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करुनाकर रमायन : बालकाण्ड (२४ वाँ किस्त)

करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२४ वाँ किस्त)

चौपाई-
गइले राम धनुस के निअरा। हुदबुद में बा सभकर जिअरा।।
अइसन बेरा आइल बाटे। मनवा लगे टँगाइल बाटे।।
आँख मून के माथ नववले। तब धनुहा पर हाथ बढ़वले।।
तबले भारी सोर सुनाइल। चट दे सभकर आँख मुनाइल।।
डोरी छूअत धनुहा टूटल। जस अकास से बिजुरी छूटल।।
केहू के ना परल दिखाई। कइसे धनुस गइल छितराई।।
भइल अचम्भा बड़का भारी। भौचक हो ताकें नर नारी।।
सीता रहली मँगले बरवा। सकती कइली पूरा करवा।।
लगत अकासे बाजे बाजा। बहुते हरसित भइलें राजा।।
सुरगन लगले सुमन गिरावे। जोर-जोर जयकार मनावे।।

दोहा-
फूले से अब राम के, लगल ढपाये देंह।
खुसी खूब बरसत रहे, रहसत रहें बिदेह।।२१४।।

चौपाई-
बाजे लागल ढोल मजीरा। गोड़ लोग के परे न धीरा।।
फल के फुलवारी झहराइल। लउकेली आसा अगराइल।।
बाजे पिपिही बाजे तासा। कूद-कूद जन करें तमासा।।
अइसन सुघर मूहुरत आइल। सुध-बुध सभकर लगे भुलाइल।।
चंग मिरदंग सुभ सहनाई। बाजल दुख भागल पहुनाई।।
बाजे झाल झाँझ करतलवा। चिन्ता चलली छोड़ महलवा।।
हँस-हँस बतिया करें सुनयना। चहकेलें सब सुग्गा मयना।।
सिय के साँच भइल सब सपना। धइलस काया रूप कलपना।।
सखी सलेहर सोहर गावें। लइका नाचें ताल बजावें।।
देख जनकपुर के हरसाइल। सरगो के बा डाह समाइल।।

सोरठा-
सब किन्नर गंधरब, नाचे गावें झूम के।
लागे कवनो परब, आज जनकपुर धाम में।।२१५।।

चौपाई-
सतानंद सिय के समुझवले। हथवा में जयमाल धरवले।।
कहलें बेटी डेग बढ़ावऽ। जय माला जा के पहिरावऽ।।
सिय जब चलली ले जयमाला। देख रूप रुपवा सरमाला।।
चान मिटा के दाग देंह के। मुँह पर नयनू पोत नेह के।।
ओपर छिरकत लाज ललाई। चलली बढ़त सिया सकुचाई।।
छवि के छाल्ही छीन मथाइल। ओमें से नयनू निकलाइल।।
ओही से सिरजावल तनवा। अँगुरी सगरी हाथ बदनवा।।
लाल गुलाब अउर अढ़उल के। रसवा काढ़-काढ़ सब फुल के।।
रँगल रहे सब नख-अरु येड़ी। गिरह-गिरह पर बान्हल मेंढ़ी।।
मेहदी के सत से सरिआवल। तरहत्थी में चितर बनावल।।

दोहा-
सोभा सब संसार के, धऽ नारी के रूप।
आगे सखियन सँघ चले, छीटत छवि के घूप।।२१६क।।
रघुवर के लग पहुंच के, परल बात सब भोर।।
लगल टकटकी आँख में, जइसे चान-चकोर।।२१६ख।।

चौपाई-
हाथे हार रहे ठकुआइल। चंचल चित लागे चकुआइल।।
ना रघुवर के झूकें मथवा। ना सीता के ऊठे हथवा।।
अँखिया अँखिया में बा ढूकल। करवा बाटे सगरी रूकल।।
तनवा तनले बा पुरुसारथ। हथवा धइले बा परमारथ।।
दसा देख लछुमन घबड़इले। भाई के लजवा चल गइले।।
गिर गइले गोड़े पर जाके। मथवा पँउआ पास सटा के।।
टूटल ध्यान राम हरसइले। झुक नीचे अँकवारी धइले।।
सखी येक सिय के हुदकवली। जयमाला सीता पहिरवली।।
पहिरत हार हिया हरसा के। बिहँसेले सुर सुमन गिरा के।।
उमड़ल भीर लगल जस मेला। देख बरम माया के खेला।।

