गगन छुवे लहरा के उखिया , धान झूमी मारे हिलोर ।
घर से निकल घूँघट गिराके , आव चल खेतवा के ओर ।
अब मौसम केतना सुहाना , रिम झिम फुहार बा चहु ओर ।
नाचेला मोरवा मस्ती में , दादूर मचावेलन शोर ।
पपीहा के बोली सुनाला , काले घन घेरे घनघोर ।
हरी घासों के चढ़ल जवानी , लागे झूमे पोरे पोर ।
लहरा के झूमे रहरीया , मूँगवा के बढ़ेला डोर ।
झूमी गावेले सोहत में , बनिहार खुशी में चहुओर ।
वर्मा घूमे आई मस्ती , साथे चली कहे मन मोर ।
पछतईबू जाके शहरिया , मौसम के कितना बा जोर ।
श्याम नारायण वर्मा
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