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शायद अब मानवता के अंत करीब आ चुकल बा !!

भारत के आजादी के ६० साल...एक ओर विश्व के महाशक्ति के रूप में उभरत देश के नागरिक भइला के गर्व ...मेट्रो शहर के जिनगी के दंभ...हवाई जहाज... रेल के प्रथम कलास के डिब्बा में यात्रा...वातानुकूलित कार... मल्टी प्लेक्स.. शौपिंग काम्प्लेक्स ...ओकरा से बढ़ी के २ जी आ ३ जी के संगे ४ थका जी के तैयारी के संगे दू हजार से उपर के ब्रांड के कपडा जूता के चमक दमक... उहे दूसरी तरफ उत्तर भारत में भारी शीतलहरी के कोहरा के बीच गाँव के खाली मैदान में बोरा के तट के छत के निचे बिना कौनो दीवाल या छाव के लकड़ी के आग पर जलत चूल्हा पर एक एक गो पुरान और झीना कपडा में ३ गो लईका बच्चा के गोद में छिपावत माई अपना मजदूर पति के काम से वापिस अवला के इन्तजार कर रहल बाड़ी ताकि दिन भर में १- १ गो रोटी खा के दिन गुजरत बच्चन के खेत्र राती के खाना के व्यवस्था हो सके...

केतना अजीब लागत बा नु इ दृश... लेकिन हमनी अपना मजबूरी के संगे संगे भारत सरकार के भी एह दृश्य के देखल या त मज़बूरी बा या त शौख...अभी कुछ दिन पाहिले हमरा एगो मित्र के माता जी के फ़ोन आइल की बेटा तोहरा पास अगेर कुछ पुरान कपड़ा सवेटर होखे त भिजवा दा .. एगो परिवार के पास एह जादा में पहिने खातिर एगो साडी आ परिवार के अदिमी के पास लुंगी आ बनियें के अलावा कुछ भी नइखे ... सोच के ही दिल घबडा गइल.. लेकिन का करी पुरान कपडा सवेटर पहिलही दान हो चुकल रहे ... आ उहा तक पैसा के सहायता पहुचावल संभव न रहे...


आज कल पर्यावरण के बचाव खातिर जहा कोष के निर्माण के बात होत बा... शहर के आवारा पशु खातिर रहे खाए के वयवस्था होत बा ...जंगल में शेर ..भालू .. मगरमच्छ के बचावे खातिर अरबो रुपया के अभियान चलावल जात बा..का आज के जुग में आदमी के कीमत जानवरन से भी कम हो गइल बा ? अभी आजे हम समाचार में देखनी की अमिताभ बच्चन भघ बचावे वाली एगो संस्था से जुड़ के ओकरा खातिर चंदा इकठा करत बाडन.. अम्बानी भाई भारत में फूट बाल के हालत सुधारे खातिर अरबो रुपया के सहायता देत बाडन .. विप्रो के प्रेम जी ९०० करोण के दान के संगे दुनिया के सबसे बधन दान कर्ता बनी गइल बाडन ... लेकिन एह लोग के नजर में आदमी के कौनो कीमत नइखे ... अगर हमनी के सच में मानव जाती से तालुक रखत बानी त गाव के एह हालत पर विचार करी के कुछ करे के प्रयास करे के चाही ना त समझ ली की मानवता के अंत करीब आ गइल बा ...

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Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on December 13, 2010 at 4:00pm

pankaj bhai pranam

 

aaj raur e lekh padhi ke man barbas bhari aail ba , sachai se ot prot ba raur lekh ego aaina nahin raua eker chitran kaile baani soche pe majboor hokhe ke pari apna maati auru bhumi ke baare main .

 

jai bhojpuri jiya bhojpuri

Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on December 13, 2010 at 4:28pm

प्रणाम आ जय भोजपुरी

 

मानवता के अंत !

 

एगो बहुत बडहन सवाल बा जवना के दु चार लाईन लिखला से कुछ कहल ना जा सकेला , बाकी जवन समाज बा आ जवन स्थिति परिस्थिति बा वोह मे अर्थ ( रुपिया पईसा ) बहुत मायने राखत बा आ जब ई मायने राखे लागल त फेरु मानवता पिछुवा गईल आ तब से पिछुवाईले जात बा ।

एहि मे कुछ लोगन के बुझाईल की तनि ओहु के देख लिहल जाउ त लोग डोनेसन , पईसा हेन तेन आदि कई रहल बा ।

बाकी एगो खातिर एगो के रोकल जरुरी नईखे , आ रउवा जान के अचरज होई की अभी तकले ( माने आजादी के बाद ) सबसे ज्यादा पईसा सरकार के तरफ से अगर आईल बा त खाली एहि मानवता खातिर लेकिन ...... मय कहानी मय लोग जानत बा ..

