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करुनाकर रमायन : बालकाण्ड (२५ वाँ किस्त)

करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२५ वाँ किस्त)

चौपाई-
सुनके ई बतिया लछुमन के। लगल मुनी के देंहिया धनके।।
कहले तेहूँ लइका बाड़े। का बढ़-बढ़ के बोलऽ ताड़े।।
येक हाथ जो बाजी कसके। चल जइबे धरती में धस के।।
लागी जो ई फरसा छुटके। माई लगिहें तोरो हुटके।।
देहिया बाटे अबहिन टैरी। काहें हमर बनेलिस बैरी।।
लइका बुझ बानी समुझावत। अबहिन तोरो जान बँचावत।।
भाग अभागा जान बँचा के। ना तऽ फेंकब टाँग नचा के।।
कहलें लछुमन तनिका हँस के। गरजीं तनिका अउरी कस के।।
गरजत-गरजत कंठ पिराई। खून निकल के बहरा आई।।
कुल के हमर रीत ई बाटे। बाभन गाय केहु ना काटे।।

दोहा-
ईहे बतिया सोच के, नइखीं करत उपाय।
ना तऽ रउआ के अभी, देतीं हम बतलाय।।२२३।।

चौपाई-
परसुराम फरसा सरिआ के। चलले आपन डेग बढ़ा के।।
कहलें ते बाड़िस मनबढ़ुआ। बाप-मतारी के सिर चढ़आ।।
मौअत बा तोरो निअराइल। येही से बाड़िस छरिआइल।।
जे के सिर पर नाचे कलवा। ओकर बन होखे ना गलवा।।
ई ना अब हमरा से बाँची। काटब सिर धरती पर नाची।।
बोलऽ तानी किरिया खा के। दोस न दी केहू हमरा के।।
जीभ खींच के येकर काटब। बुट्टी-बुट्टी में हम बाँटब।।
ये के जब जमपुर पहुँचायब। चैन तबे अब हमहूँ पायब।।
तब लछुमन के लगवा गइले। दूनू हाथे फरसा धइले।।
जोड़ लगावेले हुमचा के। छोड़े ना फरसा कान्हा के।।

दोहा-
फरसा छोड़े कान्ह ना, मुनि भइले हैरान।
पीसे लगले दाँत ऊ, जोर-जोर मुँह तान।।२२४।।

चौपाई-
तबले रघुवर लगवा जा के। हाथ जोड़ कहले खड़िया के।।
ककरी चोर न पावे फाँसी। सुनिहें लोग उड़इहें हाँसी।।
गलती ना लइका के बाटे। झूठे रउआ अइनी काटे।।
माफ करीं येकर लरिकाई। हमरा बतिया के पतिआईं।।
साँच बात बतलावऽ तानी। रउआ सबसे बड़का बानी।।
मारे के बा हमके मारीं। आपन सगरे खीस उतारीं।।
लगनी हमी चढ़ावे डोरी। कइनी ना कवनो बरजोरी।।
हमरा हथवा से ऊ छूटल। का जाने कइसे तब टूटल।।
रउये अब उपाय बतलाईं। कइसे हम खिसिया खतमाईं।।
रउआ गुरू हईं हम चेला। अनजाने बतिया बिगड़ेला।।

दोहा-
गलती जहाँ हमार बा, लछमन खइहें मार।
कइसे मरजादा बँची, होई जो ई कार।।२२५।।

चौपाई-
बतिया सुन मीठास में सनल। भिरगुबंसी के भौंहा तनल।।
लगल खीस अब कूदे मन के। पानी जस तावा में छनके।।
तिलमिलात ई बतिया बकलें। अधम नीच का बाड़िस तकले।।
काबू होखे तऽ अजमाले। हाथ मिला के थाह लगाले।।
बड़ा तमासा तेहूँ कइलिस। हमरे नउआ आपन धइलिस।।
बूता जो तोरा में होखे। धऽ के हमरो धनुस सरोखे।।
अगर चढ़ा देबे ते डोरी। फेर न ताकब तोरा ओरी।।
हार मान के हम चल जायब। कब्बो ना तोसे अझुरायब।।
खतरा कऽ के नीच लजाले। धोखा दे के मीत लुकाले।।
मीठ-मीठ बतिआवऽ ताड़े। आपन दाव चलावऽ ताड़े।।

दोहा-
धइल धनुस के तूर के, बन गइले हऽ बीर।
हमर धनुस जो ना चढ़ी, काटब अब्बे सीर।।२२६।।

