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करुनाकर रमायन : बालकाण्ड (२७ वाँ किस्त)

करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२७ वाँ किस्त)

चौपाई-
तब गिरिजा मुस्का के कहली। हाथ उठा के आसिस दहली।।
धन-धन बाड़ू जनक दुलारी। धन ई तहर बहिनिया प्यारी।।
भगती प्रेम अउर बिसवसवा। बा जे अब तहनी के पसवा।।
ओकरे बस हम सदा रहिने। ओकरा ला सब सितम सहिने।।
जहाँ पुकरबू तहवें आयब। सगरे बिगड़ल कार बनायब।।
लागीने हम सबके माई। सबके खातिर बनी सहाई।।
बाकिर जे दुख दे दोसर के। ओसे हमहू रहिने फरके।।
जे बा न्याय धरम के साथे। मदद करीने अपना हाथे।।
हरदम न्याय धरम पर रहिहऽ। इक दूसरा ला दुख के सहिहऽ।।
जहाँ रही ई सुन्दर नीती। सुख से सबके जिनगी बीती।।

दोहा-
भरल पुरल रहबू सदा, बिगड़ी ना जब नेत।
दुरलभ ना कुछऊ रही, दान दया के देत।।२४३।।

चौपाई-
बपसी जनक लिखवले पाँती। दसरथ के इच्छा के भाँती।
लौटल दूत अजोधा आइल। लुत्ती निअर खबर छितराइल।।
चली बरात जनकपुर भारी। होखे लागल पुरा तयारी।।
चारू भाई बिअहल जइहें। चारू के दुलहिनिया अइहें।।
कवन खुसी के कहीं तमासा। लागल बा आसा में लासा।।
चिन्तन भजन भुलाइल बाटे। मन में रस बढ़िआइल बाटे।।
सभे सवारी के सरिआवे। हौदा चरजम्मा बनवावे।।
करत तयारी कुछ दिन बीतल। सूरज लगले होखे सीतल।।
आइल जब भगवन के दिनवा। सुभ अगहन के सुखद महिनवा।।
सुभ बिआह के दिन उतराइल। सुकुल पंचमी तिथी बदाइल।।

दोहा-
पाँच रोज पहिले चलल, सजधज सजी बरात।
सँघे चलल रनिवास सब, मनही मन हरसात।।२४४क।।
चलल नगर के लोग सब, बँचले बालक बूढ़।
रोगी जोगी सीध सब, बउका आन्हर मूढ़।।२४४ख।।

चौपाई-
रथ पर लागल रतन सिंहासन। जवन रहे राजा के आसन।।
माड़िक मढ़ल बर मेघडंबर। लागे सिकुड़ गइल बा अंबर।।
अइसन ओमें झलके झालर। जइसे सुरुज सुबह धरती पर।।
घोड़न के चमके चरजामा। जस सोना चमकेला घामा।।
हाथिन के माथा के झलरी। चमके जस बदरी में बिजुरी।।
ओपर बा हौदा सरिआवल। जस सोभा के सेज सजावल।।
रानिन खातिर सजल महरफा। सोहे ओपर पिअर पतरखा।।
सोभा ठेकल रहे अकासे। जस देवी पहुँचे़ देवासे।।
वीर बाँकुरन के बा घोड़ा। सोना के लगाम आ कोड़ा।।
अइसन रूप सजावल गइले। स्यामकरन उनसे सरमइले।।

दोहा-
रहे येक बारादरी, सुग्घर सजल सिरीठ।
जवना में चढ़ के चले, कुल के गुरु बसीठ।।२४५।।

चौपाई-
चलल बरात नगर निअराइल। आसा के सब फूल फुलाइल।।
सुनले जब बरात के आइल। मिथिलापति के मन हरसाइल।।
आपन सब समाज सरिआ के। जुटले अगुआनी में आके।।
दहलें जनक जहाँ जनवासा। लेहल सब उहँवा पर बासा।।
भाँत-भाँत के भवन सजावल। सबमें सुग्घर सेज बिछावल।।
रहे धइल सब सुख के साधन। जर-जलपान बसन आ बासन।।
देंहे देंहे नोकर रहले। सेवा करें बिना कुछ कहले।।
रहले इन्तजाम सब अइसन। सरगो में न मिलेला जइसन।।
स्पागत के ई देख तयारी। हरसित बा सगरे नर-नारी।।
लागे सब साधन सरिआ के। इहँवे बसल अजोधा आके।।

दोहा-
जनक नगर के बगल में, अवध नगर के रंग।
देख देवता गगन के, हो गइले सब दंग।।२४६क।।
लगवा जा अवधेस के, निहुरेले मिथिलेस।
जइसे भगती के लगे, झुके ग्यान उपदेस।।२४६ख।।

