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आखिर इ हद के तय करी?

सब केहू के प्रणाम,

 

अबगे नवीन भाई के एगो ब्लॉग पढ़ात रहनी हाँ की के कहत बा की "अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता"?, यदि मंजील पता होखे आ राश्ता सही होखे त उन्हवा पहुंचे से कोई नईखे रोक सकत..उदाहरण भी बहुते बढ़िया देहले बानी उन्हा के...आ ओह नामन में एगो नाम दशरथ मांझी जी के बा..सान्चहू ओह संकल्प के सलाम बा, ओह सोंच के सलाम बा.....
 
 
थोड़ा एह बात के आगे बढावल जाओ आ दशरथ मांझी जी के इर्द गिर्द ही चर्चा के राखल जाओ..त का दसरथ मांझी जी के एह संचार युग में माईक लेके आपन प्रचार प्रसार करे के पडल? ना उन्हवा के त कुछुवो ना कईनी , सिर्फ आपन लक्ष्य के ध्यान रहे आ ओह लक्ष्य के प्राप्ती उन्हा के जीवन के उद्देश्य....बाकी एगो सही जज्बा के सही संकल्प के सभे सलाम करेला..हमनी आ रउवा सभे ओहाकर प्रशंशा करत बानी जा...हमनिए के मुन्हे मुन्हे उन्हा के नाम जुबान जुबान तक पहुंचा देहनी जा..आ एगो अबर दुबर गरीब दलित के आज अजर अमर बना देहनी जा...इतिहास में नाम दर्ज हो गईल उन्हा के..का दसरथ मांझी जी की इ सपना रहे की हमार नाम अमर होखे? हमरा त लागत बा की इ सपना त उन्हा के सपनों में ना देखत होखम. त फेर उ आदमी अमर कईसे हो गईनी? हम आ रउरा उन्हा के अमर बना देहनी जा.....एगो सही, सच्चा, जोश के सभे पसंद करेला...
 
 
लेकिन एह जोश में जब आदमी होश खो देवेला त उ अराजकता के तरफ धकेलेला...
 
 
केहू कहल की पागलपन ठीक चीझ ह. आदमी के जुनूनी होखे के चाँही. आदमी यदि जुनूनी ना होई त मंजिल के पाई कईसे? हमहूँ एह बात से इत्तेफाक राखत बानी, लेकिन एह बात के साथ की जूनून, पागलपन जब तक होश के हद में रहेला, काबू में रहेला. जब इ  जूनून बेकाबू हो जाला, होश खो देला तब एकरा सही आ गलत राश्ता के पहिचान ना बुझाय आ इहे पागलपन के जनक होला..एकरे के लोग मानशिक असंतुलन कहेला....आ मानशिक असुंतलन के साथे कवनो मंजिल ना भेंटाय बल्कि खुदे इलाज करावे के पड़ जाला. हम जानत बानी की जल्दी बदलाव के चाहत सभे के होला..हमरो बा...आ होखे के चाँही भी...लेकिन जल्दी बदलाव सही भी होखे के चाँही...आ सही तबे होई जब जल्दी जल्दी के फिकिर के साथे साथे ओह्कर पावे के तौर तरीका भी सही होखे.
आजू यदि दशरथ मांझी जी के बात होत बा, बिनोबा भावे जी के बात होत बा त इन्हा लोग आपन आपन मंजील के पावे के बड़ा साफ़ सुथर राश्ता अपनईनी सभे.. बिनोबा भावे जी के भूदान आन्दोलन आ आज के नक्सल आन्दोलन के फर्क के समझे के पडी...शायद दुनु विचारधारा एक होते हुए भी दुनु के क्रियान्वयन के तरीका अलग अलग भईला से दुनु के लोग दू तरह से विवेचना करेला...
 
 
हम कुछ दिन पाहिले लिखले रन्ही "हम विरोध काहे ना करी". हम आजो कहत बानी की विरोध त होखही के चाँही. लोकतंत्र में विरोध ना होई त कंहवा होई? लेकिन एह विरोध के तौर तरीका के डीसाइड करी? के इ डीसाइड करी की का नैतिक तरीका बा का अनैतिक? के इ डीसाइड करी की विरोध करे के तरीका के का हद होखे के चाँही? जवन रउरा हद में लागत बा, हमरा उ हद से बाहर लाग सकत बा. जवन रउरा हद से बाहर लागत बा उ हमरा हद में लाग सकत बा...बात त ठीक बा. लेकिन एतना त हमनी सभे करिए सकत बानी जा की कवनो अईसन अभिव्यक्ती ना होखे जेहसे केहुके आस्था पर चोट होखत होखे..कवनो अईसन विरोध ना होखे जेहिसे केहू के शारीरिक कष्ट  पहुँचत होखे..कवनो अईसन आन्दोलन ना होखे जेहसे हमार आ राउर मेहनत के कमाई से बनल राष्ट्रीय संपती के नोकसान  होखत होखे. का विरोध के स्वर के अशिष्ट भईल जरुरी बा? का विरोध शिष्टता के साथ, लेकिन पूर्ण मजबूती के साथ नईखे हो सकत?
 
