Come, let's do something for Bhojpuri...
करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२८ वाँ किस्त)
चौपाई-
सगरे काम उहे सब होले। रीत रिवाज धरम जे बोले।।
सुभ करमन के छाँट-छाँट के। करे लोग सब बाँट-बाँट के।।
सुखवा फइलल सब जगही बा। दुख के ना लवलेस कहीं बा।।
जवन जघे रनिवास लगल बा। ओकर अजबे भाग जगल बा।।
गाई के कुछ गोबर आइल। बाहर-भीतर जघे लिपाइल।।
बरन-बरन के अछत रँगाइल। जघे-जघे चैका पूराइल।।
सुभ बिआह के लउके लच्छन। बनल चितर सब अइसन अइसन।।
घास-फूस सब गाछ बिरिछिया। पहिरेले सोभा के बिछिया।।
हरदी चन्नन अगर धूप के। बरखा होखत रहे रूप के।।
पंडित जी हरदी चढ़ववले। विधि विधान आगे बढ़ववले।।
दोहा-
हुलस-हुलस के भइल सब, हरदी के सुभ कार।
मेहरारुन के बहुत अब, जूटल रहे बजार।।२५२।।
चौपाई-
जवन हाल येन्ने बा वर के। उहे हाल कनिया के घर के।।
उहँवो हरदी चंनन लागल। दुखवा जनकपुरी से भागल।।
माँगर होते साँझ पुजाइल। मटकोरा के कार नधाइल।।
दूनू ओर भइल मटकोरा। सुख छउके चढ़-चढ़ के कोरा।।
कवनो लेखा बीतल रतिया। लागल भोरे सजे बरतिया।।
बाजे लगल सुहावन बाजा। दूर-दूर के अइले राजा।।
चलल बरात पुरा सरिया के। पहुँचल जनक दुआरी जाके।।
सोभा फइल गइल छितरा के। पूजा पहिल भइल दुअरा के।।
नारी रहली गावत मंगल। अलगे-अलगे बना-बना दल।।
दसरथ के स्वागत में सुरखुर। जूटल लागे पुरा जनकपुर।।
दोहा-
गनपति के पूजा भइल, हरसित बा सब लोग।
जनवासे लवटल सभे, खा के छप्पन भोग।।२५३।।
चौपाई-
चलले भसुर सुजग्य अँगनवा। झूम उठल सखिअन के मनवा।।
लगली गीत मधुर धुन गावे। भसुरू के बकलोल बनावे।।
भकुआ भसुर कहाँ से अइले। नीमन ना गहना ले अइले।।
दुलहिन जोग न लउके सारी। नाव हँसवले ईहो भारी।।
लउकें भसुर बड़ा दँतचिअरा। पोंछ रँगा के आइल सिअरा।।
दछिना में के जम्मा जोड़ा। पहिर के लागें बंठा घोड़ा।।
कइसन इनकर बाड़ी माईं। मँगनी में लहली जनमाई।।
कइसे बानी आज बिकाइल। भसुर भरइता बन के आइल।।
राउर मुँहवा लागे चिपरी। देख-देख बाजेला थपरी।।
लागीने रउआ खनदानी। तन में तनको नइखे पानी।।
दोहा-
मुरई अइसन नाक बा, कोंहड़ा निअर कपार।
कान कराही के निअर, अँखिया मुनल बिलार।।२५४क।।
कार निरीछन के भइल, बग-बग बरे सिंगार।
सुध-बुध कइले बा खतम, माया के बाजार।।२५४ख।।
चौपाई-
दुलहा सबके बारी आइल। अँगना में अइले हरसाइल।।
पहिर-पहिर के सुन्नर सारी। परिछे उनके चलली नारी।।
तरे-तरे के लउके रँगवा। थिरकत रहे खुसी से अँगवा।।
बिजुरी जइसे चमकत भागे। वइसे रूप सखिन के लागे।।
रूप-छड़ी सब डेग बढ़ावें। मनसा के मन फूल लुटावें।।
दुल्हा बनल बरम मनभावन। माया घर होखे परछावन।।
मनवा में उछाह बा भारी। हाथे सोहे कंचन-थारी।।
ताकत-झाँकत तन सइहारत। डेग-डेग छवि दिअना बारत।।
काजर के चिकनाई भारी। नाचेली अँखिया रतनारी।।
लागे देंह बहुत रति धइली। बनल पुजारी परिछे अइली।।
रूप-रास लउके घर आइल। छलके लागल नेह खखाइल।।
दुल्हा देख जुड़ाइल नयना। चलली परिछे सास सुनयना।।
दोहा-
परिछत लउकल रूप जे, गइली ऊ घबड़ाय।
