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करुनाकर रमायन : बालकाण्ड (२3 वाँ किस्त)

करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)

बालकाण्ड  (२३ वाँ किस्त)

चौपाई-
आसन लगा बइठलें मुनिवर। सँघे लखन अरु बइठे रघुवर।।
येक पारसद आगे आके। बोलल ई बतिया सरिया के।।
सुने सभे बतिया जगवा के। देखे धनुस धइल अगवा के।।
तिरपुर के बधवा के कऽ के। चल गइनी संकर जी धऽ के।।
वीर धनुस जे इहो उठा के। रख दी ओपर डोर चढ़ा के।।
सुग्घर सीता राज कुमारी। छवि के जे बाड़ी अवतारी।।
ऊहो उनसे बिअहल जइहें। उनहीं के पतनी कहलइहें।।
अब जे वीर इहाँ पर बाड़ें। अपना के कुछ बूछऽ ताड़ें।।
आके बल आपन अजमावें। जगसाला के धनुस उठावें।।
उठलें बचन सुनत सब राजा। सबके सचिव बनवलें भाँजा।।

दोहा-
भाँजा लागल भाग पर, नियम धरम अनुसार।
जवना के केहू कबो, सके न बीर नकार।।२०४क।।
पहुँचे राजा भाँज पर, धनुहा धरें कठोर।
डोले ना धनुहा तनिक, मनवा होखे थोर।।२०४ख।।
पारा पारी बीर सब, अजमावेले भाग।
धरती से ओ धनुस के, तनिक न छूटे लाग।।२०४ग।।

चौपाई-
लौटें बीर झुकवले माली। आपन जघे पकड़ लें हाली।।
ऊपर आँख न उनके होला। मरले होखे जइसे झोला।।
साँप निअर मारेले गेंड़ुर। कनखी से ताकेले घुर-घुर।।
बिहँस बजावें थपड़ी गोरी। ताक-ताक उनही के ओरी।।
थपड़ी के जब सोर सुनाला। सौ गगरी पानी पर जाला।।
मनवा के अपना समुझावें। मने-मने सबके गरिआवें।।
बहुत बीर जाले ना डरहीं। दसा निहारे बइठल दरही।।
धनुहा जस-जस बीर धरेले। तस-तस ओकर भार बढ़ेले।।
दे लालच लाख बेभिचारी। ना डोले पतिवरता नारी।।
वइसे धनुहा ना डोलेला। ना मन के बतिया खोलेला।।

दोहा-
कवन धातु के धनुस बा, जे बल बा हर लेत।
काँपे लागें बीर सब, धनुहा पर कर देत।।२०५।।

चौपाई-
धनुहा ऊपर भार नजर के। लागे बइठल पुरा नगर के।।
सकती के बा ओपर आसन। भगती के बाटे अनुसासन।।
जबले सकती रहिहें दबले। के ओके टकसाई तबले।।
सिव भगती के भार जहाँ बा। दोसर के अधिकार कहाँ बा।।
धरती जब सीता के माई। कइसे उहाँ चली बरिआईं।।
माई के ममता के आगे। दाव न केहू के अब लागे।।
धरती धनुहा धइले रहली। परन हिया में कइले रहली।।
जे धरती के बोझ उतारी। ऊहे ये धनुहा के टारी।।
लउकी बर जे बेटी लायक। ओही के हम बनब सहायक।।
बारी जब आई रघुबर के। धनुस छोड़ हो जायब फरके।।

दोहा-
संकर के अग्या रहे, धरती के अधिकार।
धनुहा में बइठल रहे, ईहे दूनू भार।।२०६।।

चौपाई-
धनुहा के लगवा जे जाला। ओकर बल उहँवे छितराला।।
भगिया के अपना आजमा के। बइठल बीर सभे थहरा के।।
दसा देख बीरन के बाउर। राजा के मुँह भइलस माहुर।।
उठ के बीच सभा में कहले। बुझनी बीर न जग में रहले।।
जो हम रहती पहिले जनले। रहती परन न अइसन ठनले।।
बन के बीर सभे अँइठेला। रन में थहरा के बइठेला।।
जे माई के दूध लजावे। झूठे जग में मरद कहावे।।
थान-थान में पाटल पानी। केहू ना लउके खनदानी।।
बातन से सब बीर बनेले। मौका परत मुखुड़िया ले ले।।
ये दुनिया के हिजड़ा राजा। मोंछ मुड़ा के घरवा जा जा।।