चौपाई-
हाथ जोर बोलेले बानी। धन-धन भाग अपन हम मानी।।
रउआ हमरा के अपनवनी। सेवा के अब जोग बनवनी।।
कइसे करीं बड़ाई राउर। अधिक बड़ाई होला बाउर।।
दहनी अइसन रीन चढ़ाई। होई ना कब्बो भरपाई।।
सेवा में ना बानी समरथ। येक रथी हम रउआ दसरथ।।
भूल-चूक मन से बिसरायब। घटल बढ़ल सेवा बतलायब।।
जिनगी भर जबले ना टूटब। सेवा में हम रउआ जूटब।।
साधन भाव सजी बा थोरे। परे समय पर ऊहो भोरे।।
जवने सेवा सोझा आवे। बड़का ओही के अपनावे।।
बा अरदास इहे रउआ से। स्वीकारब सुख के भउआ से।।
कहके बचन विसेस विनय के। भगती के सुन्नर सुरलय के।।
चरन छुवे के कोसिस कइले। दसरथ उनके बहियाँ धइले।।

दोहा-
काहे चलनी हऽ करे, रउआ अइसन कार।
समधी के माने हवे, येक निअर अधिकार।।२४७।।

चौपाई-
कह बतिया अँकवारी धइले। मिलन देख सब लोग जुड़इले।।
भगती ग्यान लगे तन धारी। आपस में धइले अँकवारी।।
दसरथ जी कहलें विदेह से। सभ्भे जनमें येक देंह से।।
ओकर महिमा बेसी होला। जेके घर से निकले डोला।।
बेटी घर के लछमी होली। सुग्घर बदन मनोहर बोली।।
जे जे बेटी से अगुताला। ओकर बंसज बने बिलाला।।
दू-दू कुल के मान बढ़ावें। धन में सेवा के अपनावें।।
ओकर बाप छोट बन जाई। जहँवे-तहँवे माथ नवाई।।
जे ओ नर के नीच बनावे। मुँह से बाउर बात कढ़ावे।।
बनिहें संकर सदा सहाई। नरक तबो ऊ मनई जाई।।
अपना के अब छोट न मानीं। रउआ हमसे बड़का बानी।।

दोहा-
सुन समधी के बचन के, भरल आँख में आँस।
सरधा के गरदा झरल, बिहँसेला विसवास।।२४८क।।
देख सिया के बाप के, भरल आँख में लोर।
दसरथ जी के दया के, रहे ओर ना छोर।।२४८ख।।

चौपाई-
विनय प्रेम सरधा में सानल। भगती के बान्हा में बान्हल।।
दसरथ जी के निकलल बानी। काहें लोर बहावऽ तानी।।
जो ई लोर नेह के होखे। तब ई सूनी बात सरोखे।।
बेटी राउर हम ले जायब। घर में आपन धिया बनायब।।
नइहर के अहवा ना आई। ना बपसी के सोच सताई।।
राखब बना नयन के पुतरी। ध्यान कबो ना ओसे उतरी।।
बोलऽ तानी हाथ उठा के। जीअब ना हम अलग हटा के।।
दानी के घर बेटी आवे। जे घर के बढ़वार मनावे।।
कन्यादान दान हऽ भारी। जे ना दे ऊ बने भिखारी।।
रउआ सगरी चिन्ता छोड़ी। विधि विधान से नाता जोड़ीं।।
खाली रउआ धिया बिआहीं। अउर न हमरा कुछऊ चाहीं।।
लालच से जे बिअहे बेटा। विपत करेला उहाँ चहेटा।।
जे धन लेके बेटा बेंचे। भगवन ओकर किस्मत मेंचे।।
जे ना मुँह से माँग करेला। भीतर से सब कुछ खोजेला।।
नरक बनेला ओकर घरवा। जिनगी भर पिठिआवे डरवा।।
औरत जहँवा लोर गिरावें। लछमी उहाँ कबो ना आवें।।

दोहा-
धन-धन बानी जनक जी, कइसन हिया उदार।
बिअहऽ तानी येक सँघ, रउआ बेटी चार।।२४९क।।
सुन दसरथ के बचन के, भइलें जनक विभोर।
हाथ जोर के प्रेम से, चले महल के ओर।।२४९ख।।