रूप चतुरभुज देख के, सुध-बुध गइल भुलाय।।२५५क।।
चारू भाइन के भइल, परछावन के कार।
घरवे में घूमत रहे, सोभा के संसार।।२५५ख।।
चौपाई-
सभ्भे तब मड़वा में आइल। सुभ बिआह के कार नधाइल।।
चउका पर सब बइठल दुलहा। सबके नजर भइल बा खुलहा।।।
पूजा गौरी के गनेस के। सब देवन सँघवा महेस के।।
पंडित जी लगले करवावे। सब मंगल मंतर पढ़वावे।।
तब पंडित के निकलल बानी। सँघवा ले आपन महरानी।।
महाराज मड़वा में आईं। हाली कन्यादान कराईं।।
जनकराज मड़वा में अइले। वर के सोझा आसन धइले।।
सिय के सँघे सुनयना अइली। ऊहो आपन आसन धइली।।
सजा-सजा के रतन निधी से। होला कन्यादान विधी से।।
राजा-रानी हाथ पकड़ के। सौंपेले सीता रघुवर के।।
दोहा-
चारू बहिनिन के भइल, अइसे कनयादान।
भइलस पूरा प्रेम से, विधि के रचल विधान।।२५६।।
चौपाई-
कनयादान करा के मन से। राजा चल गइले आँगन से।।
जीवन के सब मरम बुझा के। पंडित जी कहले समुझा के।।
चिटुकी में सेनुर पकड़वले। वर से सेनुरदान करवले।।
अमर-घूर असथिर सरिआ के। राम बहोरें माँग सिया के।।
बनवा में जइसे माया के। ग्यानी चलें मसाल जरा के।।
सागर में जइसे दुधवा के। सूँढ़ी लमल नेह के आके।।
जीभ लफा जहँवा ले आँटे। सँपवा फेन रूप के चाटे।।
सतदल कमल सुहाला जइसे। वर के बाँह लगेला वइसे।।
सोभा के सागर के आगे। रोकत राह बाँह ऊ लागे।।
मन के बेसी जवन लुभावे। रूप कहीं ऊ भाग न पावे।।
दोहा-
येही लेखा हो गइल, सबके सेनुरदान।
अँगना में लागत रहे, उगल चार बा चान।।२५७क।।
नारी सब सुर में सजा, गावें मंगल गीत।
अमर रहे जोड़ी सदा, नाहीं घटे पिरीत।।२५७ख।।
चौपाई-
विधिवत फेर चुमावन भइले। तब सभ्भे कोहबर में गइले।।
पहुँच दुआरी पर सब नारी। खड़िआइली सब हाथ पसारी।।
कहली पहिले नेग लिआईं। पहुना जी कुछ दुहरा गाईं।।
जबले नाहीं नेग चुकायब। तबले ना कोहबर में जायब।।
केहू धऽ के ओह हिलावे। केहू ला के दही चटावे।।
केहू पारेला चुचकारी। केहू हँस-हँस देला गारी।।
केहू पाँजर में खोदेला। केहू गाली में गोदेला।।
केहू होके ऊपरवाँती। धीरे से बोले जिभजाँती।।
कहके कुछ रख दीं मनवा के। जइसे रखनी हऽ पनवा के।।
प्रेम छछाते धइले तन के। बान्हेला बरिआईं मन के।।
बरम बिछा के जइसे माया। लुकववले बा आपन काया।।
कमलन के दल में अझुरा के। भागे ना भँवरा अगुता के।।
दोहा-
बरवन के गत बा उहे, माया दल के बीच।
कमल बीज जइसे रहे, बइठल पोखर कीच।।२५८क।।
कोहबर में पहिले मिले, दू जिउआ अग्यात।
इहँवे से संबन्ध के, होखेला सुरुआत।।२५८ख।।
बन्हन भारी नहे के, छोड़ेला उदगार।
बानी बदले गीत में, झकझोरे जब प्यार।।२५८ग।।
चतुर चिरौनी देख के, मुस्कइनी भगवान।
बस में होके प्यार के, बन गइनी रसखान।।२५८घ।।
चौपाई-
कहनी प्रभु कइसे चूप रहीं। दोहरा से दुहरा का कहीं।।
अबले ईहे सुननी मननी। नारी भाव जगत के जननी।।
हरदम रस के रहे जरूरत। मिले देख नारी के सूरत।।
कुल के सेवा करे कुँआरी। पोसे जीव बनत महतारी।।
जे येकर जौवन रस पावे। लोहा के ऊ चना चबावे।।
हाव-भाव, रस ओज कलपना। रीत पीरित गीत के सपना।।
सगरे सुग्घर मीठ जगत के। होखेला नारी के तत के।।