दोहा-
राते-राती भाग के, सभे पकड़ ले ठाँव।
बतलाई अब कहीं मत, केहू आपन नाव।।२०७।।

चौपाई-
बात आज हम ई बुझ गइनी। परन ठान बड़ गलती कइनी।।
धरती बा बीरन से खाली। सिरिफ बसेले लोग बवाली।।
मरद सान पर जान गँवावें। कायर झूठे रोब जमावें।।
आज थाह सभकर लागल बा। मन के सब मनसा भागल बा।।
बिगड़ल भाग कथी के करिहें। बेटी हमर कुँआरे रहिहें।।
विधि काहें ई तन सिरजवलें। काहें अइसन भाग बनवले।।
बिगड़ल कार बनी अब कइसे। होई प्रभु जी चाहब जइसे।।
कवन उमेद करीं अब के से। मन के तोख मिले अब जे से।।
झूठे हम डग्गा पिटववनी। अपना कुल के लाज गँववनी।।
ले जा बेटी रख दऽ हरवा। सभा उसार चलऽ जा घरवा।।

दोहा-
येतना कहत जनक जी, हो गइले जब चूप।
उठले लखन उतान हों, जस बरखा पर धूप।।२०८।।

चौपाई-
सुरू लखन जब कइले बोलल। सुन के सभकर थरहा डोलल।।
नीक बचन ना कहले राजा। घाव बनवले मन में ताजा।।
मरत रही रघुबंसी केहू। अइसन बचन सही ना सेहू।।
भले जान ओकर चल जाई। ना कादर में नाव लिखाई।।
अब्बे देतीं येके तूरी। बाकिर कुछ बाटे मजबूरी।।
कुछ ना बा धनुही-धनुहन में। मुरई निअर ममोरब छन में।।
भैया के जो अग्या पाईं। धनुहा धरती सहित उठाईं।।
तूँरी हम तरकारी अइसन। अँइठी कमल नाल के जइसन।।
छन भर जो हम रोकीं सँसवा। फेंकी ये के तुरत अकसवा।।
येक लात जो ठीक जमाईं। परबत के पाताल धराईं।।

दोहा-
छन में सब संका हरीं। डंका पीट पुकार।
रोक न हमरा के सकी, मुदई बन संसार।।२०९।।

चौपाई-
डोर चढ़ाईं डोरा तानी। दूनू के हम येक्के मानी।।
जब्बे देहब हाथ उठाई। अपने से धनुहा उठ जाई।।
छुअते हम जो ना छटकाईं। मरदन में से नाव कटाईं।।
महतारी के किरिया खाके। बोलऽ तानी हाथ उठा के।।
जो हम अइसन कार करीं ना। कहियो हाथें धनुस धरी ना।।
लवट अवध ना मुँह देखायब। दसरथ के ना लाल कहायब।।
धनुहा में बिआह बा बान्हल। बतिया बा हमरो ई जानल।।
येसे नइखीं हाथ लगावत। बानी कुल मरजाद बँचावत।।
जहँवा होखे बड़का भाई। कइसे छोट बिआह रचाई।।
मरजादा के मान बँचावल। रघुकुल में बा रीत बतावल।।

दोहा-
रोकेला हमके इहे, कुल के आपन रीत।
ना तऽ सहतीं ना कबो, अइसन बतिया तीत।।२१०क।।
सरधा जे के चरन में, महतारी के नेह।
ओके मेहर मान के, कइसे छूअब देंह।।२१०ख।।

