सगरे सरेहिया हरियर हो गईल , बरिसे लागल रात दिन !
कहिया अइब हमरो बलमुवा , बीतेला दिन गिन गिन !
चार महिना जाड़ काल के दिनवा !
थर थर काँपेला सगरी बदनवा !
धूप ना लउकेला कबहीं अँगनवा !
जाड़ा से काँपेला लागे भवनवा !
ना अइल कहिके जाड़ा में , हियरा तरसल तोहरा बिन !
कहिया अइब हमरो बलमुवा , बीतेला दिन गिन गिन !
चार महिना गरमी के दिनवा !
सीनवा से तर तर चुवे पसीनवा !
पता ना हिलेला जरेला अँगनवा !
लागेला सब से रूठल पवनवा !
कहिके ना अइल गरमी में , तड़पनी जइसे जल बिना मीन !
कहिया अइब हमरो बलमुवा , बीतेला दिन गिन गिन !
चार महिना बरसात के दिनवा !
पानी से भरल सगरी अँगनवा !
दादुर मोर झिंगुर के सुन गुँजनवा !
लागे बरसा से भींजे सारा बदनवा !
वर्मा अब कहिया से तरसईब , बीतल बारहो महिना के दिन !
कहिया अइब हमरो बलमुवा , बीतेला दिन गिन गिन !
श्याम नारायण वर्मा
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