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करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (२० वाँ किस्त)
चौपाई-
सुनले जब विदेह ई बानी। देंह रहल पा पहिले खानी।।
ग्यान दीप में नेह समाइल। भगती के तब जोंत बराइल।।
कहलें राजा बात उघारत। बतलवलें रहलें जे नारद।।
येक बेर नारद जी आ के। कहलें हमरा से समुझा के।।
बतिआवत में बाते-बाते। कहलें लछमी इहाँ छछाते।।
आइल बाड़ी सीता बन के। बोधे खातिर तहरा मन के।।
ग्यनवा में भगती घुसिआवे। जीवन के दरसन समुझावे।।
इनके कहीं बिआह न करिहऽ। तू बिसनू के बाट अगोरिहऽ।।
धनुस धइल जे बाटे घरवा। करी उहे चिन्हे के करवा।।
डोरी ओपर उहे चढ़इहें। दोसर चढ़ा न डोरी पइहें।।
दोहा-
ईहे बतिया जान के, बा ई परन हमार।
सादी खातिर सुरू बा, धनुस जग्य के कार।।१७६क।।
जे सिव धनुस उठाइके, रख दी ओपर डोर।
उनहीं से बिअहब सिया, बचन डिगी ना मोर।।१७६ख।।
चौपाई-
ईहे बात कहत हरसा के। जनक-जनक अस नेह बसा के।।
मन के भीतर खुसी सजवले। सबके सुग्घर ठाँव धरवले।।
सही ठाँव पर आसन लागल। मन के सगरे चिन्ता भागल।।
साज सिंगार उतार धरइले। हड़बड़ मनवा असथिर भइले।।
तब गइले पोखर के लगवा। पोखर अपन मनावे भगवा।।
परते जल में राम चरन के। उछले पोखर गंगा बन के।।
आट-आट सब बाट निहारें। जेन्ने जेन्ने राम पधारें।।
मछरी भागे चरन चूम के। भाग मनावे झूम-झूम के।।
बहुत देवता मछरी बन के। बिहँसत छूवें राम चरन के।।
सगरे जल के जिआ जनावर। अँजरी-पँजरी देले भाँवर।।
दोहा-
राम रूप के देख के, ताकें कमल लजात।
निअरा पा प्रभु चरन के, विनय करत झुक जात।।१७७क।।
कमल चरन नीचे चले, कमल नयन मुस्काय।
कमला के कुल कुंभ में, अमला राम नहाय।।१७७ख।।
चौपाई-
कुछ चिरई उड़ निअरा जाली। धरें राम नाहीं पकड़ाली।।
चिरई खेले छुआ-छुऔवल। जइसे लइका आँख-मुनौवल।।
नइखन कवनो जिआ जनावर। जे प्रभु के बँहिया के बाहर।।
जे चिरई प्रभु के मन भावें। धइ-धइ ओके खुब खेलावें।।
पानी में पौंड़त रघुवर के। रूप लगे सोझे हरिहर के।।
साँवर तन पर निलही पानी। सोभा के का हाल बखानी।।
लागे नील मनी पर जा के। गिर जाता पानी छितरा के।।
ओमें भींजल पिअर लँगोटी। लागे रूप पुरवले चोटी।।
छितराइल जटवा पानी में। लउके जस बादर आन्ही में।।
राम नहा आसन पर अइले। नियम मुताबिक पूजा कइले।।
दोहा-
ध्यान धरे जे के जगत, धरम नियम अनुसार।
बइठल पूजा करे ऊ, आसन पाल्थी मार।।१७८।।
चौपाई-
देखत साँझ समइया आइल। छितराइल इच्छा सिमटाइल।।
सुनत गुरु से सीख के बतिया। सेवा में कुछ बीतल रतिया।।
फेरू जा बिसराम करेले। निनिया के तब गोद धरेले।।
होत पराते पावन हो के। आँख मूँह हथवा के धो के।।
जटा-जूट आपन सरिअवले। गुरुवर के तब सीस नववले।।
गुरुदेव से अग्या पाके। बिहँसे रोंआ राम लला के।।
जइसे रोगी के जे भावे। ओही के बैदा फुरमावे।।
वातावरन उहाँ के थाहे। घुमे फिरे के मनवा चाहे।।
नया नगर के बा आकरसन। मन चाहे हाली से दरसन।।