चौपाई-
तुरते खबर पठावल गइले। रामलखन मुनि के सँघ अइले।।
अँखिअन में ललसा दरसन के। आसा में आतुरता मन के।।
अवते राम लखन जा जा के। छुअले माइन के पउँआ के।।
फेरू छुअले चरन पिता के। लगलें गोड़ गुरू के जा के।।
जाके गोदी में माइन के। बइठे दूनू लइका बन के।।
राम केकई गोद पकड़ले। लखन कोसिला गोदी चढ़ले।।
पोंछेली मुँहवा आँचर से। देख सुमितरा मन में हरसे।।
पूछेली बतिया सब मन के। देखत दसा बने अँखिअन के।।
कब्बो नीचे चरन निहारें। कब्बो नजर गाल पर डारें।।
धऽ-धऽ अँगुरिन के सुघरावें। पकड़-पकड़ के बाँह दबावें।।
बीच-बीच में पूछत जाली। सगरी बतिया हाली-हाली।।
कइसे तू रकसन के मरलऽ। कइसे तूँ नारी के तरलऽ।।

दोहा-
तुरलऽ धनुहा के तरे, सजी बजावऽ हाल।
कइसे रहलऽ जा कहाँ, समुझावऽ जा लाल।।।२५०।।

चौपाई-
राम लखन सब कथा सुनवले। जथी जहाँ पर रहले पवले।।
भरत सतरुहन दूनू भाई। रहलें सुनत बात खड़िआई।।
आपस में सब गला मिलाई। मिलले फेरू चारू भाई।।
देख मुहूरत सगुन धराइल। हरदी मटकोरा निअराइल।।
सखी सहेली मंगल गावें। बर कनिया के नावे-नावे।।
मन में लगन अजब बा लागल। रोग सोक सगरे बा भागल।।
चिन्ता फिकिर न फटकऽ ताटे। कवनो बात न खटकऽ ताटे।।
मनवा मोर बनल नाचेला। बादर सुख के पानी देला।।
हवा सुगन्धित हरसित होके। बहे रात दिन सुधबुध खो के।।
गूँजे गीत गगन में गावल। देवो लगले पहुँचे धावल।।

दोहा-
सुमिरन कऽ सब देव के, सुरू भइल सब कार।
बिधिन न आवे बीच में, होखे नेगो चार।।२५१।।

फेरू आगे.....

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Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on September 18, 2012 at 10:00pm

charan shaparsh  guru ji ke 

jai bhojpuri jihin ja bhojpuri !

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 18, 2012 at 10:29pm

गुरुजी गोड लागत बानी !

अनमोल ! भोजपुरी शब्दन के भाव आ करुणाकर रामायन के महिमा आ एह दुनो के संगम करावत राउर सोच !

जबरजस्त !

जय भोजपुरी

Comment by Ashutosh Ranjan on September 20, 2012 at 11:06am
गुरूजी प्रणाम,

कई हाली पढ़नी. राउर लिखल आ पोस्ट कईल रामायण के तकरीबन हर किस्त के पढ़नी. हम तुलसी दास जी के रामायण के भी पाठ कईले बानी.

राउर इ रामायण पढ़ला के बाद भी उहे ले उहे ताल मिळत बा...तनिको फरक ना....सान्चाहू एह अनमोल कृति के रचे खातीर राउर अनमोल कलम के शत शत नमन बा.....उहे ले उहे ताल उहे भावना लेकिन बोली हमार.....अब एह से निमन ह्रदय के छुवेवाला आ दिल तक पहुन्चेवाला रचना औरी का हो सकेला.

एह अद्भुत काम खातीर सगरो भोजपुरिया समाज सदैव रिनी रही राउर.

जय भोजपुरी
Comment by jitendra kumar thakur " dev " on September 20, 2012 at 2:59pm

jai bhojpuri

bhute anmol......

jai bhojpuri

Comment by Manoj Kumar on September 20, 2012 at 10:37pm

गुरु जी प्रणाम आ जय भोजपुरी !

जइसे-जइसे "करुनाकर रामायण" के कथा आगे बढ रहल बा, वइसे-वइसे मन ई पावन ग्रंथ के प्रति अगाध श्रद्धा से भरत जा रहल बा. राउर लेखनी के कोटि-कोटि नमन! 

धन्यवाद आ जय भोजपुरी!

Comment by Vratraj Dubey 'Vikal' on September 22, 2012 at 6:53am

करुनाकर रमायन हमरा भोजपुरी समाज के नीक लागताऽ, ई जान के हम धन-धन हो गइनी। भगवान जी के काम भगवाने जी कराइने, तब भगवान जी से हमार ई निहोरा बा जे ए करुनाकर रमायन के पढ़sता, आनंद लेता, राम जी ओ सब लोग पर आपन कृपा हमेसा बरसावत रहीं।
जय भोजपुरी, जय भोजपुरिया।

Comment by संजीव सिंह on September 26, 2012 at 11:50am

गुरू जी प्रनाम,

भोजपुरी मिठास से भरल बावे, शायद ई सभका मालूम नईखे। आ सांच कही त अगर केहु भी ई करूनाकर रमायन एक बार पढ लेबे त भोजपुरी शब्दन के ललायीत हो जाई। बहुत बढीया...।

जय भोजपुरी 

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