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रतन काका ( एगो कहानी ) * दूसरका भाग *

गर्मी के रात रहे , उमस के रात । गर्मी बिरहन औरत के तरह कलपत रहे आ कलपावतो रहे । मच्छर सुदखोर महाजन के तरह खुन चुसत रहस । बाकी काका के एह सब बातन से कुछ फर्क ना पड़त रहे , काहे कि उनुका अँदर त चिन्ता के बोरसी जरत रहे । असहुँ किसान के शरीर त स्टील के होला , कइसन गर्मी ? कइसन जाड़ा ? काका सुत के सोचत रहन , ''बबुआ के अइला पाँच दिन हो गइल बाकिर अभी ले चिन्तावा के बियाह के नामो ना लेल सा । घर त बनी चाहे ना बनी । अब का करी , ए महादेव ? '' काकी त कहिए फरिआ देले रहिती बाकिर काका बरीजी देले रहले .'' चिन्तावा के माई ! लइका अब सेआन हो गइल बा , कमाता , तू कुछ मत बोलिह ना त हाथ से निकली जाई त पछताए के परी । हमही मोका देखी के समझाईब ।'' सातवा दिने जब आकाश शहर जाए के तैयारी कइलस त काका बैग ले के बस धरावे चलले । जब रोड के जरी अइले त कहले , '' बेटा । चिन्तावा सेआन हो गइल बिया ओकर बियाह कइल कतना जरुरी बा , तू ही सोच । नाया घर ना बनी त ढहल घर मेँ ताहार आ चिन्तावा के शादी कइसे होई ? '' '' बाबु जी ! हमहुँ कहिए से एगो बात कहल चाहतानी । हम दिल्लिए मेँ शादी क ले ले बानी , राउर पतोह बाड़ा सुनर बाड़ी । हम किस्त प तीस लाख मेँ एगो फ्लैटो ले ले बानी बाकिर रउरा चिन्ता मत करब हम गाँवो खातिर कुछ करब । '' बेटा के बात सुन के काका के कान मेँ सीटी बाजे लागल , शरीर सुन्न हो गइल । कब बस आइल , कब बेटा गइल आ कब सइ के नोट हाथ मेँ धरवलस कुछ पता ना चलल । बहुत देर रोड प पटुअइला के बाद काका के अँदर से आवाज आईल '' का चिन्ता कइले बाड़ ? अभी ताहारा हड्डी मेँ बहुत जान बा । आपन खेत नइखे त का भइल ? दोसरा के खेत ले के बोअ , जोत आ नाया दुनिया बसाव । '' काका के मुठ्ठी कस गइल आ चल देले नाया आसमान के तलाश मेँ !

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Tags: उमेश, एगो, कहानी, काका, गौतम, दूसरका, भाग, रतन

Comment by Umesh Gautam on August 14, 2012 at 10:54am
अभिभावक तुल्य सँजय भैया , नवीन भैया के आदेश रहे कहानी जल्दी पुरा करे के त कहानी हाजिर बिया । निष्पक्ष राय के ईँतजार बा । प्रणाम आ जय भोजपुरी ।
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on August 14, 2012 at 10:05pm

उमेश जी प्रनाम आ जय भोजपुरी

बहुत बरिआर आ सरिहार के डराँणी धई के चली रहल बानी , भाव से भरल एक दम ठंवे ठंवे पुरहर डेग डालत राउर ई कहानी बेजोड बिआ ।

जय भोजपुरी

Comment by Umesh Gautam on August 14, 2012 at 10:41pm
नवीन भइया , इ सब रउरा सभे के प्यार आ दुलार के असर ह । प्रणाम आ जय भोजपुरी ।
Comment by sanjay panday on August 17, 2012 at 11:03am

umesh bhaiya parnam aa jai bhojpuri |

bahutsunnar bhai ji ekdam khanti bhasha aa bhavna se ot prot

bahut sahi jat ba raur rachana| agale bhag ke johat bani |

bahut bahut dhanyavad |

jai bnhojpuri |

Comment by Umesh Gautam on August 17, 2012 at 8:53pm
सँजय भैया , प्रणाम । हम अपना समझ से कहानी के अतने प खतम क देले बानी , बाकिर आगे रउरा सभे के मर्जी । जय भोजपुरी ।
Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on August 19, 2012 at 8:04pm

उमेश जी जय भोजपुरी 

जबले माई के अंचरा मे केहू धउर  के जाई ना 
ओ अंचरा के मरम  सुझाई  ना !
जबले खेतवा के धुरिया मे तनी लोटियाई ना 
माट्टी माई के मरम बुझाई  ना !
तनी देरी के आन्ही ह इ कंकर ईंट  के बगइचा 
कब ढही जाई जनाई ना !
कतनो समझाइब इ बतिया केहू बिरले के समझ आई !
 
एक दम सही  व्यथा बा !
 
जय भोजपुरी जिहिं जा भोजपुरी !
Comment by Anoop Srivastava on August 22, 2012 at 9:35pm

उमेश जी जय भोजपुरी आ सप्रेम अभिवादन,
कम शब्दन में, आपन सगरो बाति कहि के आजु के सच्चाई आ समस्या के बहुत नीमन ढंग से ए कहानी में रउआ राखि देहले बानी .... अगिला के इन्तजार रही ...धन्यवाद आ जय भोजपुरी ।

Comment by Umesh Gautam on August 23, 2012 at 6:00pm
राजीव चाचा जी आ अनुप भैया ! हम आभारी बानी । धन्यवाद ! प्रणाम आ जय भोजपुरी ।

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