चौपाई-
बतिया सुन मातल किरोध के। ना उपाय जब मिलल बोध के।।
रघुबर आपन हाथ बढ़वले। धनुहा छिन के डोर चढ़वले।।
खिंचले तीर चढ़ावत डोरी। ताके लगलें चारू ओरी।।
हऽ अमोघ बँड़वा भृगुराई। कब्बो ना ई बिरथा जाई।।
बोलऽ येके कँहवा मारीं। सगरे तोहर खीस उतारीं।।
बेंधी अरजित पून लोक के। आ की तहरा परमलोक के।।
दूनू में से येक बतावऽ। तनको मत अब देर लगावऽ।।
परसुराम सुन बचन राम के। लागेले चिन्हा विराम के।।
धनुहे के सँघ तेज खिंचाइल। परसुराम लउकें मलुआइल।।
खूल गइल सब बान्हल फेंटा। कइलस अइसन ग्यान चहेटा।।

दोहा-
भूलल बिसरल बात सब, लागल परे इयाद।
टुकुर-टुकुर ताकत रहें, मन ना लगे अजाद।।२२७।।

चौपाई-
परसुराम बहुत सकुचाइले। हाथ जोर आगे खड़िअइले।।
मनवा परल बात पहिले के। बोलेंले तब नउआ ले के।।
हे राम बा बात बुझाइल। बानी खुद परमेस्वर आइल।।
जनमावल पालल आ मारल। दुनिया के करवा सइहारल।।
रउरे बस में सगरे बाटे। वेद पुरान न बतिया काटे।।
चकर तिरिथ में हमहूँ गइनी। लइकाईं में तपवा कइनी।।
खुस हो रउआ सोझा अइनी। आपन रूप चतुरभुज धइनी।।
कहनी हे बाभन तप छोड़ऽ। हमरा से अब नाता जोड़ऽ।।
लेके हमरे अंस सँभारऽ। जा के आपन मुदई मारऽ।।
हैहय राजा किरितबीज के। पितरी घाती महानीच के।।

दोहा-
काटऽ पहिले जाइके, ओ मुदइन के माथ।
ओहू के मत छोड़िहऽ, दी जे उनकर साथ।।२२८।।

चौपाई-
फेरू गिन-गिन मनबढ़ुअन के। मरिहऽ सगरे छतरीसन के।।
इकइस बेर पुरा हो जाई। तब ई तहर तेज ओराई।।
जुगवा जबे तरता आई। दसरथ के घर बजी बधाई।।
पकड़ब हम अदमी के तनवा। खेलब बनके सुघर ललनवा।।
हमरो सकती सीता बन के। जनक इहाँ धऽ तिरिया तन के।।
राजकुमारी बन के अइहें। फेरू हमरा से बिअहइहें।।
देखबऽ जब हमनी के सँघवा। रही तेज ना तहरा अँगवा।।
हमर तेज हमरा में आई। तूँ लीहऽ तप के अपनाई।।
खतमाई सब तोहर करवा। आ जाई तब हमर पहरवा।।
सुन लऽ बतिया ध्यान लगा के। भूल न जइहऽ जग में जाके।।

दोहा-
ईहे बात बताइ के, भइनी अंतरधान।
आइल ऊहे समय बा, खुलल हमर बा ग्यान।।२२९।।

चौपाई-
जुगल रूप के दरसन कइले। जनम सफल हमरो हो गइले।।
बिना दोस के पूरन रउआ। दयावान सुभ सरल सुभउआ।।
रउये बानी करुना सागर। दीनदयाल अकिल में आगर।।
बड़ा कठिन बा थाह लगावल। मरमहिया के रउरो पावल।।
जे के चाहीं सरग धरा दीं। जे के चाहीं भाग जरा दीं।।
जब राउर किरपा हो जाला। आन्हर के सब कुछ अइँकाला।।
बहिरो सुने हिया के बानी। लँगड़ो दउरे घोड़ा खानी।।
महादरीदर राजा होले। बागड़ सबसे बढ़िया बोले।।
कछनी काछे काबू वाला। निरबल सब जोधा बनजाला।।
हमहूँ रउरे बलवा पाके। मारत रहनी सबके धा के।।

दोहा-
ले लहनी बलवा अपन, बिगड़ल हमरो हाल।
लौटल हमरो हास बा, जोस भइल बेहाल।।२३०।।

चौपाई-
काटेला सब बनवा बाउर। सेवे जीव चरनवा राउर।।
रउरे सतसंगत करवाईं। रउये सदगुरु के उपराईं।।
जे रउरा भगती से भागे। ओकर नाव न अरिया लागे।।
मन में बइठल भरम अथाउर। ना जननी हम नीमन बाउर।।
असुभ छाँट के सुभ सरिआ दीं। हमरो बेड़ा पार लगा दीं।।
हे नारायन जगत बिहारी। दीं बिगड़ल करवा सइहारी।।
रउरे भगती मुकुती देला। रउआ गुरु हईं हम चेला।।
बेर-बेर हम विनय करीने। मन से राउर गोड़ धरीने।।
पुन जे अरजल हमरो होखे। छोंड़ी ओपर बान सरोखे।।
बाटे ईहे हमरो मंसा। मेट गइल बा सगरे संसा।।

