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स्नेह ढूंढ़ली,स्वार्थ ढूंढ़ली,
अब लागता कुल व्यर्थ ढूंढ़ली ,
शब्द ढूंढ़ली , अर्थ ढूंढ़ली,
अब लागता कुल व्यर्थ ढूंढ़ली !!

सांच ढूंढ़ली , झूठ ढूंढ़ली ,
गर्त ढूंढ़ली ,उच्च शिखर ढूंढ़ली ,
ढूंढ़ली जब जवाब सबके ,
तर्क ओकरे संग ढूंढ़ली !!

चलली जब इन्द्र धनुष ढूंढे ,
ओजुगो रंग, बेरंग ढूंढ़ली !
ढूंढ़ली जब भी रोशनी ,
करिया, कुरूप अंधियार संग ढूंढ़ली !!

जब धरम के ढूंढे चलली ,
द्वेश,कलह और रक्त ढूंढ़ली !
फिर धरम के खूंटी में बंधल ,
आपन ईश्वर असमर्थ ढूंढ़ली !!

भीड़ में रहकर अकेली ,
बूझ के मन की पहेली ,
अब ज्ञान के निष्कर्ष ढूंढ़ली !!
---->मीतू !!
दिनांक ११०९२०१० प्रातः ४:35




Views: 16

Comment by Pankaj Praveen on September 11, 2010 at 1:55pm
भोजपुरी काब्य साहित्य के रूप में एगो सार्थक चिंतन आ जबरजस्त रचना ..

आभार आप के कविता खातिर

प्रवीण
Comment by suman pathak on September 11, 2010 at 2:21pm
waah meetu.....bahut sunder likhle baani.....

जब धरम के ढूंढे चलली ,
द्वेश,कलह और रक्त ढूंढ़ली !
फिर धरम के खूंटी में बंधल ,
आपन ईश्वर असमर्थ ढूंढ़ली !!

bahut sunder line ba...raaur soch raur lekhan...raur vyaktitwa jabardast ba..
aise hin likhat rahin
dhanywaad
jaibhojpuri
Comment by Rajeev Mishra "राजीव भोजपुरिया" on September 11, 2010 at 2:39pm
मीतु जय भोजपुरी

बहुत सुंदर रचना सत्यता औरु सार्थकता से भरपूर ! भोजपुरी शब्दन के नया रूप में पिरोवला कह्तिर हार्दिक धन्यवाद !

चलली जब इन्द्र धनुष ढूंढे ,
ओजुगो रंग, बेरंग ढूंढ़ली !
ढूंढ़ली जब भी रोशनी ,
करिया, कुरूप अंधियार संग ढूंढ़ली !!



जय हो
Comment by mrs. saroj on September 11, 2010 at 3:47pm
मीतु बहुत सुन्दर और मनोभाव के व्यक्त करत रचना बा ........................
अच्छा लागल पढ़ के
धन्यवाद्
जय भोजपुरी
Comment by Brij Kishor Tiwari on September 11, 2010 at 5:05pm
जय भोजपुरी ........
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .........

भीड़ में रहकर अकेली ,
बूझ के मन की पहेली ,


बहुत सुन्दर लाइन .........
आ हा ,देखा त भोजपुरी में केतना बढ़िया बन पडल बा .........
Comment by Dinesh Thakur on September 11, 2010 at 5:17pm
meetu ji jai bhojpuri

bahut sunder rachana ba

dhanyebad

jai bhojpuri
Comment by sanjay kumar singh on September 11, 2010 at 6:40pm
मीतू जी प्रणाम ,

भाव के शब्द के साथे अद्भुत सामंजस्य ................

बहुत बहुत धन्यवाद एह बेहतरीन रचना खातिर .

जय भोजपुरी
Comment by Harender K. Mishra on September 11, 2010 at 9:03pm
जय भोजपुरी किरण जी,,,,
सही अभिव्यक्ती बा..... हर चीज दूसरा से जुडल बा जून की चक्र के रूप में अपना के दोहरावेला....
मनुष्य के नीयती एहे बा की ओह माया के वश में होके जिए.... तबे नु सागर ता रत्ना खातीर मथायील लेकिन विष भी ता साथे जुडल रहे.....

या ता समर्थ बानी ता विष पी के अमर हो जाई ना तो मदिरा के पान कई जी रोज़ तिल तिल मरीं.....
सवाल आ जवाब ता हमनी के जीवन ह आ बुधी के उपयोग के एगो कारन भी....

नदी किनारा पे चंचल आ बीच में शांत रहेला ओहितारी किनारा छोडके बीच में रहल ही समझ के परिचय रही.....

राउर लेखनी में आकर्षण बा.....
धन्यवाद एह पोस्ट खातीर
Comment by Ashutosh Ranjan on September 11, 2010 at 9:48pm
मितु जी प्रणाम,

राउर रचना भोजपुरी साहित्य खातिर एगो निश्चीत रूप से आशा के दीपक बा ..ना हम साहित्यकार हईं...ना ही हमरा एक ढेर समझ बा ....लेकिन एतने कह सकिले की राउर लेखनी लाजवाब बा....उपरवाला राउर लेखनी के तेज एहिंगा बनवले राखस.....

जय भोजपुरी
Comment by SURAJ DWIVEDI 'SARAS' on September 11, 2010 at 10:26pm
हार्दिक प्रणाम आ जय भोजपुरी मीतू दीदी -

तमाम प्रबुध्दजन आपन विचार पठवले बानीँ जा
त जाहिर बाटे हमरो उहे विचार होई

ढूँढ़ते धर्मोँ मे क्योँ परमपिता को
वो तो रहता है दिल मेँ हमारे।
आ बसा नन्ही सी ईस जगह मेँ
गढ़ के ब्रह्मांड के हर नजारे।

द्वारा- सूरज द्विवेदी 'सावन'

जय भारत
जय भोजपुरी

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