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स्व. श्री कैलाश जी के परिचय उँहे के स्टाईल मे -
चौसा बक्सर बिच में गंगा से कुछ दूर
नाव कैलाश बाटे गाँव कमरपुर
"चतुरी चउबे"
चटकदार चरखाना लुंगी ,
पहिर के चतुरी चउबे,
मर्जादी बरियत खियावे ,
दुपहरिया में गउबे ।
काट नर इली गंजी रहे ,
हाँथ में रहे घडी,
दाडी मोछी सफाई रहे,
बहसत रहले बड़ी ।
सियल मुह रहे लुंगी के ,
पछुआ रहे ना खसल,
हाली हाली चलत रहले ,
लुंगी गोंड में फसल ।
लटपटाइ के लंगटा होके ,
गिरले बीचे पांति,
फूटी गइल दही के हांड़ी ,
खपड़ा गइल आंती ।
कुछ देरी बेहोश हो के ,
ओसही पडल रहले ,
'हाय हाय चउबइया मुवल'
सभे लोग कहले ।
पंखा पानी दिहल गइल तब ,
चतुरी चउबे जगले,
झटपट लुंगी पहिर के आपन ,
गूंगी साध के भागले ।
स्व. कैलाश राय " कमरपुरी " जी के काव्य संग्रह "समाज दर्पण" से
जय भोजपुरी
हा हा हा........
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