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घरनी रीता भोली भाली , झबरा अजब निराला था ।

यमुना तीरे भोला बसता , झबरा कुत्ता पाला था ।
घरनी रीता भोली भाली , झबरा अजब निराला था ।
साथ साथ था खाना पीना , साथ घूमने जाता था ।
भोला जाता साथ अखाड़ा , झबरा को ले जाता था ।
काटे चाटे नहीं किसी को , जो दिया वहीं खाता था ।
भोला की पुतली फिरी नहीं , तब तक वो मुड़ जाता था ।
जो भी दरवाजे पर आये , प्यार से पूँछ हिलाता था ।
हर पल दरवाजे पर रहता , और कहीं ना जाता था ।
हाथी सा था कालू भैंसा , रोज खेत चर जाता था ।
नुकीली सींग खंजर जैसे , कोई पास ना जाता था ।
दूर दूर पर घर रहता था , कालू से डर जाता था ।
भोला चलता लेकर लाठी , तो भैंसा भग जाता था ।
शाम चला भोला झबरा संग , टहलते निकल गया दूर ।
देखा कालू खा रहा खेत , लाठी ले चला मजबूर ।
लगा बरसने उस पर डंडा , भैंसा क्रोधी हुआ चूर ।
कालू झट झपटा भोला पर , झबरा पूंछ खिंचे बन सूर ।
कालू झट झपटा भोला पर , झबरा टाँग खिंचे सूर ।
भोला जब मार मार हारा , कालू पटका जमीन पर ।
झबरा कान खिंचा कालू का , भैंसा पैर रखा सिर पर ।
झट डाल दिया सिंग पेट में , खेत रहा वीर जमीं पर ।
कालू झबरे को ललकारा , झबरा झपटा भैंसे पर ।
कालू भागा गाँव की ओर , झबरा भौं भौं करे जोर ।
कोई ना सुनने वाला था , झबरा बस लगाया जोर ।
भोला गया माया को छोड़ , झबरा थका करके शोर ।
दाँत से काट लिया कलाई , लेकर चला घर की ओर ।
रीता देखत हुई हैरान , झबरा खा गया पति मोर ।
मार कुल्हाड़ी सिर अलग की , झबरा मरा बन के चोर ।
कालू आ झबरा पर झपटा , रीता भगी करते शोर ।
आह ! कालू ने मांग उजाड़ा , हाय झबर ! गयी मति मोर ।
मारी कुल्हाड़ी अपने सिर , तीनों गये स्वर्ग की ओर ।
श्याम नारायण वर्मा

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Tags: अपना, सोच,

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