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बात कहने का ढंग होता है, सलीका होता है। कभी बाद में अपनी गाली को शिष्टता और दूसरे की सभ्यता को धृष्टता सिद्ध करना पड़ जाए तो ? सब पहले से सोच कर चलना पड़ता है। अपने धर्म पर उंगली उट्ठी नहीं कि कह दिया कि "ई तो दूसरे धर्म के आक्रमणकारियों ने कर दिया वरना अपना जो है एकदम पाक-साफ़ था।" औरतों की हालत और हमारे धरम में ख़राब ! "अरे, ऊ तो पितृसत्ता ने कर दी वरना अपुन का तो बिलकुल शुद्ध-बुद्ध था।" "मर्दों का अत्याचार ! मातृसत्ता जिम्मेदार, धरम नाहीं।"
"धरम और अपना धरम तो बस्स मीठा-मीठा गप्प।"
अरे जब कोई हमसे पूछता ही नाही तो हम काहे बताएं ? कोई पूछे तो कि धर्मो-मजहब के बनाने वाले को नाहीं पता था कि कोई पितृसत्ता भी हुआ करे है दुनिया में ? हमारे अलावा भी धरम हुआ करेंगे दुनिया में ?
तो ईका ख़ातिर पहले ही इंतेजाम काहे नाही किया क़िताबन में ? इत्ते ही दूरदर्सी रहे का ?
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