मनवा के सगरे उतसुकता। गुरु अग्या से भइले चुकता।।
दोहा-
चल जाजा अब बाग में, ले आवऽ जा फूल।
तूरे के कवनो कली, करिहऽ जा मत भूल।।१७९क।।
फुलवा हाली लाइके निपटावऽ जा कार।
घुम के सोभा नगर के लऽ जा तनी निहार।।१७९ख।।
चौपाई-
चल दहले ऊ तूरे फुलवा। फुलवारी में झलकल झुलुवा।।
मन झुलुवा के ओर खिंचाइल। अपने आप डेग बढ़ आइल।।
झुलुआ के बा अजबे करनी। लागेला भव-दुख के हरनी।।
लछमी के जे मन हरसावे। काहें ना बिसनू के भावे।।
रेसम के सब चउरल डोरी। सोना के सब ताग पटोरी।।
पिढ़ई ओकर रतन मढ़ावल। किसिम-किसिम के फूल कढ़ावल।।
झुलुआ के सोभा के आगे। चमक चान के फींका लागे।।
झूठ लगे इन्नर के आगे। लजकांकर लागे इनरासन।।
लउके फुलवा भरल कियारी। जइसे सोभा के फुलवारी।।
रहे मोहिनी रूप लता के। बिहँसे झुलुआ बता-बता के।।
दोहा-
खड़ा रहे झुलुआ लगे, येगो सुन्नर नार।
तोपे तनवा चिंहुक के, जब जब बहे बयार।।१८०क।।
लटवा झोहल गाल पर, अइसन रहे सुहात।
जइसे सोभा समुद में, छपकत नाग नहात।।१८०ख।।
चौपाई-
राम लखन गइले झुलुआ तर। ओकर नजर परल दूनू पर।।
मोह गइल ऊ रूप देख के। बाँचे लागल भाग रेख के।।
लागल खुसी हिया बीच बहे। अइसन रूप न देखले रहे।।
ऊ ताके टकटकी लगा के। ई दूनू ठकुअइले जाके।।
लछमन कुछ बोले के चहले। रघुवर सान बुझा के कहले।।
अबहिन चुपके दसा निहारऽ। मुँह से मत कुछ बात निकारऽ।।
नारी से पहिले बतिआवल। होला आपन चरित गिरावल।।
तब झुलुवा मंे हाथ लगवले। धीरे ओकर डोर हिलवले।।
छुअते झुलुआ बा अगराइल। बिजुरी के बा गती समाइल।।
अपने से ऊ डोले लागल। डोल-डोल कुछ बोले लागल।।
दोहा-
सुनरी तुरते झपट के, लागल पकड़े डोर।
हँसले राम ठठाइके, ताक लखन के ओर।।१८१।।
चौपाई-
बोलल सुनरी सुनत ठहक्का। बाड़ऽ तुहू मदारी पक्का।।
काहें ये में हाथ लगवलऽ। काहें येकर डोर हिलवलऽ।।
ये झूला के रोकऽ हाली। बाड़ऽ तहनी बड़ा बवाली।।
झुलुआ वाली अब्बे अइहें। तब तहनी के पता चलइहें।।
ई झुलुआ ना दुसर झुलावे। मरद इहाँ ना केहू आवे।।
झूलें येपर राजकुमारी। सबसे प्यारी राजदुलारी।।
जेकर रूप सराहे चनवा। जे के खातिर ठनल परनवा।।
बड़ा भाग होई अब जेकर। बनिहे घरवाली ऊ सेकर।।
जबले धनुस न सिव के टूटी। तबले ना ई नाता जूटी।।
बाटे जबसे परन ठनाइल। तबसे बा झुलुआ सुस्ताइल।।
दोहा-
पता न बा होई कथी, का बा बनल विधान।
का बा भोगे के लिखल, कटी कवन फरमान।।१८२क।।
बाड़ऽ जा सुग्घर बड़ा, सांवर गोर किसोर।
बिगड़ी कवनो बात तऽ, मनवा होई थोर।।१८२ख।।
चौपाई-
सुन सुनरी के सुन्नर बानी। कहलें वचन राम रस सानी।।
तूरे हमनी अइनी फुलवा। झुठे ई भरमवलस झुलुआ।।
जवन कार होला अनजाने। दोस न ओमें केहू माने।।
हमनी के गलती ना कइनी। झुलुआ के दरसन ला अइनी।।
झुलुआ खींच लिआइल मन के। का गलती बा कहऽ हमन के।।
परी जवन भोगे के फलवा। चढ़ी जवन माथे जंजलवा।।
हँस-हँस के सब सह लेहब जा। दोस न केहू के देहब जा।।
नियम धरम हमनी का जानी। हमनी के परदेसी बानी।।
धनुहा-जग के सोहरत सुन के। आ गइनी जा अँखिया मुन के।।
