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पुर्वांचल एगो विकसित क्षेत्र चाही आ कि अलग राज्य से काम हो जाई ?

हम देखत बानी कहिया से लोग पुर्वांचल पुर्वांचल कहत बा ।
हम देखत बानी की लोग कहत बा कि पुर्वांचल बनला से पुर्वांचल के विकास हो जाई ।

त हम रउवा सब से पुछत बानी

आज जे सत्ता मे बा , भा जेकरा लगे सत्ता रहल हा तवना घरी पुर्वांचल के विकास ना कई पावल लेकिन आज चिचलात बा एकर का वजह बा ।

पुर्वांचल के जनता के संघर्ष पुर्वांचल ( एगो राज्य ) खातिर करे के चाही आ कि पुर्वांचल ( एगो विकसीत क्षेत्र ) खातिर करे के चाही ।

प्रश्न हमार बा , उत्तर राउर बा आ फेरु शुरु कईल जाई बहस !


ई बहुत जरुरी मुद्दा बा ( अईसन हमरा लागत बा ) राउर का ख्याल बा ?

इंतेजार बा रउवा कमेंट के !


जय भोजपुरी

Tags: अलग, , एगो, काम, कि, क्षेत्र, चाही, जाई, पुर्वांचल, राज्य, More…विकसित, से, हो

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Replies to This Discussion

आनन्द राय जी के लिखल ब्लाग "कोई नहीं समझ रहा पूर्वांचल का दुख" " के पोस्ट करत बानी , जवना से सब लोगन के एगो आईडिया मिल जाई पुर्वांचल के बारे मे ।

पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के साथ सरकार ने नाइंसाफी की है। बजट में इस बार भी पूर्वांचल छला गया है। बार बार छला जाना यहां की नियति हो गयी है। यह कोई नया खेल नहीं है। अंग्रेजों के जमाने से पूर्वांचल उपेक्षित है। यहां के लोगों के प्रतिरोध की ताकत अंग्रेजों को डराती है। आजादी बाद इसी ताकत से काले अंग्रेज भी डर रहे हैं। यही वजह है कि पूर्वांचल की गाडी विकास की पटरी पर दौड नहीं पायी। यह तो एक अदद लल्‍लू स्‍टेशन की तरह एक बार छूटा तो बार बार छूटने की रवायत बन गया है।

कबीर, गौतम बुद़ध और गुरु गोरक्ष के इस पूर्वांचल में अब दुख ही दुख है। इसके माथे पर कहीं संजरपुर है तो कहीं गरीबी, बेकारी और भुखमरी का कलंक। कभी आपने सोचा क्‍यों छला जा रहा है, यह इलाका, क्‍यों उपेक्षित कर दिया गया है पूर्वांचल। बात शायद आप सबकी समझ में आये लेकिन इसकी जड आजादी की लडाई से जुडी है। तब जब पहली बार स्‍वाधीनता संग्राम की नींव पडी तो बलिया के मंगल पाण्‍डेय उसकी पहली ईंट बन गये। वीर कुंवर सिंह का बलिया से लेकर आजमगढ तक का संघर्ष भी अंग्रेजों के वंशजों को भी नहीं भूला होगा। बाद में जब क्रांति शुरू हुई तब भी पूर्वांचल सबसे आगे था। 6 फरवरी 1922 को गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान चौरीचौरा थाना फूंका गया तब पूरी दुनिया यहां की क्रांति से वाकिफ हुई। बलिया के चित्‍तू पाण्‍डेय ने अपने दम पर अंग्रेजों के साम्राज्‍य में सूरज न डूबने के रिकार्ड को ध्‍वस्‍त कर बलिया को आजाद करा दिया था। उसके पहले गोरखपुर के बंधु सिंह की कुर्बानी इतिहास का दस्‍तावेज बन गयी थी। आजादी की लडाई में उदाहरण तो इतने हैं कि कई किताबें बन जायेंगी। पिपरीडीह ट्रेन डकैती ने आजादी की लडाई के लिए खजाने का बंदोबस्‍त किया। यह सब कुछ उन पूर्वजों की गौरवगाथा है जो गुलामी की बेडियों को काटकर आजाद होने का ख्‍वाब देखते थे। अब उनकी अतप्‍त आत्‍मा है। उन शहीदों की यादें हैं लेकिन इन सबके बावजूद कुर्बानी की कोई कीमत नहीं है। 1901 में अंग्रेजों ने इस इलाके को लेबर एरिया घोषित कर यहां के लोगों से एग्रीमेंट किया।


