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दोहा सलिला: संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:


संजीव 'सलिल'




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दिव्या भव्य बन सकें, हम मन में हो चाह.

'सलिल' नयी मंजिल चुनें, भले कठिन हो राह..

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प्रेम परिश्रम ज्ञान के, तीन वेद का पाठ.

करे 'सलिल' पंकज बने, तभी सही हो ठाठ..

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कथनी-करनी में नहीं, 'सलिल' रहा जब भेद.

तब जग हमको दोष दे, क्यों? इसका है खेद..

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मन में कुछ रख जुबां पर, जो रखते कुछ और.

सफल वही हैं आजकल, 'सलिल' यही है दौर..

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हिन्दी के शत रूप हैं, क्यों उनमें टकराव?

कमल पंखुड़ियों सम सजें, 'सलिल' न हो बिखराव..

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जगवाणी हिन्दी हुई, ऊँचा करिए माथ.

जय हिन्दी, जय हिंद कह, 'सलिल' मिलाकर हाथ..

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छंद शर्करा-नमक है, कविता में रस घोल.

देता नित आनंद नव, कहे अबोले बोल..

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कर्ता कारक क्रिया का, करिए सही चुनाव.

सहज भाव अभिव्यक्ति हो, तजिए कठिन घुमाव..

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बिम्ब-प्रतीकों से 'सलिल', अधिक उभरता भाव.

पाठक समझे कथ्य को, मन में लेकर चाव..

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अलंकार से निखरता, है भाषा का रूप.

बिन आभूषण भिखारी, जैसा लगता भूप..

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रस शब्दों में घुल-मिले, करे सारा-सम्प्राण.

नीरसता से हो 'सलिल', जग-जीवन निष्प्राण..

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Tags: 'salil', acharya, chhand, conyemporary, doha, hindi, india., jabalpur, kavita, madhya, More…poetry, pradesh, samyik, sanjiv, vanee, verma, vishv

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