इज्जत बा अब तहरे हाथे। जे-जे दोस लगावऽ माथे।।
सोरठा-
अइनी लोंहे फूल, गुरुवर के आदेस पर।
बतिया गइनी भूल, देख सुनरई बाग के।।१८३।।
चौपाई-
रसगर वचन सुनत रघुवर के। आँख लगल सुनरी के फरके।।
सुभ के लच्छन लागे लागल। मन के चिन्ता भागे लागल।।
सोचे लागल सुनरी बतिया। बा दूनू के अजब सुरतिया।।
दरसन जोग पुरुस ई बाड़ें। धन धरती जे के ई काँड़ें।।
जबले सखी इहाँ सब आके। देख न लीहें नजर उठा के।।
तबले छोड़ल ठीक न बाटे। मन दउरेला घाटे-घाटे।।
कहलस तब सुनरी हरसा के। राखब सगरी बात छुपा के।।
झुलुआ के असथिर कऽ दऽ जा। परिचय आपन तनी कहऽ जा।।
कहँवा बा घर-वार बतावऽ। नउआ का हऽ तनी सुनावऽ।।
कवना कुल के हउहऽ तपसी। हउयें के तहनी के बपसी।।
सोरठा-
सुन के सुघर सवाल, सुनरी के मुँह कमल से।
बोले दसरथ लाल, करत बड़ाई बंस के।।१८४।।
चौपाई-
बाटे येगो नगर अजोधा। जहँवा सब जनमेंले जोधा।।
जे कतही ना पीठ दिखावे। मुदई लड़ के जीत न पावे।।
जान भले उनके चल जाला। मुँह से नाहीं झूठ कहाला।।
मन में बात जवन धइ लेले। तुरते जा ओके कइ देले।।
सभ्भे उनके लोहा माने। सकती के दुनिया पहचाने।।
दुनिया में सबका से समरथ। राजा उहँवा बाड़ें दसरथ।।
सुरुज बंस के नाव बढ़वले। भगती से हमनी के पवले।।
नउआ हमरो राम धरइले। भाई छोट लखन ई भइले।।
मुनिअन में सबका से सानी। कौसिक जी सँघवा में बानी।।
मुनि के अग्या पा गइनी जा। जगवा देखे आ गइनी जा।।
दोहा-
बतिया लागल राम के, सुभ के सधल सुयोग।
सुनरी के लउके लगल, वर बबुनी के जोग।।१८५।।
फेरू आगे....
Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on July 10, 2012 at 12:15am गुरु जी गोड लागत बानी
बडा दिन एहि आसरा मे रहनी ह की अब मिली पढे के अब मिली पढे के आ अबकि बडा ढेर दिन प भेटाईल !
सावन मे बुनी के फुहार मिलल चाहे ना बाकी राम रस मे नहा के मन हरिअर हो गईल !
साहित्य के चासनी मे बनल ई राम रस मन फरहर हो गईल गुरुजी !
जय भोजपुरी
Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on July 10, 2012 at 2:58pm चरण शापर्ष गुरु जी
नविन भाई जी सही कहनी हा
हम त इहे कहब की राउर इ नेह
छोह साहित्य रसधार के रूप में हमनी के मिळत रहो
जय भोजपुरी जिहिं जा भोजपुरी !
Comment by Brij Kishor Tiwari on July 17, 2012 at 10:33pm गुरु जी के गोड लागत बानी............
साच पूछी त , राउर लिखलका पढ़ला के बाद ,
ई, दिमाग काम कईल बन कई देवेला ,का लिखी ..........? कुछ सुझबो ना करेला !
कुछहू लिखल, लागेला कि चनरमा सूरूज के दिया देखावsतानी ...........
रउवा, हमनी खातिर ,भोजपुरी खातीर आ भोजपुरिया साहित्य खातीर एगो अनमोल धरोहर बानी ........
आ धन्य बानी हमनी के कि राउर संघत आ आशीर्वाद हमनी के भेटायिल ........
अयिसाही आशीर्वाद बनवले रही .............
फेरु से गोड़ लागत बानी .........
जय भोजपुरी
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