल के देंह।।२६६क।।
दुरबल होके नेह में, करतब जाला भूल।
आपन बस कुछ चले ना, राखे तबो वसूल।।२६६ख।।
मनई के आदरस में, रउआ सभे महान।
सोचीं सरधा से तनी, दे परजा पर ध्यान।।२६६ग।।
चौपाई-
मानी बात ध्यान ई देके। समय सही आइल जाये के।।
ठीक न बा अब रोकल रूकल। मन में बा हुदबुदी ढूकल।।
सतानंद जी अब सइहारीं। जाये के सुभ लगन उचारीं।।
सुन बसीठ के बचन विचारल। सुरू भइल साधन सइहारल।।
चारू दुलहिनियन के डोली। सजे लगल जइसे रंगोली।।
ला ला के सब रतन मढ़ाइल। हीरा मोती सजी जड़ाइल।।
सोना के सब तार चढ़ावल। किसिम किसिम के फूल कढ़ावल।।
लगल गुलाबी सब ओहरवा। सोभा के सब लगल झलरवा।।
सब कनियन के खेल खिलौना। चुन-चुन सबके मन बहलौना।।
डोलिन में अब लगल धराये। सरधा से लागल सौंपाये।।
सुग्गा सुग्गी तोता मैना। सुघर फतिंगन के सब सैना।।
जवन-जवन जेके मनभावे। लागल बा सभ्भे सरिआवे।।
छंद-
प्यार हई सुखसार हई सुसिंगार हई संसार के नारी।
सुकवार हई रसधार हई आधार हई सुभ मंगलकारी।।
ई गीत हई संगीत हई सुभ रीत हई परतीत पियारी।
कोमलता के कवीत हई इहे मीत हई सबसे हितकारी।।
पीर सहेें सब भीर सहें तकदीर के इहे करेली तयारी।
दया ममता के मकान हई मुस्कान हई सबसे उपकारी।।
सिरजन के ई समान हई परधान हई सरधा के दुलारी।
सकति हई ईहे भगति हई आसकति हई आसा अवतारी।।
जाली जहाँ खुसहाली तहाँ अगुताली न सहत संकटभारी।
भोग में लोग धरावेला रोग सहें दुखभार लगें दुखियारी।।
मान करे जे महान बने भगवान के उहे कहाला पुजारी।
ईहे हई सुविधा के सरोवर बिहँसे जहाँ कलयान कियारी।।
दोहा-
हीरा मोती रतन के सजा सजा के भार।
भेजे खातिर साथ में, तुरत भइल तइयार।।२६७क।।
हाथी घोड़न के सघें दुधगर-दुधगर गाय।
रेसम के सब ओढ़नी ओढ़-ओढ़ हरसाय।।२६७ख।।
नारी अइसन धन हई जहाँ जहाँ ई जाय।
सुख संपति संसार के, सँघ ही जात बुझाय।।२६७ग।।
चौपाई-
रेसम के बस्तर सिलवा के। सजी बरातिन के बुलवा के।।
हाथे-हाथ बँटाये लागल। अजब खुसी के अवसर जागल।।
सबके हिया जुड़इल बाटे। मनवा में उछाह ना आँटे।।
सरधा में औकात सजा के। जनक सौंप दहले सब लाके।।
लछमी जवना घर से जाली। लउकेला ऊ खाली-खाली।।
दसा देख के जनक राज के। सँघवे सब उनके समाज के।।
दसरथ जी आगे आ कहनी। ई सब का रउआ दे दहनी।।
राउर धन ना हम ले जायब। राउर ना मनवा दुखलायब।।
सब कुछ बाटे हमरा पूरन। चाहीं बस किरपा के चूरन।।
ऊहे लेके हमहूँ जायब। हरदम रउरा गुन के गायब।।
दोहा-
का होई हमरा लगे, राउर ई औकात।
दुखलाई मत हिया के, मानी हमरो बात।।२६८।।
चौपाई-
अँखिअन में भर-भर के पानी। जनकराज के निकलल बानी।।
रउआ जो ई ना ले जायब। तब हमार मरजाद घटायब।।
बात सही ई रउआ मानी। सरधा से सब दहले बानी।।
बात विनय के सुन समधी के। हिया जुड़ाइल दसरथ जी के।।
चुन-चुन के कुछ-कुछ ले लहनी। फेरू तब ई बतिया कहनी।।
खुस कईल जो चाहीं मनवा। इहवें राखीं अउरी धनवा।।
खूब करब संतन के सेवा। बाँटत रहब मिठाई मेवा।।
सब बेटिन के ले ले नउआ। दुखिअन के सब बाँटब रउआ।।
पुन परताप बढ़ायब आगे। सुन-सुन बात दरीदर भागे।।
जनकपुरी ई धाम कहाई। नइहर बुझ सब तिरिया आई।।
दोहा-
तिरिअन के सतकार से, जागी येकर भाग।
येही धन के अंस से, होई अमर सुहाग।।२६९।।
फेरू आगे...
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 22, 2012 at 9:50pm गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी
गजब के भाव बा , अँखिअन में भर-भर के पानी। जनकराज के निकलल बानी।।
जबरजस्त ! एक एक पंक्ति बेजोड बिआ ।
जय भोजपुरी
Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 11:58am गुरू जी प्रनाम,
ऐह भोजपुरी महाकाव्य, करूनाकर रमायन, मे अईसन-अईसन चौपाई अउर दोहा मन के हर लेत बाडे सन। अउर मन बार-बार ऐकरे के पढे के करत रहत बावे। बहुत निमन...।
जय भोजपुरी
Comment
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