चौपाई-
कौसिक तब कहलें समुझा के। धीरज मत छोड़ऽ घबड़ा के।।
काबू कऽ के अपना मन पर। चूपचाप बइठऽ आसन पर।।
बाटे लउकत समय सहाई। अब मत देर करऽ रघुराई।।
जा उठ के अब धनुस उठावऽ। रघुकुल के मरजाद बँचावऽ।।
चलले सेर निअर ऊ झूमत। बिजुरी निअर गगन के चूमत।।
बाल सुरुज अस बाड़े ऊगल। जोन्ही अस जोधा सब डूबल।।
ऊँच लिलार आँख ललिआइल। लउके जइसे सेर भुखाइल।।
चापत धरती चलें चरन से। खूले जस हाथी बन्हन से।।
लउके दूनू बहियाँ फरकत। गेहुअन अस सिकार पर सरकत।।
हिम्मत से फूलल बा छाती। जइसे भेंटे बाल सँघाती।।

दोहा-
नयन निहारे नेह के, देंह लगे विकराल।
सिव सकती के छोह से, चमचम चमके भाल।।२११।।

चौपाई-
जे सबका से होला भारी। पाछे ओकर आवे पारी।।
ईहे हवे धरम के नीती। सबसे साफ समाजिक रीती।।
मूरख जो मौका ना पाई। पंडित नाहीं पूजल जाई।।
देखत भइली हरसित नारी। बिसवसवा के झबदल डारी।।
कोमल देंह रूप मनभावन। लगल सुनयना के झुझुआवन।।
धइलस जब मनवा में सकसा। मुँहवा के तब बदलल नकसा।।
चिन्ता के चैपता लागल। आसा के सब बासा भागल।।
कहली सखि तब येक सयानी। इनका के कमजोर न मानी।।
परई मुट सूरज अँइकाले। दुनिया भर अँजोर छा जाले।।
चिटुकी भर बारूद लगेला। तहस-नहस सब कुछ कऽ देला।।

दोहा-
छटके लुत्ती आग से, लेसे कइ-कइ गाँव।।
नापे तीनू लोक के, इक बौना के पाँव।।२१२।।

चौपाई-
केकइ कानी अँगुरी डरली। दसरथ के रथ गिरत सँभरली।।
जब अगस्त मनवा में धइले। अँजुरी से सागर पी गइले।।
पानी से बिजुरी बन जाला। केहू से ना तेज सहाला।।
नोह बजर के धार बनेला। अँखिया लाल अंगार बनेला।।
लइका में हिम्मत आ जाले। बड़-बड़ जोधा भाग पराले।।
कार करे ना बेसी अँइठल। गुन ना रहे रूप में बइठल।।
कार करेजा से सब होला। फूलल देंह न फेंके गोला।।
हाथी के छानेला खरवा। खाचीं भर ना मिले जहरवा।।
अछरन से मंतर सिरजाला। सकती तब अकूत आ जाला।।
पाथर के जे नार बनवले। रही हाथ ना दही जमवले।।

दोहा-
चिन्ता सब बेकार बा, देखी इनके रंग।
मनवा हमरो कहेला, धनुहा करिहें भंग।।२१३।।

 

फेरू आगे.....

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Comment by नबीन भोजपुरिया ( NB ) on August 7, 2012 at 8:10pm

गुरुजी सादर प्रनाम आ जय भोजपुरी

हम त अतने कहब की करुनाकर रामायन जईसन अमरित से भरल समुन्दर से अंजुरी भर अमरित पाई के हम त निहाल हो गईनी ।

हमेसा लेखा हमेसा से नीमन ! बेजोड

जय भोजपुरी

Comment by Manoj Kumar on August 9, 2012 at 5:15pm

गुरू जी प्रणाम  आ जय भोजपुरी.

बहुत सुनर आ मन मुग्ध करे वाला प्रसंग चल रहल बा---

भैया के जो अग्या पाईं। धनुहा धरती सहित उठाईं।।
तूँरी हम तरकारी अइसन। अँइठी कमल नाल के जइसन।।
छन भर जो हम रोकीं सँसवा। फेंकी ये के तुरत अकसवा।।
येक लात जो ठीक जमाईं। परबत के पाताल धराईं।।

-------------------------अद्भुत !

बहुत-बहुत धन्यवाद रउआ के.

जय भोजपुरी.

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