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करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२६ वाँ किस्त)
चौपाई-
साँच-साँच बतिया बतलावऽ। ना अब कवनो बात छुपावऽ।।
मन के बीच बरल हुदबुदी। चंचल चित लागे फरगुद्दी।।
हमनी के बा लगल अनेसा। बबुआ के कुछ मिले सनेसा।।
माइन के दिल मोम कहाला। लइकन खातिर सहे कसाला।।
जब केहूना बात सुनेला। लइका माई से दूभेला।।
माई से बढ़ हीत न दोसर। लइकन ला होला धरती पर।।
कबो केकई कबो सुमितरा। कबो कोसिला खोलें पतरा।।
बेर-बेर येक्के गो बतिया। पूछे लगली तिनू सवतिया।।
चित में चाव नयन में आसा। बरनत बने न उनकर दासा।।
करनी कह-कह दूत सुनावे। पुलकित हो सब माथ नवावे।।
दोहा-
भरत-सतरुहन खेल के, अइले येही बीच।
बतकहिये के बीच में, बइठे आसन खींच।।२३३।।
चौपाई-
सँघहीं कहले दूनू भाई। फेरू कहऽ बात फरिआई।।
कवना लेखा धनुस उठवले। कवना लेखा डोर चढ़वले।।
कहलस दूत बात समुझाई। कवना मुँह से करी बड़ाई।।
धन-धन दूनू लइका बाड़ें। कवनो बीर न आगे आड़ें।।
धन बा बाप घने महतारी। धन-धन बाड़ें कुल परिवारी।।
जहँवा अइसन जनमें जोधा। धन-धन बा ऊ नगर अजोधा।।
बल के बात कथी बतलाईं। सुन मुदई के मारे झांई।।
सब जोधा जहँवा हट गइले। तहँवा जाके ई खड़िअइले।।
जोधा जब तीनू लोकन के। भाग परइले कायर बन के।।
जरला जेंवर खानी ओके। तुरले ई तनिका में टोके।।
दोहा-
भइल सोर संसार में, धरती गइली डोल।
थर-थर काँपे वीर सब, बन गइले बकलोल।।२३४।।
चौपाई-
तबले परसुराम जी अइले। अवते बहुत जोर खिसिअइले।।
लछुमन बाते से बतिया के। सेखी रख दहले सटका के।।
तुरते राम लगे आ गइले। दूनू में कुछ बतिया भइले।।
परसुराम पग पटकत रहले। राम बचन कुछ मीठे कहले।।
केहू के ना बात सुनाइल। परसुराम रहले अगुताइल।।
तुरते आपन धनुहा दहले। ओके राम हाथ में लहले।।
फेरू ओपर तीर चढ़वले। तान कान ले कहीं चलवले।।
जमदगनी सुत करवा जोरी। चल दहले जंगल के ओरी।।
ईहे कहत दूत हरसाइल। सभकर सुन के जिया जुड़ाइल।।
राजा कइले रतन निछावर। रानी दहली हार जड़ावर।।
दोहा-
दूत निछावर पाइके, मने-मने हरसाय।
जे आवे से ही कुछू, देत निछावर जाय।।२३५।।
चौपाई-
पूछेली पतोह के काँती। रूप सील गुन सखी सँघाती।।
समघिन के सुभाव बतलावऽ। कइसन बा परिवार सुनावऽ।।
कहलस दूत कथी समुझाई। केकर-केकर गुनवा गाईं।।
रूप सील गुन सोभा सागर। जइसे बने सिमट के गागर।।
रानी जी राउर दुलहिनिया। अपने बाड़ी चार बहिनिया।।
केहू से केहू ना कम बा। सब में येक्के नेत धरम बा।।
बबुनी सीता सबसे बेसी। कन्ना ऊ बाड़ी सनकेसी।।
उनका रूप रंग के आगे। छपित चनरमा पूरन लागे।।
रानी के का कहीं सुभउआ। सरधा के बाड़ी दरिअउआ।।
जेकर बेसी भगिया जागी। ओही के ई जोड़ी लागी।।
दोहा-
दूनू ओरी देख के, सूझे मन में बात।
सबसे होइत नीक ई, चलित चार बरिआत।।२३६।।
चौपाई-
छोटे मुँह बड़ बतिया कहनी। भाउकता में हमहूँ बहनी।।
दूत दया के काबिल होला। समाचार के हऽ ऊ झोला।।
माफ करब ई हमर ढिठाई। करब उहे जे मन में आई।।
कह के दूत चलल अब जेंवे। रानिन के मन सपना सेवे।।
गुरु के तब दसरथ बुलववले। पाँती उनके हाथ धरवले।।
पाँती पढ़ गुरु भइलें परसन। हरसित जिया जुड़ाइल बा मन।।
कहले भाग अवध के जागल। राम सिया के जोड़ी लागल।।
करम धरम के जे अपनावें। बिन मँगले सुख संपति आवे।।
राजा राउर अरजल पुनवा। बनके अइले राम बबुनवा।।
के बा जग में रउआ खानी। हई कोसिला जेकर रानी।।
दोहा-
धरमसील दरिआव दिल, तप के तेज निधान।
भगती के बस में जहाँ, जनमेले भगवान।।२३७।।
चौपाई-
गुरुजी तब खोलेले पतरा। देखेले जाये के जतरा।।
बोलेली राजा से रानी। हमर बात अब येगो मानी।।
सीता बाड़ी चार बहिनिया। चारू बाड़ी येक बरनिया।।
लइका बाड़ें हमरो चारे। जो बिदेह ई बात विचारें।।
