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जेठ के मध्कल दुपहरिया सिवान सुन्न, चारो ओर सिवान में खडखडिया नाचत रहे |  एही तवाई में गाँव के पच्छिम सिवाला से लेके स्कुल मेहे होत नहर पर जाए वाली छ्वर पर, माटी फेके के काम जोर धइले रहे | मनरेगा के तहद आइल एह सरकारी जोजन से जहां गाँव के बेरोजगार लोग के घर बइठल काम - धंधा मिल गइल रहे  ओइजे एगो  गाँव  के चउमुखी विकास के आस लउकत रहे | जब सुरुज लिलार पर  चनके लगलन त अ़ब केहू से खाची ना उठे आ कले – कले सब खाची -कुदारी फेक बारह –साढ़े बारह बजे तक पीपर के फेड के निचे आ ग्इ़ल | इस्कूल के चापाकल पर हाथ मुह धोवला  के बाद सब धीरे – धीरे दु कवर पावे के फेर में परल | केहू के पतीला में दाल –भात आचार रहे,  त केहू अंगारी पर सेकल मोटकी लिट्टी के संगे पियाज आ मरीचा के सवाद लेत रहलन | ढेर आदमी जव आ रहिला में मेरवनी  सतुआ के गठरी खोल के थरिया में धके लपेटे लागल ओह्ग पर कई जाना के आम के चटनी रहे त कुछेक लोग इमिली के चटकारी लेत रहलन  |  

 

जब एक से डेढ़ बजेलागल आ लोग पीठ सोझ कइला के बाद फेन चाटी में उतरे  खातिर सुग्बुगाइल तबतक मुखिया जी के भतीजा फटफटिया भडभड़ावत पहुचल | अपने महीना में पचीस दिन सहर में रहेवाला मुखिया जी एह काम के करावे के जिमेदारी अपना भतीजा के जिमे ही सौपले रहलन | फटफटिया पर ले उतरते काम के तजबेजलस आ अंगुरी में फटफटिया के चाबी नचावत मुह से पान के पित थुकला के बाद बोलल कि “ आज त लागता  ई काम कम्पलिटे  हो जाई साझ ले घिच दजा आ चाचा आ गइल बाडन काल्ह कुछ रूपया-पइसा भी मिल जाई | एकरा बाद फिर दोसर काम  नेवाधे के सोचाई |  काल्ह दुआर पर आ जइह्जा |” एकरा बाद  फेन उ फटफटिया भडभड़ावत निकल गइल |  पइसा  के मिले के नाम सुन के सबकर मन खुस भइल आ काम  डेगारे आगे मेहे बड़े लागल आ साझ होत होत छ्वर के माथ मरा  गइल  |

 

सुबेरे सब गरु - माल कइला के बाद मुखिया जी के दुआरी पर पहुचल  पता चलल कि उहाँ का अबे  पूजा करत बानी | आज छुटी रहे एहसे सबका आपन घर के भी कुछ टहल ओरिआवे  के परल  रहे | मुखिया जी जस घर से ना निकलस  तस सबकर मन उबियात रहे सब दोचित रहे |करीब घंटा भर बइठला के बाद मुखिया जी दरसन देहलन “ का हो सब बढ़िया बाड लोग न ? तनी छोटका के एक्जाम होत बा ओही में अझुराइल रहनी ह  एह घरी , एह से गावे रहे के मोका नइखे मिल पावत |”  चुनाव के समय  सबका  दुआरी पर पहुच के खोज खबर लेबे वाला मुखिया जी आज समाचार पूछत खून लागस कि कवनो एहसान करत बाड़न | चउकी  पर बइठला के  बाद रोजनामचा निकलल हिसाब भइल आ सबकर हिसाब कके पइसा मिलल रोजगारी के हिसाब से सबकर हियरा जुड़ाइल | मेहरारू पइसा लेके अंगूठा टीपला आ  दसखत कइला के बाद चल दिहलिसन कुछ आदमी आगे के काम समझे खातीर रुक ग्इलान |एकरा बाद  जवन काम  मुखिया जी बतवलन ओकरा से सब आवाक रही ग्इल | सब सोचत रहे आगिला काम गाव के बाहा झारे के होई काहे कि बरसात आवत देरी ना  होई  बहा भरला के चलते हर साल  पानी जियान हो जाला  | बाकी ओह बाति के मुखिया जी टार  दिहलन कि उ त बाद में भी हो सकत बा उहांके  अनुसार गाँव के पश्चिम जवन ताल बा ओके भर दियाऊ ओकरा से गवही में जवन खेत बाड़सन  उ डूबी जालसन जेकरा से खेतन में धान ना  हो पावेला | एही से उ भरा जाई  त गाँव के गोइडा के खेत सब कामयाब हो जइहनसन | रहल बात माटी के त  पुरनका हमार डीह बा ओइजा से माटी लेयावे के बा , हमार  दुनो टेक्टर  एकरा खातिर रहीहसन | सब काम  सुन के घरे आ गइल बाकी केहू के ई काम रुचल ना रहे |

