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करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२२ वाँ किस्त)
चौपाई-
सुन गिरिजा के अमरित बानी। सीता के मुँह चमकल पानी।।
भवन पहुँचली सुख सरिआवत। गौरी के गुनवा के गावत।।
राम लखन फुलवा ले गइले। मुनि आसन लग जा के धइले।।
कहलें रघुवर सजी सुना के। पवलें जे बगिया में जाके।।
सुन के बिना कपट के बानी। हरसित हो गइले मुनि ग्यानी।।
दूनू मिल गुरु के नहववले। पूजा के साधन सरिअवले।।
मुनि जी विधिवत पूजा कइले। विधि के सब विधान मन धइले।।
पूजा खतमा के ऊ कहले। दूनू के ई अग्या दहले।।
हाली सब करवा खतमा के। नगर देख आवऽ जा जाके।।
गुरु के अग्या माथे धइले। देखे नगर कुँअर तब गइले।।
दोहा-
मन में भरल उछाह बड़, पग में लागल पाँख।
भरल पुरल लागत रहें, उत्सुकता से आँख।।१९५।।
चौपाई-
घुसले दूनू बीचे नगरी। चढ़ली नार झरोखा झंझरी।।
रूप देख अइसन हरसइली। सब आपन सुध-बुध खो गइली।।
देखत साँवर गोर बदनवा। सबके मन के भइल हरनवा।।
देंखे नारी बान्ह झुमट्टा। कहीं देंह बा कहीं दुपट्टा।।
देखेला सोभा मुँहवा के। फेंकेली माथे फुलवा के।।
माथे लागे फुलवा जाके। उचक-उचक तब दूनू ताके।।
हो निहाल सब नार निहारें। गिरे पलक ना अँखिया हारे।।
डेग-डेग पर बलि-बलि जाली। मन छउके बन सरहज साली।।
करे राम के सभे सरहना। राजा जी जो मनते कहना।।
अपन परनवा वापस लेते। इनहीं के सीता दे देते।।
दोहा-
जोड़ी लउकत ठीक बा, उर में उठे विचार।
माई से मिनती करें, पुरा करा दऽ कार।।१९६।।
चौपाई-
हो-हो के रुपवा के बस में। करें नार चरचा आपस में।।
लउके रूप कहीं ना अइसन। ई दूनू लउके ले जइसन।।
देवो दानो गंधरबो में। लोगन में अरबों खरबों में।।
केहू ना अइसन लउकेला। जे पँजरा में बइठ सकेला।।
देखत पाप हटेला मन के। रूप लगे दिअना दरसन के।।
जवन राह से ई गुजरेले। छापर ओपर लोग परेले।।
सभकर आपन कार भुलाइल। दउरें छोड़त पीअल-खाइल।।
राहे-राहे लागल मेला। टहलत जालें बीर बधेला।।
जे देखे से करे बड़ाई। धन-धन बा इनके सुनराई।।
चुम्मक अइसन खींचत जाता। जूटल जाता अदभुत नाता।।
दोहा-
धन माई बपसी हवें, धन नगरी के लोग।
धन-धन इनके दरस बा, जहाँ भुले सब भोग।।१९७क।।
धन-धन ई अँखिया भइल, इनके रूप निहार।
इनके जे कनिया बनी, धन होई ऊ नार।।१९७ख।।
चौपाई-
राम लखन दू सुग्घर भाई। घुम-घुम देखे नगर निकाई।।
सुन्नर-सुन्नर महल अटारी। नीक-नीक सब लउकें नारी।।
नीक सुभाव नीक व्यवहारी। नीक लगे जइसे ससुरारी।।
देखत हरस हिया में जागल। भारी नेह नगर से लागल।।
ठाँव-ठाँव पर मनवा ठमके। गम-गम गम गम गलिया गमके।।
चैके-चैके चहक चाँदनी। राहे-राहे राग रागिनी।।
सुघराई के साज सजावल। अगर गंध से नगर लिपावल।।
नयन-नेह के लगल बिछौना। सरधा के सब खेल खिलौना।।
भाव भंगिमा के सब भोजन। लगे परोसल पन परयोजन।।
परम प्रेम परवत के पानी। माटी के गुन पारस खानी।।
दोहा-
आकरसन के खान सब, पहुनाई के पूँज।
सरधा के सुर में सनल, स्वागत के बा गूँज।।१९८क।।
अइसन जहाँ सनेह बा, कइसे भला भुलाय।
डेग विबस आगे बढ़े, मनवा लौटत जाय।।१९८ख।।
भरे न दिलवा देख के, अँखिया नाहि अघाय।
कइसे छोड़े नगर के, ई ना बात बुझाय।।१९८ग।।
चौपाई-
घूमत फिरत साँझ निअराइल। लौटे के तब बेरा आइल।।
लौटे लगले दूनू भाई। छोड़त नगर लगे कठिनाई।।
कवनो तरे लवट ऊ गइले। देख मुनी बड़ परसन भइले।।
पुछले मुनि बतिया हरसा के। कथी-कथी पवलऽ हऽ जाके।।
कहलें राम कहीं का गुरुवर। नगर बहुत ई बाटे सुग्घर।।
कहे मान के सोभा ना बा। कथी कहीं कहँवा का-का बा।।
फेरू जे जे पवले रहले। गुरु से सब फरिया के कहले।।
सुनसुन के रघुवर के बतिया। कौसिक के फूलेला छतिया।।
कहत नगर के अकथ कहानी। मुँहवा पर चमकेला पानी।।
फेरू नित के नियम निभवले। तब बिस्तर पर देंह बढ़वले।।
दोहा-
सुबह बिछावन छोड़ के, सपरवले नित कार।
जटा जूट सरिआइ के, भइले फेर तयार।।१९९।।