बतिया जो मनवा के भावे। चारू के डोला सरिआँवे।।
दूत भेज के बतिया जानी। तब बिआह के करवा ठानी।।
सुन सुझाव रानी के सुन्नर। राजा भइले सुखी समुन्नर।।
गुरु से लगलें करे विचरवा। कइसन होई ईहो करवा।।
रउआ अब जइसे बतलाईं। वइसे हम पाँति भिजवाईं।।
हँसनी गुरुजी तुरत ठठा के। बतिया कहनी हाथ उठा के।।
धन-धन बाड़ी बड़की रानी। मिली कहाँ अब इनकर सानी।।
दोहा-
पठईं आपन दूत अब, लीं विचार के जान।
मन माफिक होखे जवन, ऊ हऽ कार महान।।२३८क।।
दूसर होई परन ना, कऽ लीहें स्वीकार।
येसे बढ़ के नीक अब, ना बा दोसर कार।।२३८ख।।
चौपाई-
राजा पाँती तुरत लिखवले। येगो दूत चतुर बुलववले।।
दे दहले पाँती सरिया के। पूछ लिहऽ बतिया फरिया के।।
चलल दूत अब लेके पाँती। जनक दूत बा बनल सँघाती।।
झरफर-झरफर डेंग बढ़ावत। चल दहले दूनू बतिआवत।।
लगल अवध के रूप सजाये। घर-घर मंगलकलस धराये।।
तोरन बंदनवार बनेले। चितरकार सब चितर रचेले।।
हर मंदिर दीवार रँगाला। देख-देख के सरग लजाला।।
खुलल खजाना बा राजा के। मन हरसित बाटे परजा के।।
जाता पूरा नगर सजावल। येक निअर घर-बार रँगावल।।
देखत नगर भरम सब भागे। ऊँच नीच के भेव न लागे।।
दोहा-
लछमी जी रीझल करें, देख जवन सत्कार।
आज अवधपुर में उहे, होता सगरी कार।।२३९।।
चौपाई-
हरसित हो सब तिरिया जाती। गावें संझा अउर पराती।।
जात पात के भेद मिटल बा। महापरब में लोग जूटल बा।।
डाला कहीं बिनाये लागल। मउरी कहीं पुराये लागल।।
लागल कुरता नया सिआये। धोती लागल नया किनाये।।
नाई धोबी सब जूटल बा। मनवा के असकत छूटल बा।।
घर-घर में घूमे चुरिहारिन। नारी पहिरें चूरी किन किन।।
टिकुली सेनुर खूब बिकाला। ऊपर से कुछ रंग मसाला।।
हाथी लगले सजी रँगाये। घोड़ा लगल सजी फेराये।।
रथ पर रथ सरिआवल जाता। नतइत सब बुलवावल जाता।।
नीन आँख में नइखे लागत। रात-रात भर बीते जागत।।
दोहा-
ईतर गंध सुगंध के, बरखा होखे रोज।
घर घर में अब सुरू बा, सदाबरत के भोज।।२४०।।
चौपाई-
पहुँचल दूत जनकपुर जाके। पाँती दे दहलस हरसा के।।
जवन बात अजोधा में भइल। चरचा उहो जनकपुर गइल।।
सुन सनेस सुन्नर सुभकारी। हरसित भइलें सब नर-नारी।।
राजा आपन भाग मनावें। रह-रह रानी से बतिआवें।।
भाग सुनैना बाँचे लगली। गोत-दयादिन नाचें लगली।।
सीता जब सुनली सनेस के। विनवेली गौरी महेस के।।
किरपा जेकर बाटे भारी। कइसे केहू रीन उतारी।।
धन बानी सिवसंकर साईं। धन-धन बाड़ू गौरा माई।।
दूनू के जे सेवे मन से। कब्बो ना ऊबे जीवन से।।
भइल कार लउकेला अइसन। मन में सोचत रहनी जइसन।।
दोहा-
तहनी के सेवब सदा, होई जो ई कार।
रहिहें सँघही अगर जो, सगरी बहिन हमार।।२४१क।।
गिरिजा घर चलली सिया, सँघे बहिनिया तीन।
चंचल चित हरसित बदन, मन गिरिजा पद-लीन।।२४१ख।।
चौपाई-
जाते माथ गोड़ पर धइली। ईहे सजी बहिनियो कइली।।
बाटे बाढ़ खुसी के आइल। बोलेली बतिया हरसाइल।।
बड़ उदार बानी हे मइया। हर संकट में रहीं सहइया।।
राउर गुनवा कइसे गाईं। सबद भाव कहँवा से लाईं।।
किरपा से बा कंठ अघाइल। भासा भाव सजी सकुचाइल।।
अस सुख के बरखा बरसवलू। मन के आट-आट उछिलवलू।।
रहनी सूनत तहर कहानी। तहरे बस भव रहे भवानी।।
जे चाहेला जवन चिजुइया। गिरे न देलू मन के भुँइया।।
तोहर जे दरबार अगोरे। सगरे सुखवा सहज बटोरे।।
सेवत रोगी होले चंगा। बहत रहें अँजुरी से गंगा।।
इहे निहोरा बा अब मइया। हरदम रहिहऽ बनल सहइया।।
सोरठा-
मन के ई उदगार, कबो न छोड़े हिया के।
रखिहऽ सदा दुलार, रहीं जहाँ तहरे रहीं।।२४२।।
फेरू आगे.....
Comment by Manoj Kumar on September 20, 2012 at 10:43pm गुरु जी , गोड लागत बानी.
हमेशा लेखा बहुत सुनर! स्तुत्य !!
भोजपुरी साहित्य के महान धरोहर बा ई कृति... यकिनन एमे कवनो दू राय नइखे !
जय भोजपुरी.
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