 

देखी मानवता तब ले जिही जब लोगन के अपना भाषा , अपना संस्कार अपना माटी अपना परम्परा अपना व्यवहार मे पवित्रता रही लगाव रही आ गर्व रही , काहे की इहे कुल्हि चीजु आदमी के आपन नीमन के अलावा दोसरा के नीमन करे खातिर प्रोत्साहित करे ले।

 

प्रयास हर चीज खातिर होखे के चाही आ हर चीज खातिर आवाज उठावे के चाही लेकिन हर चीज मे कुछ उद्देश्य ले के आगे बढे के चाही ।

 

एगो जरत , बरियार , संवेदना से भरल , भावपुर्ण , मार्मिक , दिल के दहलावे वाला ब्लाग खातिर हम धन्यवाद दिहल चाहब आ उमेद करब की राउर ई सोच ढेर लोगन तक पहुंची ... 

 

जय भोजपुरी जय मानवता

Comment by Sudhir Kumar on December 13, 2010 at 5:10pm

प्रवीण जी, प्रणाम आ जय भोजपुरी,

 

मानवता के अंत पर त कुछ कहल मुश्किल बा, लेकिन हमनी का कोशिश कइल जाव कि ओहिजा कुछ सहायता पहुँच सको। रउआ अगर पता देब, त जय भोजपुरी परिवार एह दिशा में कुछ ना कुछ योगदान जरुर कइ सकेला। बाकी लोगन के त पता ना, लेकिन हमरा लगे कुछ पुरान कपडा जरुर होई, जवन कि भेजल जा सकेला। हमरा भरोसा बा कि एहिजा ढेर लोग होइहें, जे कुछ ना कुछ सहायता त जरुर पहुँचा सकेले ओह लोगन तक, जेकरा शायद एह ठंड से ज्यादा डर सरकार के ठंडा रवैया से लागत होई।

 

अफसोस इहे बा कि ई ओह राज्य में हो रहल बा, जहँवा के मुख्यमंत्री निर्जीव मूर्ति बनवाये, अउर ओकर सुरक्षा खातिर बेतहाशा धन खर्चा कइ रहल बाडी, लेकिन इंसान खातिर एक रुपया भी ना... कबो-कबो ई सोच के शर्म आवेला कि आखिर केकरा के हमनी का अपाअ उपर राज करे के अधिकार दे देले बानी जा। खैर, हमनी के समाज आज ले कवनो जरुरतमंद के सहायता देवे से पिछे नइखे हटल, अउर एह बेर भी हमनी का ना हटब जा, ई वादा बा।

 

आईं, पीडित मानवता के सेवा कइल जाव...

 

Comment by भास्कर रंजन "सूर्य" on December 13, 2010 at 5:15pm

परनाम आ जय भोजपुरी,

 

राउर इ धरती से जुडाव आ ओकरा सुख - दुःख के महसूस कइल देखके हमनी के बडा गर्व होता । लेकिन दु:ख भी बहुते होत बा मानवता के इ स्थिति देखके । लेकिन ए खातिर जिम्मेवार के बा . . . ? समाज के एगो आदत हो गइल बा अँगुरी उठावे के । खाली पइसा आ दान दे देहला से का सब सुधर जाई ? का ए स्थीति खातिर हमनी खुद जिम्मेवार नइखी ?  पूरा देश चिल्लात बा "हम दो, हमारे दो" . . . आ हमनी के बहिरा साँप होके कुत्तन- पिल्लियन खानी पैदा कइले जात बानी . . . अगर दिनभर मजूरी के बाद 10 रूपिया अधिका मिल जाता त जामा कइला के जगेह भट्ठी में दे आवत बानी । हमरा याद बा कि हमरा गाँव में एगो बडा गरीब परिवार रहे, वोकर स्थिति वोहसे कम ना रहे जवन रउआ बतावत बानी . . . गाँव में ओबेरा हमनी के सबसे धनीका में गिनती होखे . . . बाबूजी - चाचा लोग से देखल ना गइल त ओकर स्थिति सुधारे खातिर एगो रेकसा खरीद के चलावे खातीर दे दिहल लोग कि उ कमाई आ खाई । महिना दू महीना ले सब ठीकठाक चलल वोकरा बाद उनकरो पैर जमिनी पर ना रहे लागल । अंत में रेकसा बेच के घर छोड के भाग गइले । डर रहे की लोग जान जाई त मारी । आजो उनकर मेहरारू हमरा घरे काम करेली आ पहिले से बहुते बढिया बाडी । इ त एगो उदाहरण रहे . . . अइसन बहुते सारा घटना हमरा सामने घटल बा . . . अब रउए बताई कि कवना भरोसे सहायता केहू करी आ केतना दिन करी । दोसर पहलू बा जात-पात आ नेतागीरी । नवीन भाई ठीक कहनी ह कि जबले सभ्यता आ संस्कृति ना सिखी आ ओकरा अनुसार ना रही इ सब कमी बनल रही आ मानवता मरत रही । उहे नेता गरीबन के लूटत बाडन आ चुनाव अइला पर हमनी फेर ओकरे के भोट देत बानी .... आखीर काहे ?

