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एमें कवनो सक नइखे की भोजपूरी एगो भरल पुरल भासा ह. एकर दायरो बहुत बड़हन बा.
उत्तर परदेस से ले के बिहार तक ई फइलल बा. हिन्दी में जेतना बोली के गिनती कइल
जाला हमरा खियाल से ओइमें भोजपूरी सबसे बड़का भासा बा. बाकिर हर जगह भोजपूरी
एक जइसन ना बोलल जाला. हम जवना इलाका के रहे वाला हई उहाँ 'अबे आवतानी ' बोलल
जाला. कई जघे 'अबे आवत हई ' आ कई जघे, जइसे गोरखपुर में 'अबे आवताटीं' बोलल जाला.
ए से भोजपूरी में कुछ लिखे खातिर बड़ी एहतियात बरते के पड़ी.
भोजपूरी भासा में अब ढेर पतिरका भी निकले लागल बा. लेकिन ओमें जवन लेख लोग लिख~ता
ओपर मानक हिन्दी के परभाव ढेर दिखाई देला. हम ई कहे के चाह~तानी की संस्कीरित आ हिन्दी के
परभाव से भोजपुरी के बचावल ना जा सकेला. बाक़ी ई भासा के सुभाव के हिसाब से ही, कवनो भासा हो,
ओकर असर अपनावल जाव तबे ई भासा के ठीक से उन्नती हो सकेला. भोजपूरी के लेखक लोग के
ईहो कोसिस करे के चाहीं की कवना अच्छर के केंगा से उपयोग कइल जाला. भोजपूरी में अच्छरन के जोड़
(संयुक्ताक्षर) के परयोग बहुत कम होला. भोजपूरी में निरमोहिया बोलल जाला निरमोहिया ना.
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