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रउवा दिहीं दरद ना, गज़ल देब हम

सब केहू के प्रणाम आ जय भोजपुरी...

 

जगरनाथ(जगन्नाथ) जी के लिखल गज़ल जवन कि सन १९७७ में छपल रहे... प्रेम और प्रेम के वेदना के उहापोह से भरल ई गज़ल अईसन बुझाता जे दरद के डाह से उपटल होखे...

एह गज़ल खातिर "अविनाशचन्द्र विद्यार्थी जी" के लिखल एक शेर एकदम सटीक बईठ रहल बा कि -

"कहे खातिर गज़ल काहें दो तब ले भाव ना होला
सहे खातिर भितरिया जबले कवनो घाव ना होला"

जगरनाथ(जगन्नाथ) जी के गज़ल कुछ एह तरह से बा :

सांस खातिर सरगम बेगाना भइल
जिंदगी बस जिये के बहाना भइल
गिर के उनका नज़र से उठल बानी हम
बानी सबका नज़र के निसाना भइल
लोर पिए के जनमे से लागल लकम
अब ना छुटी निसा ई पुराना भइल
उनका रोवला बुला एगो मुद्दत भइल
हमरा हँसला, ए यारे, ज़माना भइल
रउवा दिहीं दरद ना, गज़ल देब हम
इ गज़ल रउवा नाँवे बयाना भइल...

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Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on July 29, 2012 at 10:11pm

अवनीश जी प्रनाम आ जय भोजपुरी

गजल बहुत बेजोड बा प्रस्तुति बहुत बेजोड बा आ हमनी संगे बांटे खाति अनघा धन्यबाद बा रउवा के ।


एगो चीझु ई दरद के डाह, एजुगा दरद के डाह से कुछ बुझाईल ना , काहे की " डाह " बुला ईष्य़ा , जलन केहु के देखि के केहु जरेला ओकरा के डाह कहल जाला एजुगा ओकर माने ना बुझाईल ।

बाकी गजल त सांचो बहुत बेजोड बिआ ।

जय भोजपुरी

Comment by Avanish Tiwari on July 29, 2012 at 11:52pm

नवीन भईया प्रणाम आ जय भोजपुरी ..
हो सक ता हमरा बुझेमे गलती भईल होखो.. एइजा दरद के डाह से इ मतलब बा - जे जवन दरद के उम्मीद ना रहे, कुछ चैन के उम्मीद रह, बाकी सब कुछ उल्टा हो रहल बा...  ओइजा हमरा खयाल से डाह ही कहाई...

जय भोजपुरी...

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