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लोक संवेदना का अमर कलाकार : भिखारी ठाकुर प लिखाईल एगो लेख

प्रणाम आ जय भोजपुरी

भिखारी ठाकुर के बारे मे अईसे त ढेर लोग लिखले बा आ लिखत बा , अईसही ट्वीटर प स्मिता मिश्रा जी बानी उँहे के चलते ई लेख पढे खाति  भेटाईल ह सोचनी ह की रउवा सभ के भी एह लेख से परिचय करावल जाउ ।

जय भोजपुरी के एगो नियम बा की एजुगा भोजपुरी मे ही पोस्ट करे के बा , बाकि हम एडमिन जी से छमा चाहब काहे की ई लेख भोजपुरी मे नईखे बाकी एगो भोजपुरिया , एगो महान भोजपुरिया के बारे मे बा , सरिहार के लिखल बा , एह से हम सोचनी ह की सब केहु से साझ कईल जाउ ।

भिखारी ठाकुर
जन्म : 18 दिसंबर 1887
मृत्यु : 10 जुलाई 1971


प्रमुख नाटक : बिदेसिया, गबरघिचोर, बेटी वियोग, भाई विरोध, गंगा स्नान, विधवा विलाप, कलयुग प्रेम

 

भिखारी ठाकुर का रचनात्मक संसार बेहद सरल है- देशज और सरल। इसमें विषमताएं, सामंती हिंसा, मनुष्य के छल-प्रपंच- ये सब कुछ भरे हुए हैं और वे अपनी कलम की नोक से और प्रदर्शन की युक्तियों से इन फोड़ों में नश्तर चुभोते हैं। उनकी भाषा में चुहल है, व्यंग्य है, पर वे अपनी भाषा की जादूगरी से ऐसी तमाम गांठों को खोलते हैं, जिन्हें खोलते हुए मनुष्य डरता है।भिखारी ठाकुर की रचनाओं का ऊपरी स्वरूप जितना सरल दिखाई देता है, भीतर से वह उतना ही जटिल है और हाहाकार से भरा हुआ है। इसमें प्रवेश पाना तो आसान है, पर एक बार प्रवेश पाने के बाद निकलना मुश्किल काम है। वे अपने पाठक और दर्शक पर जो प्रभाव डालते हैं, वह इतना गहरा होता है कि इससे पाठक और दर्शक का अंतरजगत उलट-पलट जाता है। यह उलट-पलट दैनंदिन जीवन में मनुष्य के साथ यात्रा पर निकल पड़ता है। इससे मुक्ति पाना कठिन है।

 

उनकी रचनाओं के भीतर मनुष्य की चीख भरी हुई है। उनमें ऐसा दर्द है, जो आजीवन आपको बेचैन करता रहे। इसके साथ-साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गहन संकट के काल में वे आपको विश्वास देते हैं; अपने दुखों से - प्रपंचों से लड़ने की शक्ति देते हैं।

 

उनका पूरा रचनात्मक संसार लोकोन्मुख है। उनकी यह लोकोन्मुखता हमारी भाव-संपदा को और जीवन के संघर्ष और दुख से उपजी पीड़ा को एक संतुलन के साथ प्रस्तुत करती है। वे दुख का भी उत्सव मनाते हुए दिखते हैं। वे ट्रेजेडी को कॉमेडी बनाए बिना कॉमेडी के स्तर पर जाकर प्रस्तुत करते हैं। नाटक को दृश्य-काव्य कहा गया है। अपने नाटकों में कविताई करते हुए वे कविता में दृश्यों को भरते हैं। उनके कथानक बहुत पेचदार हैं- वे साधारण और सामान्य हैं, पर अपने रचनात्मक स्पर्शों से वे साधारण और बहुत हद तक सरलीकृत कथानक में असाधारण और विशिष्ट कथ्य भर देते हैं। वे यह सब जीवनानुभव के बल पर करते हैं। वे इतने सिद्धहस्त हैं कि अपने जीवनानुभवों के बल पर रची गई कविताओं से हमारे अंतरजगत में निरंतर संवाद की स्थिति बनाते हैं। दर्शक या पाठक के अंतरजगत में चल रही ध्वनियां-प्रतिध्वनियां - एक गहन भावलोक की रचना करती हैं। यह सब करते हुए वे संगीत का उपयोग करते हैं।