चौपाई-
तबले सतानंद जी अइले। मुनिवर से आ विनती कइले।।
जग्य सुरू अब होखे जाता। वीर भूप सभे बिटोराता।।
चल के आसन उहाँ लगाईं। लइको सबके लेले आईं।।
सुनत बचन मन से हरसा के। कहलें कौसिक हाथ हिला के।।
चलऽ राम आ गइल बुलावा। छूटी सब मन के पछतावा।।
लछमन हो जा तुहूँ तयारी। देखे चलऽ तमासा भारी।।
येतना सुनत गुरु के बानी। ललसा के लउकल अगुआनी।।
झटपट सब तइयारी भइले। जगसाला के रहिया धइले।।
आगे बिसवामीत बढ़ेले। पाछे लछमन राम चलेले।।
गुरु के पाछे लउकें चेला। जइसे होखें बाघ-बघेला।।
दोहा-
धरम-करम सब नियम के, धइले होखे पाछ।
बढ़त विजय के राह पर, खिलले सभकर बाँछ।।२००क।।
भगती ग्यान समेट के, जस बैरागी जाय।
राम लखन के सँघे तस, कौसिक रूप सुहाय।।२००ख।।
चौपाई-
आगे देखऽ बढ़ल कहानी। ध्यान लगा के सुनऽ भवानी।।
जगसाला के रहे तयारी। जूटल रहलें जोधा भारी।।
बहुत दूर ले लउके घेरा। वीर रहें सब डरले डेरा।।
बीचे धनुहा रहे धराइल। लोग सजी लउकें अगुताइल।।
देखे खातिर येकर लीला। बइठक्का सब रहे रँगीला।।
येक ओर सब नगर निवासी। येक ओर सब दास अउ दासी।।
येक ओर परिवार जनक के। आसन सबके रहे कनक के।।
अलगे-अलगे नर अरु नारी। अलगे बइठल सब दरबारी।।
गुरु मंतीरी पंडित सँघवा। राजा रहले येक अलँगवा।।
येगो रहे मंच कुछ ऊँचा। लउके जहँ से खेल समूचा।।
दोहा-
सजल रहे दुलहिन निअर, बग-बग बरे अँजोर।।
देखत जवना मंच के, नाच उठे मन मोर।।२०१।।
चौपाई-
उँहवा रहली जनक दुलारी। सखिअन सँघ उनके महतारी।।
येगो मंच ऊँच कुछ आगे। अबहिन खाली-खाली लागे।।
चढ़ल झरोखन पर कुछ नारी। दूरे से देखे तइयारी।।
नजर सभे धनुहा पर डारे। फेरू सीता ओर निहारे।।
का होई कुछ थाह न लागे। रह-रह मन में चिन्ता जागे।।
मने-मने सब करे मनौती। भाखेला सब लोग भखौती।।
राम लखन जब उहँवा गइले। देखत सबके जिया जुड़इले।।
रूप देख के छूटे छक्का। मुदइन के मारेला हक्का।।
संत देख के हरसित भइले। दुरजन के मनवा दुखितइले।।
कपटी लगले मुँह लुकवावे। दिन मलकोकन के ना भावे।।
दोहा-
वीरन के बलवा घटे, डर से कपसल जाँय।
जस बघवा के देख के, हरना-दल घबड़ाय।।२०२।।
चौपाई-
नगर निवासी देख अघइले। लागे मनसा पूरा भइले।।
देख-देख राजा हरसाले। फेरू चिन्ता में बुड़ जाले।।
करवा जबले पुरा न होले। तबले चिन्ता मन में डोले।।
सखिअन में सरधा बा जागल। मन में मलछे चिन्ता लागल।।
देखत रूप सुनयना माई। सोचे लगली मन पछताई।।
बड़ा भाग होई अब जेकर। ई बरवा बन पइहें सेकर।।
वर तऽ बढ़िया लउकऽ ताड़े। परन परल बा आके आड़े।।
धनुहा बड़ा कठोर लगेला। बल के कठिन परीछा लेला।।
बड़ा कठिन बा जवन उठावल। कइसे सपरी डोर चढ़ावल।।
बबुआ में लउके लइकाई। डोरी इनसे चढ़ ना पाई।।
दोहा-
रूप कमलदल से बनल, देंह लगे सुकवार।
कारज लउकत कठिन बा, कइसे लागी पार।।२०३क।।
देखे सीता राम के, ले मन में अनुराग।
गौरी से विनती करें, तहरे हाथे भाग।।२०३ख।।
चढे़ राम जब मंच पर, लउकें सुरुज समान।
भकजोन्हिन के भीर में, जइसे सुखद बिहान।।२०३ग।।
फेरू आगे.....
Comment by Manoj Kumar on July 23, 2012 at 11:04pm गुरु जी गोड लाग तानी.
अद्भुत वर्णन... बालकांड के ई मधुरम प्रसंग बार-बार पठनीय बा.
देखे सीता राम के, ले मन में अनुराग।
गौरी से विनती करें, तहरे हाथे भाग।।२०३ख।।
चढे़ राम जब मंच पर, लउकें सुरुज समान।
भकजोन्हिन के भीर में, जइसे सुखद बिहान।।२०३ग।।
अगिला किस्त के इंतजार रही...
जय भोजपुरी!
Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on July 24, 2012 at 11:52am गुरु जी के चरण शापर्ष
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on July 24, 2012 at 8:35pm गुरुजी प्रनाम आ जय भोजपुरी
करुनाकर रमायन के करुना मे मन डुबल संवसे देहि नहाईल बिआ , हम अब एह ले बेसी का कही बस हम करुनाकर के आनन्द लेत बानी ।
जय भोजपुरी
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