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प्रनाम आ जय भोजपुरी
आगि लागल बा , सब केहु गांव छोड के भागत बा , तले ले एगो बुढ लागल एगो गडहा मे से बाल्टी मे पानी भर भर के जरत पलानी प उबिछे । उ पलानी ओकर ना रहे दोसरा केहु के रहे आ इहे देखा देखी ओह गांव के मय लोग जेने धुर माटी पानी लउकल लेके लागल आगि बुतावे । 100 गो घर मे से 10 गो घर बाचि गईल आ अगिला 100 दिन मे मय घर रेडी ।
( एजुगा भागल सबसे बरिआर रास्ता सब केहु के लउकत रहे )
समाज कहत बा की दहेज ना लेबे के चाही ना देबे के चाही बाकी एगो गांव के सब केहु दहेज लेते देत रहे । एगो परिवार जेकर लईका डाक्टर रहे उ बिना एको नाया लेहले एगो गरीब घर के लईकी से बिआह कईलस । अगिला साल 7 गो घर के लोग अईसने कईल ।
( एजुगा पहिले इहे रहे कि कहला मे का जाता )
फेंड लगावे के चाही , बाकी गांव के आरी कगरी फेंड खुंट लउकते ना रहे । एगो मलेट्री मैन रिटायर हो के गांवे अईलस आ फेरु शुरु कईलस फेंड लगावे के काम , साल भरत होत होत ओह गांव के हर दुआर आ डहर प फेंड लउके लागल ।
( सब केहु कहेला की फेंड लगावला से हमनिये के फायदा बा बाकि लगाओ के ? )
हम नईखी जानत की समाज एह मे से कवना चीझु से बनी , बाकि हम ई जानत बानी की कवनो नीमन चीझु जवन समाज आ ओह समाज मे रहे वाला लोगन खाति बनी त ओह के समाज दु भा चार भा दस दिन प मानी जरुर ।
सती प्रथा के कवनो जबाना मे बडा पावन चीझु मानल जात रहे , एहिंग बिधवा बिआह के मान्यता ना रहे त ओजुगे बाल बिआह जईसन चीझु के मान्यता रहे । एह कुल्हि के बिरोध एक दु आदमी शुरु कईल आ अब देखी सभे ।
बिनोबा भावे गरदन प दुनाली भा राईफल तानि के भुदान आन्दोलन ना चलवले रहले । जय प्रकाश के कहल दु नाव वाला लोग बिहार मे आजुओ भेटा जाई ।
बाबा आमटे , झुठहु ना नु पहाद खोनत रहले ह , दशरथ मांझी , समाज के बदले के तिकवते त आजु उ राही ना बनल रहित ?
ठवे ठवे लोग लउकत बा जे अकेलही अपना दम प समाज मे बदलाव ले अईले बा आ ले आवत बा तबो हमनी के तिकवत बानी जा की ना हम ना समाज बदलो ? आखिर काहे ? आ कईसे ? काहे हमनी के आ कब ले हमनी के समाज के ओरि अंगुरी देखा के अपना के चुप कराईब जा ?
जय भोजपुरी
नवीन भाई प्रणाम,
नवीन भाई जी प्रणाम आ जय भोजपुरी,
एकदम सही बात बा .... रउरी एकहक बाति से हम सहमत बानी आ साँचि कहीं त अपना औकात भर एही प्रकार से जियला के कोशिशो करत रहेनी, कब्बो-कब्बो जब कमजोर पड़ेनी त वाकई राउर ई सवाल कि का एगो आदमी समाज बदल सकेला? हमरियो दिमाग मे आवेला, फेर धीरे धीरे अपना के समझावत आ जोश दियावत लाग जानी .... बहुत नीमन ढंग से सवाल क के रहियो देखवले बानी रउआ .... धन्यवाद आ जय भोजपुरी ।
Comment by संजीव सिंह on September 13, 2012 at 2:13pm नवीन भईया प्रनाम,
देखी कवनो भी बडहन सामाजीक काम के करे से पहिले लाखो लोग के राय-मसवरा अउर ओह लोग के एगो सुथर गुमेट जरूरी होला। बाकीर सच्चाई त ईहे बावे कि अईसन मुद्दा बहुत कम लऊके ला जवना मे ढेर सारा लोग के एके सोच होखे। फलत: संगठन ना बन पावेला अउर एगो गंभीर मुद्दा के सत्यानाश पिटा जाला। ई बात त बावे कि ऐही समाज मे से कुछ लोग (खाली गिनल-चुनल) आगे आवे ला अउर बिना कवनो इशारा, संगठन, राय, गुमेट अउर झिझक के हालात बदले के कोशिश करे ला अउर बदले ला भी। बाकीर अईसन लोगवे बहुत कम संख्या मे होखे ला। कारण ईहे बावे कि (रउऐ कहल ई बात हवे) सभ लोग चाहे ला जरूर कि परिवर्तन होखे बाकीर केहु ई ना चाहे ला कि खुद ऊ भा ओकरा घर के केहु ओह परिर्वतन के अगुआ बनो। सम्स्या ऊहे बावे कि सभकर लालसा बा कि केहु फेरू जय प्रकाश नरायण अउर भगत सिंह बनो बाकीर ऊ खुद नईंखे बने के चाहत।
ऐह भागम-भागम भरल जिनगी मे केहु के लगे (शायद) ऐतना समय नईंखे जे ऊ कवनो बदलाव के बात करो। कुछ लोग त अईसनो भेंटाई जे ई मान लेले बावे कि जवन कुछ अपना सामने बावे ऊहे बस हमार हवे, ओही प बस हमार अधिकार बावे अउर ऊहे सभ हमहु अपना अगीला पिढी के देम। खासकर के अधीकार के मामला मे अपना कोरी ईहे देखल जाला। अउर ऐह सभ के बादो अगर केहु ऐह भिड मे से उपर उठे के कोशिश भी करेला त केंकरा नियन बहुते लोग बावे जे ओकरा टंगरी ध के निचे खिंच देवे ला।
बाकीर अब समय कुछ अईसन बावे जे अभियो अगर हमनी अपना अधीकार अउर सम्मान के बात ना कईंनी जा त ऐतना ना खातहा मे चली जाऐम सन कि टंगरी ध के खिंचल त दुर के बात बावे, लोग ऐतना ना उपर से दाब दी कि पहचानल मुश्किल हो जाई कि आखीर हम हई के?
जय भोजपुरी
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