 

उनका संगीत भी जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों से उपजता है और यह संगीत अपने प्रवाह में श्रोता और दर्शक को बहाकर नहीं ले जाता, बल्कि उसे सजग बनाता है। अपने प्रसिद्ध नाटक ‘बिदेसिया’ में भिखारी ठाकुर ने स्त्री जीवन के ऐसे प्रसंगों को अभिव्यक्ति के लिए चुना, जिन प्रसंगों से उपजने वाली पीड़ा आज भी हमारे समाज में जीवित है।

 

देश जिस समय स्वतंत्रता की एक बड़ी राजनीतिक लड़ाई लड़ रहा था, उस समय वे इस राजनीतिक लड़ाई से अलग स्त्रियों की मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे थे। स्वतंत्रता की लड़ाई समाप्त हो गई, देश राजनीतिक रूप से आजाद हो गया, पर स्त्रियों की मुक्ति की लड़ाई आज भी जारी है। अपने नाटक बिदेसिया में वे एक देसी स्त्री की अकथ पीड़ा का बयान करते हैं, जो पति के परदेस जाने के बाद गांव में अकेले छूट गई है। वे इस अकेले छूट गई स्त्री की पीड़ा को तमाम छूट गए लोगों की पीड़ा में बदल देते हैं।

 

देश ने 1947 में विभाजन और विस्थापन देखा, पर भिखारी ठाकुर ने 1940 के आसपास अपने नाटक बिदेसिया के माध्यम से बिहार के गांवों से रोजी-रोजगार के लिए विस्थापित होने वाले लोगों की पीड़ा और संघर्षों को स्वर दिया। उनके नाटकों का स्वर स्त्री जीवन के संघर्ष का स्वर है। बिदेसिया के अतिरिक्त उनके अन्य नाटकों के केंद्र में भी स्त्री ही है। ‘गबरघिचोर’ नाटक लिखते हुए वह गर्भ पर स्त्री के मौलिक अधिकार का प्रश्न खड़ा करते हैं। बटरेल्ट ब्रेख्त के नाटक ‘काकेशियन चॉक सर्किल’ (हिंदी में ‘खड़िया का घेरा’) के कथ्य से मिलता-जुलता है गबरघिचोर का कथ्य, जिसको लिखकर ब्रेख्त अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाते हैं। वही कथ्य बमुश्किल साक्षर भिखारी ठाकुर अपने समाज से चुनते हैं और असंख्य स्त्रियों की वाणी बन जाते हैं। भिखारी की रचनात्मक संवेदना चकित करती है कि जिस कथ्य को ब्रेख्त चुनते हैं ठीक उसी कथ्य को वे भी स्वीकार करते हैं।

 

भिखारी ठाकुर ने जिस काल में स्त्री गर्भ पर स्त्री के अधिकार के प्रश्न उठाए उस समय भारत के किसी ग्रामीण इलाके में सार्वजनिक प्रदर्शन तो दूर, यह बात सोची भी नहीं जा सकती थी। वह सोच के स्तर पर ग्रामीण समाज की स्त्रियों में एक व्यापक परिवर्तन के जयंत अभियान पर निकलते हैं। यह एक ऐसा सांस्कृतिक अभियान था, जिसकी कल्पना आज की राजनीति की दुनिया में संभव नहीं है। उन्होंने दूसरा महत्वपूर्ण काम अपने रंगमंच की कलात्मकता के स्तर पर किया। उन्होंने जीवन से ही अपने लिए कला के रूप चुने। वहीं से नाटक की युक्तियों को उठाया। बिहार के तत्कालीन सामंती समाज ने जिस कला को अपनी विकृत रुचियों का शिकार बना लिया था और अश्लील कर दिया था, उसे उन्होंने नया और प्रभावशाली रूप दिया। आज भिखारी ठाकुर हमारे लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि वे सिखाते हैं कि जीवन के अंतर्द्वद्व ही रचनात्मकता को दीर्घजीवी बनाते हैं। उनका पूरा रचनात्मक संसार अंतर्द्वद्वों से भरा हुआ है। वे स्वयं गोस्वामी तुलसीदास की तरह भक्त कवि बनना चाहते थे और खड़गपुर (बंगाल) में रामलीला ने उनके भीतर कविताई का बीज डाला, पर उनके समय और समाज के दुखों ने उन्हें मनुष्य की पीड़ा का रचनाकार बनाया।