 

देखी बात बहुते बडहन बा आ जरूरी भी । रउआ भाव आ मर्म के जेतना गुन गाई जा कम बा । हमनी के परयास भी करे के चाही लेकिन इ ख्याल रखते हुये कि जवना आदमी खातीर हमनी करत बानी उहे ए बात खतिर केतना तत्पर बा । कहीं मय कइल काल्ह होके माटी मे त ना मिला दी ।

 

एगो जरत , बरियार , संवेदना से भरल , भावपुर्ण , मार्मिक , दिल के झकझोरे वाला ब्लाग खातिर बहुते-बहुते धन्यवाद ।

जय भोजपुरी ।

Comment by Pankaj Praveen on December 13, 2010 at 5:31pm

सुधीर भाई

जय भोजपुरी परिवार के उद्देश्य  हमेशा हमेशा लोगन के  सहायता कइल रहल बा.. और वक़्त वक़्त पर लोगन के सहायता भी भइल बा .. लेकिन  इ जौन स्थिति के वर्णन हम कइले बानी.. इ मात्र एक दू गो परिवार के ना बा .. उत्तर प्रदेश के बहरैच और लखीमपुर जिला हर साल बाढ़  में तबाह होला.. और नदी के काटन में हर साल १० - २० गाव के पलायन हो जाला...और बरसात के बाढ़ के तुरंत बाद जादा में मौसम के शुरुवात हो जाला ... एह भयावह स्थिति में  हजारो लोगन के एक साथ सहायता सायद संभव नइखे... लेकिन हम ओह में से दू चार परिवार के सहायता खातिर जानकारी इक्कठा करे के प्रयास करब ...

जय भोजपुरी परिवार में हम एह जानकारी के एह बझ से बाटनी की मानव कल्याण से जुडल कौनो संस्था के नज़र पड़े आ ओह लोगन के एह ठण्ड के संगे गरीबी के अभिशाप से मुक्ति दिलावे के प्रयाश होखे

Comment by Pankaj Praveen on December 13, 2010 at 5:42pm

भास्कर भाई

राउर नाराज़गी जायज बा .. लेकिन हम सिर्फ इतने जानल चाहब की कौनो घायल  भा घाव भइल शरीर के अंग के ठीक करे के एक मात्र तरीका ओकरा  के काट के फेकल ही होला का?
हमरा समझ से एगो गरीब परिवार सिक्चा के अभाव में एगो छोट बच्चा के नियन होखे ला .. जे अज्ञानता बस अपने आप  के नुकसान पहुचावेला .. एह स्थिति में का हमनी के अपना बचा लोग के सडक पर छोड़ देबेनी? एह बात पर विचार क इ ला के जरूरत  बा की ओह लोग के भीख देहला के जगह पर  अज्ञानता के अन्धकार से ज्ञान के ओर ले चली के एगो बेहतर इन्सान नियन जिनगी जियला खातिर प्रेरित कइल जाव..

अभी हाल ही में हम देल्ही विश्व विद्यालय के एगो छत्र संस्था के बारे में जानकारी मिलल हा .. जे गरीब बेबस और हाड तोर मेहनत करे वाला रिक्सा वालन के संगठित करी के अपना माध्यम से गारंटी दे के बैंक से  निजी रिक्सा खातिर लोन दिलवा के , ओह लोगन पर बराबर ध्यान रखते हुवे ओह लोगन के कमाई आ बेहतर जीवन खातिर प्रेरित करत बिया...

हमनी के भी संगठित हो के कुछ इसने कदम बढ़ावे के पड़ी...

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