गिरमिटिया मजूदरों के रूप में यहां के लोग पिफजी, सूरीनाम, गुयाना, मारीशस, त्रिनिदाद और टोबैको जैसे देशों में गये। वे लोग अब वहां शासन कर रहे हैं लेकिन उनके भाई बंधु आज भी गिरमिटया मजूदरी के कलंक से उबर नहीं पाये हैं। आज भी मजूरी के सीजन में कुछ लोग गांव लौट आते और ि‍फर वे दिल्‍ली, मुम्‍बई, कलकत्‍ता, हरियाणा की ओर रुख कर देते हैं। तब घरों से रेलिया बैरी पिया को लिये जाय रे::::: जैसे विरह गीत गूंजने लगते हैं। तब वेदना अंखुवाती है और हर घर की दुल्‍हनों के ख्‍वाबों की सरहद दिल्‍ली, मुम्‍बई और कलकत्‍ता हो जाती है। दुख तो तब बढ जाता है जब परदेस गये उनके पिया एड़स लेकर लौटते हैं और जवानी तिल तिल कर मरने लगती है।


यह सब क्‍यों हुआ। आजादी के बाद भी यहां की तस्‍वीर क्‍यों नहीं बदली। 1952 में बने के:एम: पणिक्‍कर आयोग की रपटों को क्‍यों दरकिनार कर दिया गया। गाजीपुर के सांसद विश्‍वनाथ गहमरी की दर्द भरी अपीलों पर पटेल आयोग बनाकर उसकी सिफारिशों को क्‍यों उपेक्षित कर दिया गया। सेन कमेटी की रिपोर्ट कहां गुम हो गयी। सवाल दर सवाल हैं। आज बस पूर्वांचल के दुखों को लेकर अलग पूर्वांचल राज्‍य का मुद़दा गरमाया जा रहा है। पर यह मुद़दा कौन गरमा रहा है। हाशिये पर गये हुये लोगों के लिए ही पूर्वांचल राज्‍य है। जो भी मुख्‍य धारा में रहा उसने कभी पूर्वांचल राज्‍य के मुद़दे पर अपनी जुबान नहीं खोली। अब अमर सिंह पूर्वांचल राज्‍य को लेकर उम्‍मीदें जगा रहे हैं। पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री कल्‍पनाथ राय, रामधारी शास्‍त्री, सुरेश यादव, पूर्व राज्‍यपाल मधुकर दिघे, शतरूद्र प्रकाश, अंजना प्रकाश जैसे न जाने कितने लोग इस मुद़दे के इतिहास बने गये हैं। अभी भविष्‍य बनने के लिए कुछ स्‍वयंभू संगठन भी लगे हुये हैं। पर पूर्वांचल की जनता इस छद़म युदध में शामिल नहीं हो रही है। उत्‍तराखण्‍ड और झारखण्‍ड की तरह राज्‍य बंटवारे को लेकर सडकों पर कभी कोई गूंज सुनायी नहीं दे रही है।