 
केहू कहल की भाई रउवा कवना ज़माना में जियत बानी? रउवा मेमियात रन्ही, एहिजा के सुनत बा राउर? एहिजा मेमियायिल केहू के कान तक भी ना पहुंची...इंहवा सीधे सीधे वार करे के पड़ेला..कान में बात के ठुंसे के पड़ेला.....हम कहनी की भाई राउर बात से सहमत..लेकिन हम इ कत्तई माने के तैयार नईखी की यदि राउर मिमियायिल (शिष्ट भाषा में कहल बात के आजकाल लोग इहे कहेला) ना सुनल जाए त राउर चिचियायिल सुनल जाला..बलुक हम त इहे कहेम की यदि राउर मिमियायिल दिल तक असर करे में थोरहू सक्षम हो गईल त इ ओहकर कामयाबी बा..लेकिन रउरा चिचियायीला के उलटे असर पड़ जाला..चिचियायीला पर ही बहस होखे लागेला आ असल बात ओह शोर में कंही गूम  हो जाला....यदि विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन के अपार सफलता ना मिलल त थोड बहुत त मिलबे कईल...लेकिन आज के नक्सलवाद के हश्र रउरा आ सभे देख सकत बानी जा.
 
 
सामाजिक बदलाव जरुरी बा, आमूल चुल परिवर्तन जरुरी बा..एह पर चर्चा हो सकत बा...एह पर वाद विवाद हो सकत बा...आ यदि जरुरी बुझाय त कवनो बदलाव के विरोध भा बदलाव लावे खातीर मौजूदा सीस्टम के विरोध हो सकत बा..होखे के चाँही..लेकिन शालीनता से..काहे से की इतिहास आ दुनिया   राजा सीधार्थ से जादे महात्मा बुध के इयाद करेला, मानेला, पुजेला, सम्राट अशोक से जादा अशोका महान के मानेला , बुझेला, मोहनदास से जादा महात्मा गांधी के जानेला......इतिहास सही काम के गलत तरीका से कईला के भी कबो माफ़ ना करे.....
 
 
जय भोजपुरी 

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Comment by Anoop Srivastava on September 13, 2012 at 2:06pm

आशुतोष भाई प्रणाम,

अबहिने हमहूँ नवीन भाई जी के लेख पढ़नी हईं ....आ ओकरे तुरत बाद राउर दशरथ मांझी जी पे केन्द्रित एतना नीमन चर्चा ...सही कहले बानी रउआ, गलत सिस्टम के विरोध होखे के चाही बाकी शालीनता से ..... जय भोजपुरी ।

Comment by संजीव सिंह on September 13, 2012 at 3:02pm

आशुतोष भाई प्रनाम,
बिजोड़! बहुते बिजोड़. एक दम आज जरुरत ईहे बावे की हमनी अपना लक्ष्य कारी निहारत आराम से चलायमान रही सन. कहे की काहावत भी बावे की बरसे वाला घाटा कबो गरजे ला ना. अउर जवना के बरसे के रहेला ऊ कही से भी मेडरियात-मेडरियात अपना जगह प आई अउर धीरे से पूरा आलम के भींजा के अपना रास्ता आगे बढ़ जाई.
जय भोजपुरी

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 14, 2012 at 12:40pm

आशुतोष भाई प्रनाम आ जय भोजपुरी

एक दम सही कहनी , आ सबसे बड चीझु की कुछ मिली एह खाति कईल जाउ आ ना मिली त छोड दिहल जाउ वाला बात सही नईखे , प्रयास करे के चाही , लागल रहे के चाही , प्रयास नीमन होई त अउरी लोग जुटी आ नाहियो जुटी त राउर नीमन प्रयास आवा वाला पीढी के एगो सबक त जरुरे दे के जाई , अईसे प्रयास नीमन होखे त सफलता निस्चित बा ।

बढिया लेख ।

जय भोजपुरी

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