                काम करेवाल जादा लोग गाँव के निचला टोल के रहले लोग जिन लोग के पासे नाव-गाव के खेत –बारी रहे | ताल भरे  के नाम सुनी के कई आदमी बिद्कल रहलन “ भला तालो – पोखरा क भरल जाला कतो ’’  “एगो बुढ पुरनिया कुइया ताल  खोनवावत खोनवावत मरस ताकि एगो जस के भागी बनस , बाकी आजकल त सबका कपारे करियवा घेर लेले बा बनावे के जगह पर लोग बिगाडले पुनि समझत बाड़न |” आज साझी के आठ बजे तक एह बात के चरचा  भइल खास के निचला टोल में ताल भरइला के बात पचे ना  लेकिन केहू अगहर   ना आवे कि एह काम के  कइसे बन करावल  जाऊ | सब एह कम के नाजायज ही  समझल बाकी सुबह सब खाची कुदारी लेले निकल गइल  सबका पहिले  आपन दहाड़ी के परल रहे अबे ताल पोखरा ना लउकत रहे  |

 

    सुबेरे ताल भराए चालू भइल भरेवाला भरे आ देखे वाला टुकुर – टुकुर देखे | जे आवे उहे एक छन भर खातिर रुक जाए “ के भरवावत बा  ? ‘’ “ मुखिया जी ‘’ .........! बात सुनी के सब पूछे वाला चल दे | जब गाव घर के मुखिये गलत करिहे त के समझाई ? लइका ? “ह अगर लइका ओह घर के एगो हिस्सा बा त गलती होत देखि के आपन जुबान खोल सकत बा | लेकिन उहे जब जनमतुआ जस काम क देले होखे त फिर उहो ना बोली, ओकरा  बोलिए ना जाई |

     असली  बात हेइजा रहे | कवनो गाँव सहर सिवान होखे हर जगह कुछ ऐसन जमीन  होलिसन जवन केहुके दखलदहनी में ना होखसन | ओकरा के सरकारी जमीन मान  के परति छोड़ दिहल जाला या फिर कुछ ऐसन काम  में लियाव्ल जाल जवन सबका हबेख में होखे | पुरनिया लोग गाँव में के अइसन जमीन  के ताल- पोखरा , बाग – बागीच ..भा चाकर-चाकर छ्वर  जवना पर आए जाए के रास्ता के आलावा बर- बरसात के दिन में माल-मवेशी के घुमावल , लइकन के गुली- डंडा , उधा मारल , कब्बडी ,चिता-बरगाता खेले –कूदे के काम में लिया देस  | समय बदलल आ समय के साथ बहुत कुछ बदले लागल | पाहिले जब गाव में रोग- दुःख के बयार चले त गावं के गावं खतम हो जाए | जब आधुनिक जुग के संगे आदमी जिए लगलन त रोग दुःख त दूर भइल आ हर गावं में धीरे- धीरे जनसंख्या बढ़े लागल आ बढ़े लागल जमीन के जरूरत | रहे के घर ,खाए के अनाज ,ई अइसन चीज होला जवन जमीन से होला  बाकी जन के बढ़ला से जमीन ना बढ़ी ई सच्चाई बा आ एह से जमीन  खाती जमघट  लगबे करी |

जब जमीन के कीमत ना रहे तब ना रहे जब भइल त अइसन भइल जमीन पावे खातिर आदमी सही गलती भुलाये लागल | जेकरा के जहां मिलल ताहा जइसे मिलल तइसे जमीन के आपन हक में बनावे लागल | सरकारी के नाम पर फालतू लउकत  जमीनन पर लोग कब्ज़ा जमावे के तरीका खोजेलागल बड़का –बड़का लोह अवैध तरीका से सैकडों एकड़ जमीन पर कई तरह के अवैध कब्ज़ा जमवलन  त गाव के किसान लोग देखही- देखे में थोरे भा कम धीरे- धीरे अइसन हाल कईलन कि सरकारी जमीन खाली नक्सा में लउके वाली चीज बनी  के रही गइल आ सारा ताल आ गडही के भर के घर बना लिहल छवरन के काट-काट के अइसन खेत में मिलावल  गइल कि ओपर गाड़ी का आदमी के चलल मुस्किल  हो गइल | सुरुआत एक आदमी से  भइल धीरे धीरे इ चिसका सबकर परिपाटी हो गइल आ समय के साथ केहू भी एह काम  में पीछे ना रहल चाहत रहे | जेकरा सामने जवन सरकारी जमीन परल  उ समझअ  ओकरे भइल | एह काम के रोकेवाला केहू ना भइल काहे कि सब एमे लुप्त बा आ रहल बात  सरकर के त उ जब आई तब आई तब तक माजा केहू अउर  मारी दिक्कत केहू अउर  के होई इ रिवाज चल पडल ,काहेकी कुछ लोग अइसन होलन जिनका पासे आपन जमीन ना होला कि उ अपना सामने के जमीन के दख्लिया भी सकस | एकर सीधा नतीजा एह बात पर भइल कि आज हर गाव में सीधा रास्ता चाकर गली के  ना लउकी आ नाली के पानी बहवावे खातिर रोज मारी होई |