चुनावों के दौरान इतिहास के पन्‍ने पलटने पर हमें तो हमेशा यही लगा कि यहां के लोगों के प्रतिरोध की ताकत ही उनके विकास की सबसे बडी दुश्‍मन बनी। उन दिनों जब पण्डित जवाहर लाल नेहरू की अपील जनमानस पर अपना असर छोडती थी उन दिनों भी पूर्वांचल में विरोध की आवाज का मतलब था। पडरौना में नेहरू की अपील के खिलाफ जनता ने सोशलिस्‍ट पार्टी के रामजी वर्मा को 1952 में अपना सांसद बना दिया तो यह इलाका उनकी नजरों में चुभने लगा। हमेशा प्रतिपक्ष को मुखर करने में यहां के लोगों ने अपनी ताकत दी। सत्‍ता में पैर जमाने के लिए भी खूब मदद की लेकिन यहां का तेवर सत्‍ता को रास नहीं आया। चाहे सपा हो या बसपा, जब उनके पैर जमे तो जमीन पूर्वांचल की ही थी। पूर्वांचल ने सबको सिर माथे पे बिठाया लेकिन किसी ने यहां की तकदीर और तस्‍वीर नहीं बदली। पूर्वांचल ने जब जी चाहा लोगों को ताकत दी और मन से कोई उतरा तो उसे सिंहासन से नीचे उतार दिया। इस डर ने यहां भेदभाव के बीज बोने शुरू कर दिये। सियासतदारों ने पूर्वांचल को अपने अपने लिए एक प्रयोगशाला बना दिया। लिहाजा बहुत ही ताकतवर पूर्वांचल अपने प्रतिरोध को सही दिशा नहीं दे पाया। सियासतदारों ने तो इसे जाति, धर्म और अपराध के खांचों में बांट दिया। टुकडों-टुकडों में बंटे लोग राजनीति के औंजार बनते रहे और उनकी अपनी पहचान नहीं बन पायी। अब यहां सिर्फ दुख ही दुख है। यहां की प्रतिभाओं को भी उचित प्‍लेटफार्म नहीं मिल रहा है।


उद़योग के क्षेत्र में तो यहां की हालत वैसे ही पतली है। बिजली नहीं है। सडकें टूटी हैं। नदियां सिर्फ उफनाती हैं। नहरे सूख गयी हैं। पानी का स्‍तर घटने लगा है। दर्द एक हो तब तो बताएं यहां तो घाव ही घाव है किसे किसे दिखायें। पूर्वांचल में 1903 में देवरिया जिले के प्रतापपुर में गांधी जी की पहल पर एक औद़योगिक घराने ने चीनी मिल की स्‍थापना की। बाद के दिनों में यहां चीनी मिलों की संख्‍या बढकर 26 हो गयी। पर गन्‍ना किसानों की उपेक्षा, गन्‍ना मूल्‍य का बकाया और सरकारी उत्‍पीडन से चीनी मिलों ने दम तोडना शुरू कर दिया। अब तो सिर्फ 13 चीनी मिलें ही यहां रह गयी हैं जो चालू हालत में हैं मगर वह भी बीमार हैं। गोरखपुर का फर्टिलाइजर कारखाना 1991से बंद है। हम हमेशा सुनते आ रहे हैं कि कारखाना चालू होगा। पर उसकी उम्‍मीद नजर नहीं आती। नरसिम्‍हा राव प्रधानमंत्री होकर गोरखपुर आये थे। उन्‍होंने एलान किया- फर्टिलाइजर कारखाना चालू होगा , जनता की उम्‍मीदों को पंख लग गये। लगा कि अब गोरखपुर गुलजार हो जायेगा, लेकिन सपना सपना ही रह गया। इस सपने को देवगौडा ने भी जगाया। गुजराल, अटल विहारी वाजपेयी और पिछले चुनाव में मनमोहन सिंह ने भी इसे हवा दी।