ईहे भाव हई भासा के। ईहे किरन हई आसा के।।
येही पर बा जगत निछावर। करिआ गोर न देखे साँवर।।
निकले दुहरा येही दह से। पनके प्यार नार के गह से।।
दोहा-
भरम आज मेटल सजी, भइल पुरा परतीत।
नारी के ये जात से, सकी न केहू जीत।।२५९क।।
रसना में रस बोर के, बोले जब रस राज।
चंचल चित के सखिन के, असथिर भइल मिजाज।।२५९ख।।
सखी सब सिलवट तोप के, कहली लागीं गोड़।
ना तऽ बीचे में सिया, चल दींहे घर छोड़।।२५९ग।।
प्रभु जी तब मुस्काइके, तुरत नववनी माथ।
सीव रूप सिलवट भइल, छूअत प्रभु के हाथ।।२५९घ।।
चौपाई-
बीतल रात भोंर हो गइले। दुलहा सब जनवासे अइले।।
निबरित हो भइले तइयारी। खाये खीर चले ससुरारी।।
सरिआ के आइल जब थारी। बान्ह झुमेटा अइली नारी।।
तब सरधा से सास सुनयना। बोलेली रस बोरल बयना।।
बबुआ सभ्भे दीं बतलाई। का चाहीं अब खीर खवाई।।
कहे राम का अजमाईने। काहें हमके लजवाईने।।
ना हमरा कुल के ई भावे। कतहीं केहू हाथ बढ़ावे।।
मरद कबो ना मुँहवा खोले। लालच में टिसुना ना डोले।।
कइसे ऊहो मरद कहाई। जे दोसर के खाय कमाई।।
बाटे कवनो इच्छा नाहीं। खाली हमरा आसिस चाहीं।।
दोहा-
ओही से जिनगी कटी, चाहीं ना कुछ नेग।
परमारथ के राह में, बढ़त रहे ई डेग।।२६०क।।
कब्बो ना अवसर मिले, खाईं अनकर चीज।
बुधिया बिगड़े ना कबो, मन ना बने मरीज।।२६०ख।।
ताकत होखे जाँघ में, तब्बे करीं बिआह।
अनके धन मत छीन के, अपन बिगाड़ीं राह।।२६०ग।।
चौपाई-
बर के बतिया सुनत सुनयना। मन में भारी पवली चयना।।
बर सुजोग सब लेखा बाड़ें। बड़ा नीक बतिआवऽ ताड़ें।।
छप्पन बिजन तुरत रिन्हाइल। समधी सँघ सब खाये आइल।।
धऽ-धऽ नाव भइल तब गारी। हरसित बा सगरे नर नारी।।
खा-खा के रसदार रसोई। सुध-बुध लागे गइलस खोई।।
खा के लोग अघाते नइखे। गा के गला दुखाते नइखे।।
दूनू ओरी होड़ समाइल। केहू ना चाहे पछुआइल।।
खतम कार भोजन के भइलस। मनझाँका के बेरा अइलस।।
ढकें माथ दसरथ जी अइनी। मड़वा के उजिआगर कइनी।।
मुकुट मनी से दमके मड़वा। बा दुलार के आइल बढ़वा।।
भारी भरखम ससुर बढ़इता। बचन करम के महाअढ़इता।।
रतन लुटावत खोलें सारी। मंगल गीत सुनावे नारी।।
दोहा-
बिधि बिआह के हऽ इहे, सबसे आखिर बीध।
पिता परन लेले इहाँ, बन के साधू सीध।।२६१क।।
माथ ढकत कहनी बचन, बनके बहुत उदार।
दहब ना होखे अब कबो, इज्जत तहर उधार।।२६१ख।।
नाही दुख देखब तहर, जबले रही परान।
तहरे मरजी से चली, सगरे कुल खनदान।।२६१ग।।
.......
फेरू आगे...
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 22, 2012 at 9:49pm गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी
हरमेसा लेखा एक दम बेजोड भाव से भरल , मन के संतुष्ट करत एगो बेजोड हिस्सा करुनाकर रामायन से ।
जय भोजपुरी
Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 12:00pm गुरू जी प्रनाम,
मन के हरीहर कर देत बावे सगरी चौपाई अउर दोहा। बहुत निमन...।
जय भोजपुरी
Comment
© 2013 Created by Admin.
You need to be a member of JaiBhojpuri.com to add comments!
Join JaiBhojpuri.com