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लाख-हजार के बदला में ...


घर छुटल , दुवार छुटल
माई  के  दुलार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

दिन भर घुमिला धूर में
ना मिले कही माटी के महक
घर के दियारी के अंजोर के आगे
फीका लगे बिजली के चमक

बेकार इ पंखा एसी के हवा
पुरवा के ठण्ड फुहार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

बाहरा में रिश्ता खूब बनल
लेकिन के बाबु माई बा
लोग बाते तबे तक पूछत
जब ले होत कमाई बा

बिन नेह के स्नेह एह दुनिया में
अपनापन उ प्यार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

जाने कब ले जिनगी अइसे  रही
हम अपने आप हेरा जाइब
दुनिया के खरीद फरोख्त में
एक दिन खुद ही बिका जाइब

तब केकरा आंचल में राखब सर
अब ममता के दरबार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

: प्रवीण










Views: 10

Tags: bhojpuri, bhojpuria, poem

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on February 4, 2011 at 11:27pm

प्रवीण जी प्रणाम आ जय भोजपुरी

 

अदभुत आ बहुत बरियार रचना , बहरवान्सु लोगन के इहे सच्चाई बा आ वोह मे हमहु बानी , बहुत नीमन से रउवा एक एक चीझु के देखा देले बानी बता देले बानी ।

 

सांचो सब कुछ छुटत जात बा आ एक दम से छुट रहल बा , सांचो नया नया लोग मिलत बा लेकिन जेकरा से जनम जन्मांतर के साथ बा ओकरा के छने छन मे लोग भुलाई देत बा ।

 

बहुत ही जब्बर रचना आ एक दम सांच बात आ रउवा भविष्य भी देखा देले बानी जवना के देख के कम से कम लोग सोचे के मजबुर हो जाई ।

 

बहुत लाजवाब शानदार आ बेहतरीन रचना !

 

साधुवाद !

 

जय भोजपुरी

Comment by Brij Kishor Tiwari on February 5, 2011 at 2:10pm

जय भोजपुरी आ प्रणाम जी ........

बेजोड़ रचना..........

एकदम जमीनी सच्चाई ,

आज के बात ,

माटी के बात ,

जवार के बात ,

आपन बात , 

लोगन के बात,

नेह के बात ,

दुलार के बात ,

हर बात के बात ,राउर इ रचना ..............

 

घर छुटल , दुवार छुटल
माई  के  दुलार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

 

तब केकरा आंचल में राखब सर
अब ममता के दरबार छुटल
लाख हजार के बदला में
जनम से जुडल जवार छुटल...

 

वाह.........बहुत सुन्दर ....

 

Comment by Manoj Kumar on February 5, 2011 at 3:03pm
प्रवीण भाई,
प्रणाम आ जय भोजपुरी!

राउर इ गीत के दर्द उहे समझ सकेला, जे घर दुआर छोड़ के बहरा रह ता. ई साँच ह कि जवन सुख आपन माटी में मिलेला, घर के रुखल-सुखल खाना में मिलेला, ऊ बाहरा के लजीज पकवान में भी ना मिल पायेला.

बहुत सुन्दर रचना, बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

रउआ के बहुत- बहुत धन्यवाद बा.

जय भोजपुरी!
Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on February 5, 2011 at 5:38pm
पंकज भाई प्रणाम ,

अब का कहीं रउरा एह रचना के बारे में निशब्द बानी आँख लोरिया गइल बा ! बहुत जबरदस्त बा भाई जी राउर इ सन्देश !

का कापी पेस्ट करीं इ नइखे बुझात एक एक शब्द , एक एक पंक्ति जोरदार बीया!

बस इहे कहब रउरा लेखनी पर माई सरस्वती के कृपा बनल रहो !

अविस्मर्णीय !

जय भोजपुरी जीय भोजपुरी !
Comment by PRADEEP PATEL on February 5, 2011 at 6:34pm
प्रवीण जी प्रणाम आ जय भोजपुरी
राउर रचना पढ़ के मन गाव के बारी बगीचा के याद दिला दिहलस रौआ एकदम सही आउर सटीक बात लिखले बनी बहुत बहुत धन्याबाद ई रचना पोस्ट करे खातिर
प्रदीप
Comment by Ashutosh Ranjan on February 5, 2011 at 10:28pm

प्रवीण  जी  प्रणाम ,

 

अद्भुत बिया राउर रचना...अद्भुत एहसे काहे की इ रचना पढ़ला के बाद बाहरी निकलल रहनी हाँ तबो दिल आ दीमाग में एह कविता के एक एक लायीं गूंजत रहल हा....

 

बहुत बहुत धन्यवाद आ साधुवाद बा,

 

जय भोजपुरी

Comment by Anoop Srivastava on February 7, 2011 at 4:45pm

बहुत बढ़ियाँ  प्रवीन जी ..... लाजवाब रचना ... धरातल से जुड़ल एगो अहसास ।

धन्यवाद आ जय भोजपुरी ।

Comment by suryajeet kumar singh on February 7, 2011 at 11:10pm
बहुत बढ़िया रौवा ता हमनी बाहार्वासु के जिंदगी सब्द में जीवीत कर देहनी ..... राउर इ कविता पढ़ के हमरा आँख में आंसू आ गैल उ गाव के याद >>>>>>> का कही हमरा लगे सब्द नैखे>>>>> बस आएसाही लिखत रही धन्यवाद ...............
Comment by Pankaj Praveen on February 8, 2011 at 12:32am
हमरा नियन कई सारा लोगन के जिनगी के एहे सचाई बा जे अपना भविष्य के सुंदर बनवला के सपना ले के बहर में अकेले रहत...लोगन के दुःख आ उनकर परसनी के शबन के माध्यम से कविता में पिरोवे के एगो साधारण कोशिस रहल हा

रउवा सब के पसंद आइल ... बहुत बहुत आभार

:प्रवीण

Comment by Manish kumar Rai on February 8, 2011 at 1:40am

BAHUT HI BADIYA RACHNA BA. HUMRA JAISAN GULF ME RAHE WALA LOG PAR E KAVITA SAHI BAITHA TA. HUMRA BHI AANH BHAR GAIL BA.........................AAPAN U GOAN & BACHPAN YAAD KARKE.

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