 मुखिया जी एही चीज के ध्यान में राखी के एह काम के प्लान बनवले रहलन काहेकी उनका पाता रहे एह काम से उनका के केहू रोकी ना ताल के आस पास जवन भी खेत रहे उ सब उनकर रहे एह से ताल भरवा देहला के बाद जमीन उनका कब्जा में आ जाइत जेह्पर उ आपना खेत के भी भरवा के राईस मिल खोलल चाहत रहलन | आ इहे भइल भइल  महीना भर के अंदर ताल के जगह पर एगो भरल पुरल सुघर जमीन लउके लागल | गाव के निचला टोल के लइका बात करसन “ अब त मछरी मारे  के ना मिली |’’ बरसात के पानी बाजल मुखिया जी नया-नया  माटी पर तरकारी रोपवा के कटीला तार से घेरवा देहलन , काल्ह सबकर रहेवाला जमीन केहू एक आदमी के ‘दखल ‘ में हो गइल रहे | सरकार जब आई तब आई |

   

-       बृज भूषण चौबे

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Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on July 3, 2012 at 8:21pm

बृज भाई प्रनाम आ जय भोजपुरी 

बहुत बरिआर बात कहनी आ गांव मे फईलल भ्रष्टाचारा के एगो रुप रउवा एह कहानी मे देखा देले बानी आ शायद भ्रष्टाचार के जरि सोरि भी इहे बा ! 

सरकार  अईबो करी त का करी , हम त इहे कहब , काहे की जवन रोखि सरकार के अईसन कुल्हि कब्जा प बा उ इहे देखावत बा बाकि जेकरा ओह से नोकसान होता ओकरा त बुझे के चाही ? 

असवारी रहल ह पहिले बेटी कनिया बुढ पुरनिया के ले आवे ले जाये खाति , अब कार बाडी स , आ एकरा चलते अब लोग तनि जगहि छोडतो बा , बाकी हम दोसरा जगहि के का बताई , हमरे गांव मे मनरेगा से एगो रोड फेकात रहल ह , आ मनरेगा मे टेक्टर से माटी ना आवेला , जहा रोड फेकाई ओजुगे से आरी कगरी से माटी लियाई , आ ओहि रोडवा प हमरा एंटी पाटी के खेत बा , हमरो बा आ तीन चार लोगन के अउरी बा , बाकी मय लोग अपना अपना खेत से माटी दिहल बाकी एंटी पाटी वाला कहत बाडे की दोसरा जगहि से माटी काटि के ले आवs , आ दोसर केहु नईखे चाहत की अपना खेत के गहिर करी । 

एक डेग मे एक छईंटी माटी निकलाई त ओह से केहु के खेत ना बिगडी बाकी एक डेग से तीन छईंटी माटी कढाई त ओजुगा गहिर हो जाई । समझावल बुझावल गएले बाकि दोसरा के पढईला लिखईला मे फंसल बाडे । पुलिस थाना आईल आ अब बुझाता की सब सरिहरा जाई । 

माने कहे के बात इहे बा की जब ले खुद आदमी ना जुटी मनगंव बनावे के परी , लोगन के नाफा नोकसान बतावे के परी तबे कुछ हो सकेला ।

अनका के लुटे के फेरा मे लुटाई जाला आदमी 

सुखरखे जगहिया प बिछिलाई जाला आदमी 

जय भोजपुरी 

Comment by Brij Kishor Tiwari on July 6, 2012 at 7:22am

वाह .......

बस एके बात मुहे से  निकलता ..........
बहुत सुन्दर .........

Comment by sanjay panday on July 11, 2012 at 12:45pm

chaube ji parnam 

bahut sundar aa hakikat ke aaina ba raur lekh |

bahut bahut dhanyavad |

jai bhpjpuri |

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