दोहा-
महा मिलन के बात ई, बूझेले ना मूढ़।
सबके बस के ना हवे, रहस राम के गूढ़।।२१७।।

चौपाई-
बीरन के साहस बा सटकल। कपटिन के सँसवा बा अँटकल।।
राजा सब लउके सरमाइल। जइसे सभकर सान बिकाइल।।
कादर सगरे कपसल लागें। चुपके छोड़ सभा के भागें।।
गालू लगलें गाल बजावे। हाथ भाँज भड़की दिखलावे।।
सहजे ना बिआह हो जाई। पहिले हमनी करब लड़ाई।।
जिअते ना कनिया ई पइहें। चाहे कतनो जोर लगइहंे।।
सिय के ना जाये देहब जा। कालो से लोहा लेहब जा।।
लछमी नार न के के भावे। के ना आपन जोर लगावे।।
नारी लगली गारी पारे। ठकुआके मुँह सभे निहारे।।
विहँसे राम विचार छुपा के। सीता खीसे तिरछें ताकें।

दोहा-
गड़बड़ झाला देख के, ठोके लछमन ताल।
तनल बरौनी बीर के, अँखिया भइली लाल।।२१८।।

चौपाई-
हाथ उठा के कहले लछमन। अब मत बढ़-बढ़ बात करऽ सन।।
होखे बल जघँवा में जेके। आ के अब हमरा के रोके।।
चुप भइले बा बढ़ल ढिंठाई। अब ना बेसी बात सहाई।।
भइया मत हम पर खिसिआयब। मत कवनो आदेस सुनायब।।
हम सबके समुझावऽ तानी। सेखी सब सटकावऽ तानी।।
तबले परसुराम जी अइले। कान्हे टाँगी फरसा धइले।।
लटकल धनुस रहे कँखवा में। आगी बरत रहे अँखवा में।।
गोर देंह पर खीस चढ़ल बा। सोना पर जस आग परल बा।।
माथे जटा घटा अस लागे। परलय होखे आइल आगे।।
गेंड़ा अस बा गरदन छाती। बजर निअर छाती के बाती।।

दोहा-
मुनि के सकल सरूप में, पहुचल जइसे काल।
घबड़इले तब भूप सब, बिगड़ल सभकर हाल।।२१९क।।
लगले घूमे सभा में, रह-रह भाँवक मार।
जइसे हाथी सनक के, ढूढें अपन सिकार।।२१९ख।।

चौपाई-
राजा सबके सेखी सटकल। मुँहवे में सब बतिया अँटकल।।
परसुराम जी जेन्ने जाले। तेन्ने सब राजा खड़िआले।।
हाथ जोर सब माथ झुँकावें। बपसी सँघ निज नाव बतावें।।
गीरेले गोड़े पर जाके। बोलेले बतिया घिघिया के।।
पुरुखन के सब नउआ ले ले। आपन-आपन परिचय देले।।
के तूरल ई धनुस बतावऽ। झटपट ओके सोझा लावऽ।।
धनुहा धइल धराऊ सिव के। तुर कलवा उपजवलस जिव के।।
अइसन भारी कवन मुरुख बा। मरी हाथ से ईहे दुख बा।।
केकर माई बाघ बिअइली। माथ चढ़ा मनबढ़ुआ कइली।।
कवनो तरे आज ना छूटी। परन कबो ना हमरो टूटी।।

दोहा-
छतरी सब संसार के, मुदई हवें पुरान।
कतनो होई बीर ऊ, बँची न ओकर जान।।२२०क।।
ओठ खूब फरकत रहे, पीसत रहलें दाँत।
लगवा जाके जनक जी, बतलवले सब बात।।२२०ख।।

