अपने लोग बैरी बनेलन , जब राह गलत हो जाला ।
बात बात में बात बढ़ेला , कहीं चले लाठी भाला ।
एक हाथ ताली ना बाजे , बाजे जब दो मिली जाला ।
जब साजिश कवनों ना भईल , कइसे भईल घोटाला ।
घर से देख माल बा गायब , बाहर लागल बा ताला ।
कइसे चली अब भाई चारा , जब काटी केहू गाला ।
सबसे मिताई तबतक चली , रही साथ निभाने वाला ।
पीठ में केहू खंजर भोंकी , बनी साथ निभाने वाला ।
मानव ही जब पशु बन जाला , विवेक खत्म हो जाला ।
मानव ही जब पशु बन जाला , विवेक कहाँ रही जाला ।
कोई जो कुछ भी समझाये , कुछुउ ना गले घोंटाला ।
वर्मा खट्टा मिट्ठा है जग , समझ समझ भूली जाला ।
श्याम नारायण वर्मा
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