रामविलास पासवान तो ऐसे बोलते थे जैसे उनका विमान उडा और कारखाने के लिए कार्य शुरू हो गया। कुछ नहीं हुआ। नेपाल की जलकुण्‍डी और करनाली परियोजना भी अभी तक वैसे ही है। हर साल आने वाली बाढ में पूर्वांचल और बिहार बर्बाद होता है। सैकडो एकड भूमि उसर हो जाती है। हजारों परिवार बेघर हो जाते हैं लेकिन सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों को इसकी पिफक्र नहीं है। लोग तो मस्‍त हैं और नेपाल की सरहद भारत के लिए असुरक्षित होती जा रही है। जाली नोटों के कारोबार ने जडे खोखली कर दी हैं, अर्थव्‍यवस्‍था चरमरा रही है। लगे हाथ यहां के बेरोजगार बिगड रहे हैं। मोबाइल, बाइक और असलहों की चाह ने युवाओं की दिशा बदल दी। जाली नोटों के कारोबार में वे तस्‍करों के हाथों का खिलौना बन गये हैं। इश्कियां जैसे सिनेमा में विशाल भारद्वाज यहां की स्थिति दिखाते हैं तो लोगों को तकलीफ होती है। सिनेमा के पोस्‍टर फाडे जाते हैं लेकिन कभी उस दर्द को कोई शिद़दत से नहीं समझ सका है।
कुछ बहुत ही गंभीर मुद्दा ये लेख में उथल बा ,
का पुर्बांचल में कौनो ख़ास बात बा, कि सबे ईहाँ से मजदूर ही ले जाला , सूरीनाम, फिजी , मरिसस , मुंबई पहिले के ज़माने के और आज त कौनो शहर में जाईला पर ...मजदूरी वाला काम में अपने लोगवा बा ...

का इ लोग अगर अपने इहाँ वुहे मजदूरी करे त ये लोग के काम मिली ?
का इ लोग अगर खेती में काम करे वोही जोश से त का खाना पानी मिल जाई ?
बंद कारखाना अगर फेर से खुल भी जाए त सबके रोजगार मिल पाई ?
रिपोर्ट त ढेर बनेला , लेकिन जमीन पर आके केतना बनावल जाला ?
अलग राज्य बनला से , अफसर और नेता लोगन के संख्या बढ़ जाई और खर्चा औरो बढ़ी ...लोग के का फायदा होई इ के बतायी चाहे कैसे आंकलन होई ...( झारखण्ड के जीता जगता उदाहरण बा ...चोरी छोड़ के औरो कौनो चीज में प्रगति नईखे भईल)

कहीं सामंती सोच के मारे त हमन के इ हालत त नईखे ? हमन के ईहाँ आज भी उंच नीच के ढेर भेद भाव बा ..औरो कहीं एतना नईखे .
कहीं जमीन के ठीक से बंटवारा ना होखला से त हमन के इ हालत नईखे ? आज भी बिहार में सिल्लिंग ना लागल , आ जगन्नाथ मिश्र जी के परिवार के पास सैकड़ो एकड़ जम्में बा , आ गाँव के लोग खाली वो जमीन में काम करेला ...
बागी अगर हईं जा त सब लोगवा चोरी करत बा , त केहू आगे आ के काहे नईखे रोकत ?

कई सवाल , आ जबाब त एको गो के नईखे हमरा पास ...सबे मिल के सोचे
RAJY BANALA SE VIKAS JANTA KE NA HOI , NETA LOGAN SAPAN PURA HO JAYEE, PURVANCHAL KE VIKAS HOKHE, RAJYA BANAWAL HOSHIYARI NA HOKHI, RAJYA MEIN AA STHIR SARKAR BANIHE, NETA LOG KAMAAI KARIHE
VIKASH KHATIR, CHETANA CHAHI JAVAN PURVANCHLI NETALOGAN MEI NAYEEKHE,
NAV TARUN VARGA KE AAVAHAN BATE , SARKARI TANTRA PER LAGGAM KADA KARKE, SUCHANA KE AADHIKAR KE SDUPAYOG KAYEEL JAAO, SAMAZ ME AANKH KHOL KE SARKARI PAYYESA KE DURUPAYOG ROKAL JAO, TECHNIKAL EDUCATION KE BADHWAL JAO
HAMAR TAA IHE VICHAR BATE
शाही जी , विनय जी प्रणाम आ जय भोजपुरी

