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" सुत्रधार " एगो किताब बिआ जवन " संजीव " जी के लिखल ह , इँहा के भिखारी ठाकुर के उपर ई किताब हिन्दी मे लिखले बानी , ई किताब " राजकमल प्रकाशन " से पब्लिश भईल बिआ , भिखारी ठाकुर के उपर विवेचनात्मक तरिका से कुछ तथ्य कुछ कल्पना के जोड के बहुत नीमन से संजीव जी एह किताब मे देखवले बानी । एहि किताब मे उँहा के एक जगहा भिखारी ठाकुर के बारे मे लिखत बानी कि -
" गौर वर्ण , लम्बी हडियल काठी , उटंग धोती , सिर पर पगडी , बाते भोजपुरी के लहजे मे पुरी तरह रसी-पगी , स्वर मे सहज विनम्रता , आवाज मे आत्मविश्वास !
तो यह थी भोजपुरी की वह शख्सियत जिसके एक इशारे पर गोरखपुर आजमगढ बनारस से लेकर कलकत्ता तक के करोडो भोजपुरीवासी झुम उठते है , नट सम्राट भिखारी ठाकुर , माटी मे सना माटी का आदमी । "
एहि किताब मे एक जगहा संजीव जी लिखत बानी कि -
गुप्तेश्वर सिंह ( भिखारी ठाकुर के संघतिया ) के रिश्तेदार रामनरायण सिंह भिखारी ठाकुर के ले के अपना घरे गईले , ओजुगा रामनरायण सिंह के घर के सब केहु गोड छु के गोड लागत बा , भिखारी ठाकुर पीछे हट के लईकन के आसिरबाद देत कहत बाडे कि
- ना ना रहे देई बाचा खुश रही । भगवान राजेन्दर बाबु अस बना देस ।
आ मेहरारुन के आवते पाछे हट के कहत बाडे की ना ना बबुआईन ई पाप हमरा से जनि कराई । बाकि रामनारायण सिंह के शासन अनुशासन के आगा केहु के ना चलल आ सब केहु गोड लागल ।
खाट लागल आसन लागल आसन प ना बईठ के नीचे बईठ गईले भिखारी ठाकुर तलेले मय परिवार उनका संगे संगे भरभरा के नीचे दरी प बईठ गईल आ भाव से भरल एक टक एक दुसरा के तिकवत बात होखे लागल , कबो राजेन्दर बाबु के बात त कबो जयप्रकाश नारायण के आ एहि मे रामनारयण सिंह पुछि देहले की एह घरी का लिखत बानी ?
"माई पुजा और देवता मिलाप"
नीमन चीज ! मातृ ऋण , पितृ ऋण , गुरु ऋण सबसे उऋण होना पडता है । तनी सुनाईब ?
पचीस -पचास हजार उमडती भीड का वह कलाकार आज आठ आदमियो के बीच अपना कार्यक्रम पेश कर रहा था , एक ही परिवार के आठ सदस्य । पहले अटपटा लगा फिर सधते सधते सध गया कंठ .....
बिआह के पहिले से माई लोग संझा पराती गावेली , जेह गीत मे माता पिता के नाम उचार होखेला । शादी के पहिले मातृपुजा होखेला । पुरखा लोगन के पिंडा दियाला । बेटा भईला प नन्दी मुख श्राध होखेला ...से ही माता पिता के जियता भर मे नीमन भोजन कपडा देबे के जरुरत बा , तेकरा से नीमन बात बतियावे के जरुरत बा , बाकि नीमन बात बतियावे के संवास नईखे लागत ।
धर्मशाला , पाठशाला बहुत बन गईल , बुढशाला के जरुरत ना सोचल गईल ।
पेट मे सरवन हो के पोसली , कुली हो के गोदी मे ढोवली , मेहतर बनि के गुह मुत के गोईँतर साफ कईली , खिजमतिया हो के देहि मे तेल लगवली ..
धन बा कलियुग के बात बलिहारी
बेटा के देह के पीछे बाप के गारी
सास भईली हलुकी पतोह भईली भारी
धन बा कलियुग के बात बलिहारी
मउगी के मरदा बेसाहे नाया सारी
फटही लुगरिया जवाल महतारी
धन धन बा कलियुग के बात बलिहारी
माई ना कहे कह के बुढिया पुकारी
सिर प भईल पा परेत के सवारी
धन बा कलियुग के बात बलिहारी
bhaiya parnam |
bahut sahi bhai ji |
dhan ba kalyug ke baat balihari |
ekdam sahi kahani |
jai bhojpuri |
Comment by संजीव सिंह on June 20, 2012 at 10:45am नवीन भईया प्रनाम,
बढीय जानकारी के संगे-संगे रउआ हमनी के "सुत्रधार" से भी परिचीत कववनी। ऐकर खातीर बहुत-बहुत धन्यवाद।
पेट मे सरवन हो के पोसली ,
कुली हो के गोदी मे ढोवली ,
मेहतर बनि के गुह मुत के गोईँतर साफ कईली ,
खिजमतिया हो के देहि मे तेल लगवली ..
बढीया पंक्ति...
जय भोजपुरी
Comment by arjun rai on June 20, 2012 at 6:20pm
Comment by Umesh Gautam on June 22, 2012 at 8:23pm नवीन भाई प्रनाम
बढ़िया जानकारी देनी । धन्यवाद ।
जय भोजपुरी
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