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-: सुरसती पूजा के अवसर पर भगवती से निहोरा :--
विनती करिने हमू माई सुरसती जी के।
विदया के देवी बुधिमती महारानी के।।
सुमती कुमती सब गति के सम्हारेवाली।
हंस असवार महतारी वीनापानी के।।
देदीं तनी ध्यान संविधान के विधान पर।
दसवा बदल दीं भोजपुरी के कहानी के।।
हमनी के बेरी मत देरी करीं भगवती।
हरीं भोजपुरियन के सकल हरानी के।।
***
करुनाकर रमायन (भोजपुरी महाकाव्य)
बालकाण्ड (१० वाँ किस्त)
चौपाई-
लगले सूअर के पिठिआवे। सूअर सोझा कबो न आवे।।
गइले जब ऊ बीहड़ बन में। लगल पिआस जोर से मन में।।
राकस रूप मुनि के धइलस। कुटी बना के परगट भइलस।।
मुनि राजा के सेवा कइले। बड़ भारी सुभचिन्तक भइले।।
लगले तुरत भभीस बतावे। मुदइन के मनसा समुझावे।।
साँचे सगरे बतिया लागल। गुरुभगती राजा में जागल।।
बतिया पर बिसवसवा कइले। तुरते ऊ चेला बन गइले।।
कपटी मुनि कहले समुझा के। जग्य करऽ तूँ घरवा जाके।।
हमही चल के करब रसोई। भला तहर जवना से होई।।
नेवतऽ सब बराम्हन जाके। आसिरबाद दिहें सब खा के।।
दोहा-
हो जइबऽ सबसे बड़ा, भय के भागी भूत।
केहू ना बैरी रही, संपत रही अकूत।।८३।।
चौपाई-
घरवा अइले जग्य ठनाइल। तुरत बराम्हन सब नेवताइल।।
कपटी मुनि राजा घर अइले। जगवा के भंडारी भइले।।
भोजन सब हो गइल तयारी। खाये के जब आइल बारी।।
खाये सजी बराम्हन अइले। आपन-आपन आसन धइले।।
भोजन जब लागल निकलाये। नभ में केहू लगल चिलाये।।
केहू मत भोजन के खाई। ना तऽ धरम नास हो जाई।।
भोजन में बा माँस मिलावल। महा पाप बा भोजन पावल।।
सुनत बराम्हन सब खिसिअइले। बिन खइले सराप दे गइले।।
बंस सहित तूँ बनऽ निसाचर। माँसे मदिरा खा जिनगी भर।।
खेजेला जे मान बड़ाई। ऊ नर कइसे मुकुती पाई।।
राजा ऊ रावन बन गइले। कुंभकरन अरिमरदन भइले।।
दोहा-
भाई रहले छोट ऊ, परबत निअर सरीर।
खाये पीये में रहें, हरदम बनल अधीर।।८४।।
चौपाई-
काटेला सराप के सुलवा। अपरी भेंटल रिसि के कुलवा।।
रावन के अब जनम कहानी। सुन लऽ उमा बतावऽ तानी।।
कइसे नीमन कुलवो पाके। कुकरम दुस्ट करेले धाके।।
रिसि पुलस्त बरमा के बेटा। तप करेला बन्हले फेटा।।
तिरिन बिंदु रिसि के लग गइले। तपसी बन के आसन धइले।।
इनके तपवा से बिचिलावे। लगली उहाँ अपसरा आवे।।
इक दिन ऊ तपवा में रहले। कठिन सराप खीस में दहले।।
अब जे तिरिया सोझा आई। गरभवती ऊहो हो जाई।।
सुनत सरपवा परी परइली। तबले बेटी रिसि के अइली।।
ऊ सराप ना रहली सुनले। गरभवती भइली बिन जनले।।
सोरठा-
भइल कुफुत के कार, बिना बिआहल लइकिनी।
चिन्ता भइल सवार, तिरिनबिंदु के माथ पर।।८५।।
चौपाई-
तिरिनबिन्दु के सोच समाइल। फल कवना गलती से आइल।।
आग-पाछ सोचे सब बतिया। नीन न लागे दिनवा-रतिया।।
कतही उनके मन ना लागे। चिन्ता दउरे आगे-आगे।।
ना सराप कटले कट पाई। ना सराप के हवे दवाई।।
भेंटल बाटे बिना खसूरे। प्रभु के लीला हवे जरूरे।।
अब पुलस्त के लगवे चल के। बतला दीं मन के हलचल के।।
ऊहे कवनो राह बतइहें। मनवा के चिन्ता खतमइहें।।
रिसि तऽ होले पर उपकारी। लीहें बोझा हमर संभारी।।
काहें सोच फिकिर हम लेहब। उनहीं के बेटी दे देहब।।
जहँवा बा भगवन के लीला। उहाँ कवन बा हुज्जत हीला।।
दोहा-
तिरिनबिन्दु पुलस्त लगे, जा कहलें ई बात।