बहुत बहुत धन्यवाद बा रउवा सब के जे एह मुद्दा के उपर अपना सोच से सींचे के कोशिश कईनी जवना से कई विचार कभी फुल त कभी फल के तरह निकलिहन स ।

एह विषय के शुरु करे के समय हम तनि दुविधा मे रहनी हा आ उचित हेडिंग ना मिलत रहल हा बाद मे जब रउवा सब के कमेंट पढनी हा त हमरा लागल हा कि हेडिंग के बदले के जरुरत बा , एकर कारण ई रहल हा कि अईसन मुद्दा पे जवना मे पुर्वांचल भी बा बहस हो चुकल बा ।

लेकिन आनन्द राय जी ब्लाग के हम पढनी हा आ हाल फिलहाल मे जवन घटनाक्रम चल रहल बा , जवना हिसाब से नेता लोग पुर्वांचल खातिर बार बार बिछ्ला बिछला के गिर रहल अब वोह के पढला आ देखला के बाद हमरा लागल हा कि का अलग राज्य बनवला से पुर्वांचल के विकास हो जाई ?


नेता उहे रही , जनता उहे रही , तौर तरिका उहे रही फेरु पुर्वांचल के का ?


आनन्द जी के ब्लाग से कुछ चीज जवन सामने निकल के आवत बाडी स हम वोह के भी धरे के कोशिश करत बानी आ वोह के विन्दुवार लिखे के कोशिश करत बानी ।


1- गिरमिटिया मजदुर बन के जब हमनी के पुर्वज लोग दोसरा दोसरा जगह गईल लो तब उ लोग खेती भा फैक्टरी मे काम करत रहल लो , फेरु हमनी के तरफ खेती मे का बेवाई फाट गईल बा जे पैदावार दिन प्रतिदिन कम हो रहल बा लोगन के मन खराब हो रहल बा खेती से । साथ साथ मे हम इहो कहल चाहब की जब हमनी के तरफ के लोग एजुगा से दोसरा जगह जा के कल कारखाना मे नीमन कई के देखावत बा फेरु पुर्वांचल के फैक्टरी काहे फेल मार गईली स । ( हमरा फैक्टरी वाला मैटर पे ढेर मालुम नईखे लेकिन पहिला बार पढला पे भा देखला पे इहे लागत बा कि दोसरा जगह हमनी के फरहर काम करे मे लागल बानी जा लेकिन अपना किहा ना आ ई बात हम तब के कहत बानी जन आप्सन रहे , जोगाड रहे , काहे कि जब हमनी के बड भईनी जा तब त कुछ रहबे ना कईल सब चीज त छीतरा गईल रहे )


2- धयान देबे के बात बा कि अंग्रेज हमनी के क्षेत्र के काहे लेबर एरिया घोषित कईले रहलन स । हमरा जवन कारण लागत बा वोह के हिसाब से हमनी के तरफ के वोह समय के लोग बहुत ही कर्मठ , जीवट रहलन आ हो सकत बा उ लोग वोह जमाना मे पुर्वांचल क्षेत्र ने नीमन दिशा आ दशा मे रखले रहलन आ जवना वजह से अंग्रेजन के आंख लागि गईल आ ओकरा बा ओकनी के हमनी के पुरवज लोगन के हेने होने छितरा देहलन स । हो सकेला अमीरी गरीबी के खाई भी आ साथ साथ मे जाति पाति के ढकोसला नियम कानुन एह मे बरियार काम कईले होखे ।


खैर इतिहास से बहरी आके आज के समय मे हो रहल चीजन पे लिखे के कोशिश करत बानी ।

सीमा भा डराण बन्हा गईला से विकास कबो ना होला , विकास होला जब विकास करे खातिर भुख लागी , विकास तब होला जब विकास खातिर लोगन के सोच एक होई , विकास तब होला जब विकास के नाई के केहु खेवनहार मिली , विकास तब होला जब विकास करे के सोच वाला नेता मिली , विकास तब होई जब विकास के आधार पे लोग अपना नेता लोगन के चुनी ।