दोहा-
हरदम रउये चरन में, चितवा रमे हमार।
ना बा पुन के गरज अब, रउआ रहीं उदार।।२३१क।।

सोरठा-
बोलत ईहे बात, खड़िआइल रोंआ कुली।
चल दहले मुस्कात, परसुराम जंगल तरफ।।२३१ख।।

चौपाई-
येन्ने दूत अवधपुर आइल। पाँती राजा के सौंपाइल।।
पढ़ के मनवा नाचे लागल। बेर-बेर सब बाँचे लागल।।
जे आवे पाँती पढ़वावे। रामलखन के गुनवा गावे।।
करनी पढ़-पढ़ रामलखन के। बढ़िआइल बा खुसिया मन के।।
रनिवासे जब खबर सुनाइल। रानी सभे दुआरे आइल।।
पूछेली सब दूत बुला के। बतलावऽ बतिया समुझा के।।
कइसे दूनू बबुआ बाड़े। कइसे ऊहँवा रहऽ ताड़े।।
सुननी हँ जा रामचनर के। तुरले हँऽ धनुहा संकर के।।
रहले परसुराम खिसिआइल। कइसे उनके खीस बुताइल।।
दुध मूँहा लइका हमनी के। कइसे कइले ये करनी के।।
दोहा-
बात-बात में रहे जे ठुनकत आ कोहनात।
कइसे ई आदत छूटल, नइखे बात बुझात।।२३२।।

 

फेरू आगे-----

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Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 13, 2012 at 9:53pm

गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी

एक सुरुकिये पढत गईनी ह फेरु लय मे मेरा के पढनी ह , एक दम आंखि के सोझा मय लउकत गईल ह ! सांचो बहुत बेजोड आ भोजपुरी शब्दन के मोती से अईसन ई माला रचाईल बा जवना के धाह से सगरे अंजोर हो गईल बा ।

करुनाकर रामायन के एह नेह छोह के सागर मे बेरि बेरि मन बुडकी लगावत बा !

जय भोजपुरी

Comment by Ashutosh Ranjan on September 14, 2012 at 9:53am
गुरु जी प्रणाम,
राउर लगन, राउर तपस्या के सलाम....बहुत खुशकिस्मत बानी जा जे एह रामायण के रचना के प्रत्यक्षदर्शी बने के सौभाग्य प्राप्त होत बा आ राउर रचना से दिल के, दिमाग के शुकून के प्राप्ति.
शत शत नमन बा रउवा के, राउर लेखनी के जे एह ऐतिहासिक भोजपुरी रामायण के सृजन के साधन बन रहल बा.
जय भोजपुरी 
Comment by sanjay panday on September 14, 2012 at 11:41am

guru ji gor lagat bani |

bahut sunnar rachana harmesha ki tarah 

padh ke man bhavbibhor ho gail |e sambad

bahut hi sunnar ba |

ehkar badai ta shabdseema ke bahar ba,

bas ek bar fir god lagab

parnam |

Comment by Anoop Srivastava on September 14, 2012 at 1:52pm

गुरु जी सादर प्रणाम,

हमेशा लेखा बहुत नीमन, लयबद्ध आ हृदय स्पर्शी .... जय भोजपुरी ।

Comment by Brij Kishor Tiwari on September 16, 2012 at 1:04pm

गुरु  जी  के गोड़ लागsतानी............
हर बेर मतीन अमृत के बरिखा .....
बहुत निमन..........  

Comment by Manoj Kumar on September 16, 2012 at 3:06pm

गुरुजी प्रणाम आ जय भोजपुरी.

सांचो ई अमृत के बरखा बा...ई साहित्यिक कृति के पढि के हमनी के धन्य हो रहल बानी जा...!

बहुत-बहुत धन्यवाद.

जय भोजपुरी.

Comment by jitendra kumar thakur " dev " on September 20, 2012 at 2:53pm

guru ji ke charan me bar-bar prnam

jai bhojpuri

  guru ji aap ke rachna ke bare me kuchh kahal awri suruj ke diya dekhawe ke brabr ba .bhute hi bejor ,

aagila bhag ke intjar me ...........

jitendra kumar thakur 

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