इज्जत के धन से धनिक, होली तिरिया जात।।८६क।।
बेटी के अपनाई के, राखीं हमरो लाज।
ईहे बा विनती हमर, होखब मत अनराज।।८६ख।।
चौपाई-
जब पुलस्त ई सुनले बानी। हो गइले ऊ पानी-पानी।।
उनका बेटी के अपनवले। जीवन साथी सुरत बनवले।।
बिसरवा तब बेटा भइले। बढ़त-बढ़त सयान हो गइले।।
भरद्वाज रिसि इक दिन आके। कहलें ई बतिया हरसा के।।
हे मुनिवर हमके अपनाईं। बेटी हमर पतोह बनाईं।।
बेटी हमरो बिया पुजारिन। मात-पिता के अग्या कारिन।।
सोभा कुल के इहो बढ़ाई। सतकरमन में रही सहाई।।
भरद्वाज के बतिया सुन के। पुलकित भइल करेजा उनके।।
उनका बेटी के अपनवले। तुरते अपन पतोह बनवले।।
बिसरवा भारी तप कइले। बेटा बन कुबेर तब अइले।।
दोहा-
रूप गून सबमें रहे, उनके कहीं न जोड़।
देखत उनके तेज के, बढ़े न पावे गोड़।।८७।।
चौपाई-
बपसी के ऊ अग्या पवले। मनवा तप में अपन रमवले।।
बरमा जी तप से खुस भइले। दुनिया के सब दे गइले।।
रूप सील संपत सब पाके। बस गइले लंका में जाके।।
बिसकरमा के रचल ऊ लंका। लगले रहे कुबेर निसंका।।
दनवन ला जे नगर बनवले। डर से दानो रहे न पवले।।
छपित रहे जहँवा इनरासन। तँह कुबेर के लागल आसन।।
राकस सब राती में आवें। ओ लंका पर डीठ गड़ावें।।
इक दिन उहाँ सुमाली आइल। बेटी से कहलस हरसाइल।।
चल जो बिसरवा के लगवा। सुधरी सब रकसन के भगवा।।
जब कुबेर अस बेटा होई। तब हमनी के आँसू धोई।।
दोहा-
बेटा के परताप से, लौटी सबके भाग।
लंका आई हाथ में, किस्मत जाई जाग।।८८क।।
केकसी जाके मुनि लग, कइलस ई अरदास।
मुनिवर आस लगाइके, अइनी रउआ पास।।८८ख।।
बेटा येगो दीं हमें, होखे जे बलवान।
जोड़ न होखे जगत में, अइसन हो गुनवान।।८८ग।।
कहलें मुनिवर सोच के, करब न हम इनकार।
बाकिर बेटा रूप में, राकस ली अवतार।।८८घ।।
चौपाई-
दोस मुहरत के ई बाटे। जेकर असर न केहू काटे।।
तीन बंस राकस बन आई। चैथा के सुभाव बदलाई।।
पहिला बेटा भइलस रावन। लगल कार सब करे भयावन।।
कुंभकरन दोसर तब आइल। कार करे बस सूतल खाइल।।
तीसर बेटी भइल सवखिया। नाव परल ओकर सुपनखिया।।
चउथा पूत भभीखन भइले। भगती के जे रहिया धइले।।
भगवन के भूले न पावें। राकस उनके बड़ा सतावें।।
छोड़-छाड़ के महल अटारी। धइलें रहलें ऊ फुलवारी।।
केहू उनके बात न माने। राकस उनके मुदई जानें।।
दोहा-
अलगे कुटी बनाइ के, करत रहें ऊ जाप।
सोना के गढ़ बीच में, सहत रहें सब ताप।।८९क।।
सुनलू बात सराप के, जवन उतारे भार।
भगवन के ये जगत में, होखेला अवतार।।८९ख।।
चौपाई-
अब उधार के सुनऽ कहानी। तहके उमा सुनावऽ तानी।।
गौतम जी रिसिअन में नामी। रहलें बड़का अंतरजामी।।
आग-पाछ सब बतिया जाने। सबमें प्रभु के किरपा माने।।
जे रिसि के लगवा चल जाला। ओकर सब संका खतमाला।।
दूर-दूर से जिया जनावर। आके निडर रहें उहँवा पर।।
पाप उहाँ ना पनके पावे। हर जिउअन के भगती भावे।।
पालन होखेला मरजादा। संजम राखे हर नर-मादा।।
उहँवा चले नेम के सासन। सेवा भगती के अनुसासन।।
रहे उहाँ ना कवनो हरजा। रिसि के रहे अलग दिनचरजा।।
सोरठा-
होते मातर भोर, निकल परें घर छोड़ के।
मन कऽ प्रभु के ओर, छोडें ये संसार के।।९०।।
दोहा-
रोजे नदी किनारे जाके। नहा-धुआ आसन सरिया के।।
प्रभु में आपन ध्यान लगावें। ध्याने में प्रभु से बतिआवें।।
अइसन प्रभु में ध्यान लगवले। इन्नर के मनवा हदसवले।।