चौपाई-
सुनके बतिया धनुस भंग के। बदले लागल रंग अंग के।।
मुँह से ज्वालामुखी फूटल। आसमान से बिजुरी टूटल।।
खीसी से ऊ काँपे लगले। रूप देख कुछ राजा भगले।।
केन्ने बा अब्बे बतलायब। बैरी के बलिदान चढ़ायब।।
लेके लगले भाँजे फरसा। होखे लगल खीस के बरसा।।
लछमन से ना बात सहाइल। धीरे से बाड़ें खड़िआइल।।
कहलें मुनि से खीस नेवारीं। बाते से मत मुदई मारीं।।
गलती ना केकरो से भइल। छुअते में धनुहा टुट गइल।।
भैया के का दोस लगाईं। रउआ के कइसे समुझाईं।।
पहिले पता रहित जो बतिया। धनुस हवे ई रउर सँघतिया।।

दोहा-
ना जाइत छुवे केहू, धरित न ओपर हाथ।
जागित राउर खीस ना, टनकित नाहीं माथ।।२२१।।

चौपाई-
मुँहवा लउके लाल अँगारी। जीभ लपट मारऽता भारी।।
बज्जर दाँत ओठ के काटे। बोली चोख तीर से बाटे।।
हाथ घुमता मुगदर खानी। झूठे टाँगी टँगले बानी।।
गुरू हईं गुरुता अपनाईं। मत छुद्दर के चाल दिखाईं।।
घटा जवना बेसी गरजेला। पानी ओसे ना बरसेला।।
बीर जवन बेसी बमके ले। खरवो ना ओसे टकसेले।।
बाभन सबके कामे आवें। सबका से सुभ करम करावें।।
रउआ कवना राह अपनवनी। अवते सुभ में बिधिन लगवनी।।
आसन लगा कहीं पर बइठी। झूठे मत अब बेसी अँइठीं।।
विपर करम जब आपन छोड़े। आगे केहू हाथ ना जोड़े।।

दोहा-
अइसन कइगो धनुस हम, तुरनी खेलत खेल।
का बाटे ये धनूस में, कइनी खड़ा झमेल।।२२२।।

 

फेरू आगे.......

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Comment by पियूष द्द्विवेदी 'भारत' on September 3, 2012 at 11:51am

बहुत बहुत शुभकामना विकल जी....... ई बहुत ही बढ़िया काम रऊरा उठवले बानी! चंपले रहीं गुरु...!

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on September 4, 2012 at 9:02pm

गुरुजी गोड लागत बानी

हरमेसा लेखा एक हाली फेरु से बेजोड बरिआर आ भोजपुरी साहित्य ,,, साहित्य से पोरे पोर भरल करुणाकर रामायन आवे वाला पीढी खाति एगो धरोहर बडुवे जवना से हमनी के परिचय हो रहल बा ।

कोटि कोटि नमन रउवा के आ करुनाकर रामायन के ।

जय भोजपुरी

Comment by Ashutosh Ranjan on September 5, 2012 at 11:45am

गुरुजी गोड लागत बानी,

अद्भुत काम!!!!...बेजोड़ साहित्य......

नमन.
जय भोजपुरी 
Comment by Manoj Kumar on September 5, 2012 at 11:28pm

गुरु जी प्रणाम आ जय भोजपुरी!

करुनाकर रामायण के बहुत ही रोचक प्रसंग एह किस्त में पढे के मिलल.

धनुष टुटे के घटना, परसुराम जी के क्रोध, राम के धैर्य आ लछ्मन के तेजतर्रार वाणी के वर्णन बहुत सुन्नर रुप में सामने आईल ह.

 बहुत-बहुत धन्यवाद आ भोजपुरी साहित्य के समृद्धि में योगदान खातिर राउर लेखनी के शत-शत नमन.

जय भोजपुरी!

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