भिखारी ठाकुर को साहित्य और संस्कृति की दुनिया के पहरुओं ने प्रसिद्ध नहीं किया और नहीं जीवित रखा। उनकी प्रसिद्धि और व्यापक स्वीकार्यता के कारण उनकी रचनाओं के गर्भ में छिपे हैं। वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि नाटक कभी पुराना नहीं होता। उसे हर क्षण नया रहना पड़ता है और यह तभी संभव है जब उसके भीतर मनुष्य समग्रता के साथ जीवंत हो। उन्होंने जीवन से जो अजिर्त किया उसी की पुनर्रचना की। आज भारतीय ग्रामीण समाज उन तमाम दुखों से जूझ रहा है, जिनकी ओर वे अपनी रचनाओं में संकेत करते हैं। ‘भाई विरोध’, ‘बेटी वियोग’, या ‘पुत्र वध’- उनके इन तमाम नाटकों में मनुष्य के आपसी संबंधों के छीजते जाने की पीड़ा दर्ज है। आज भारतीय समाज इस संकट से गुजर रहा है। भिखारी ठाकुर की रचनात्मकता आज भी समग्रता में हमारे जीवन के काम आ रही है।


(प्रस्तुति : धर्मेद्र सुशांत)

 

पर क्या आप विश्वास करेंगे
एक रात जब किसी खलिहान में चल रहा था
भिखारी ठाकुर का नाच
तो दर्शकों की पांत में
एक शख्स ऐसा भी बैठा था
जिसकी शक्ल बेहद मिलती थी
महात्मा गांधी से


..

 

और अब यह बहस तो चलती ही रहेगी
कि नाच की आजादी से
रिश्ता क्या है
और अपने राष्ट्रगान की लय में
वह ऐसा क्या है
जहां रात-बिरात जाकर टकराती है
बिदेसिया की लय।

 


(केदारनाथ सिंह की कविता ‘भिखारी ठाकुर’ के कुछ अंश)

 

जय भोजपुरी

 

स्रोत - लाईव हिन्दुस्तान

 

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Comment by amitesh on July 22, 2012 at 10:15pm

wah!

Comment by Pankaj Praveen on July 23, 2012 at 10:23am

नवीन भईया प्रणाम,

वर्तमान नवहा पीढ़ी के लोग श्री भिखारी ठाकुर आ उहा के कृत के भुला रहल बा ...अइसन में इ विस्तृत लेख लोगन के अपना लोगन के बारे में और भोजपुरी के बारे में  ज्ञानवर्धन दिही..

बहुत बहुत धन्यबाद रउवा के एह लेख से परिचित करवला खातिर. 
जय भोजपुरी
Comment by Shyam Narain Verma on July 23, 2012 at 12:22pm
प्रनाम जी

बहुत बढिया जानकारी और सनर भाव में !

जय भोजपुरी
Comment by Avanish Tiwari on July 24, 2012 at 3:36pm

नवीन भईया प्रणाम आ जय भोजपुरी...

सचहू एक सरिहरल लेख बा, बहुत जानकरी मिलल भिखारी ठाकुर के बारे में, उनकर रचना के मार्मिक बखान बा एहमे ..

बहुत बहुत आभार राउर एह लेख के साझा करे खातिर ...

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