सोचे लगले इन्नर बतिया। कइसे इनके फेरीं मतिया।।
ना तऽ कार बुरा हो जाई। इनरासन पर धापा आई।।
कामदेव के तब बुलववले। धीरे से बतिया समुझवले।।
अइसन तनी उपाय लगावऽ। गौतम के भगती भुलवावऽ।।
सुनके बात मदन मुस्कइले। जायेला तइयारी भइले।।
उहँवा जा परभाव जमवले। काम रूप आपन फइलवले।।
लउके ना अब दोसर बतिया। खोजे लागल सभे सँघतिया।।
दोहा-
जिया जनावर जे रहे, ओ कुटिया के पास।
सब पर काम सवार हो, लगले करे बिलास।।९१।।
चौपाई-
लागल बहे बयार बसंती। डार-डार भइली रसवंती।।
गाँठ-गाँठ में लउके पनका। पात-पात में धइलस सनका।।
अनहोती के फूल फुलइले। गुनगुनात भौंरा चल अइले।।
तितली लगली तिरछे ऊड़े। मछरी लगली जल में बूड़े।।
सिकुरल तन तनेन हो गइलस। भागल जोस लवट के अइलस।।
मैना-मैनी के हुदकावे। सुग्गा-सुग्गी से बतिआवे।।
देंह-देंह पर चमके पानी। लागे पागल भइल जवानी।।
कुक्कुर के कवरा ना भावे। झुंड बान्ह के लगले धावे।।
गौरेया में आइल गरमी। उड़-उड़ मिले बनल बेसरमी।।
चिंउटा-चिउटी हाड़ा-बिरनी। जोड़ी के सँघ काटे घिरनी।।
दोहा-
लतिया बान्हे गाछ के, कोइल मारे कूक।
जेकर जोड़ा ना रहे, ओ के धइलस हूक।।९२क।।
रितु बसंत हाजिर रहे, ओ कुटिया के बीच।
कामदेव रहलें भिड़ल, काम करे में नीच।।९२ख।।
आगे फेर...
Comment by Sanjeev Kumar on January 28, 2012 at 5:12pm गुरू जी प्रणाम,
माई सरस्वती के ध्यान अउर करूनाकर रमायन के पाठ एक संगे कर के हम त हर्षित हो गईल बानी। ऐह भोजपुरी महाकाव्य के चाहे जेतना पढल जाव, दोबार एक बार अउर पढे के चाह कम नईखे हो पावत। बहुत सुनर। दोहा, चौपाई अउर सोरठा एक से बढ के एक बाडन सन।
बस ऐही त रावुर आशिर्वाद के रूप मे करूनाकर रमायन के अगीला भाग अउर माई भगवती के कृपा-दृष्टि सभका प बनल रहे ईहे कामना बावे।
जय भोजपुरी
Comment by Manoj Kumar on January 28, 2012 at 7:43pm गुरुजी प्रणाम आ जय भोजपुरी
वीणावादिनी मां शारदे के स्मरण के साथे करुनाकर रमायन के ई भाग भी जईसे मधुर बसंत के आगमन के सनेस दे रहल बा.
लागल बहे बयार बसंती। डार-डार भइली रसवंती।।
गाँठ-गाँठ में लउके पनका। पात-पात में धइलस सनका।।
अनहोती के फूल फुलइले। गुनगुनात भौंरा चल अइले।।
तितली लगली तिरछे ऊड़े। मछरी लगली जल में बूड़े।।
भगवती आ राम जी के किरपा सबका पर बनल रहो. इहे प्रार्थना के साथ-
जय भोजपुरी.
Comment by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 28, 2012 at 9:44pm गुरुजी गोड लागत बानी आ जय भोजपुरी
राउर भोजपुरी साहित्य के समुन्दर मे बुडकी लगावे के बेरि बेरि मन करेला आ संजोग अईसन जुटल की जय भोजपुरी प ई मोका खलिहा खिचडी खिचडी के ना हफ्ता दु हफ्ता प मिल जात बा !
साहित्य , भक्ति आ भोजपुरी के पुरहर आगे बढावत , सरसती माई से प्रार्थना आ निहोरा करत , करुनाकर रामायन के ई भाग भी अदभुत , अतुलनीय रचाईल बा !
राउर ई आसिरबाद हमनी के अईसही मिलत रहो ई हमनी खाति सौभाग्य के बात बा !
जय भोजपुरी
गुरू जी प्रणाम,
साहित्य , भक्ति आ भोजपुरी के पुरहर आगे बढावत , सरसती माई से प्रार्थना आ निहोरा करत , करुनाकर रामायन के ई भाग भी अदभुत , अतुलनीय रचाईल बा.
जय भोजपुरी
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