बिहार आज के समय मे बहुत बरियार उदाहरण बा जहवा के राजनिति से ले के लोगन के सोच के दिशा और दशा बदल गईल । एगो समय रहल जब बिहार मे विकास के बात माने सुरज के दिया देखवला लेखा रहे लेकिन आज उहे बिहार मे विकास के मुद्दा हर गली हर कुचा मे बड से ले के छोट तक अमीर से ले के गरीब तक , आदमी से ले के औरत तक , शहर से ले के गांव तक सबके जबान पे आ ई काहे भईल , रउवा सब जानत बानी ।


त हमरा हिसाब से जब ले पुर्वांचल मे विकास के बात ना उठी ( हम विकास के नाव से पार्टी बानवे के बात नईखी करत ) तब ले पुर्वांचल के दिन दशा ना सुधरी । आज भी हमनी के तरफ के नेता उहे राजनिति खेलत बा जवन पहिले होत रहल हा , इचिको सुधार नईखे सोच मे आ लक्ष्य मे , चाहे जनता होखे भा नेता ।


हम त बस इहे निहोरा करब की हमनी के आपन आपन घर गांव आ भा जे भी मिले ओकरा दिमाग मे विकास के बात ठुसल जाउ , बतावल जाउ समझावल जाउ तबे कुछ हो सकेला नाही त फेरु छुछे बानी जा , छुछे रहब जा आ छुछे जिनगी गुजरी ।


हम एजुगा विश्वनाथ गहमरी जी के संसद मे कहल एगो लाईन लिखल चाहब - पुर्वांचल का गरीब गाय या भैंस के गोबर से अनाज निकाल कर खाता है । आ एह लाईन पे संसद के लगभग हर सांसद के आंख छलछला गईल , लेकिन आज के बेहया हमनी के नेता बात त बहुत दुर के करत बाडन स लेकिन घर के हालत का बा वोह के नईखन स पुछत ।


माफ करब सभे हम तनी ढेर लिख दिहनी आ कुछ गलत लिख देहनी त ।



जय भोजपुरी
Bhai Namskar,
Alag Prvanchal ka mang ham bahut din se dekhat bani..Bichhe me gorakhpur me bhi jay ke milal rahal hai ehi tarah ke ek railly men..okare bad hamare ek bat bahut achhi tarah samajhh me aa gail ki alag purvanchal bana ke oahan ka sawarn aur amir duno aapane punji ke rajniti ke sath mila ke surakshhit ka ke badhawal chahat haue..Alag purvanchal ke pure andolan me kahin bhi aam garib admi aur dalitan ka kuchh vias nahi hoi..
Itihas ka anubhav bhi ihe kahat ta. Chhatishgarh, Jhharkhand aur Uttrakhand vahan ka punjipati varg logan ke vikas ke nam par andoln ka ke banaule rahal lekin aaj u log ta banige aur aam admi ka halat aur kharab ho gail...
Ham ek alag purvanchal ke andolan logan ka urja barbad kaile ke bajay ek sahi vikas khati sahi andolan ka pakshhadhar jarur hain...
Dhanyabad
Gopal ji,
Namaste. hum aap se sahmat nahin hain yahan amir ya garib ki bat nahi ho rahi hai jahan tak hamre samaj se hamne ke purvanchal ke logan ke vikas khatir soche wala manch samjhat bani jan,jab alag state ban jai tab bhut kuch ah adme khatir kael ja sakat ba hamni ke door ja ke kaam na khoje ke pari purvanchal ke lage apan jameen pani aur bijli rahi ta bhut kuch kael ja sakat ba CHOT GHAR HERDAM SUNDER HOLA.LUCKNOW SE BAHUT DUR BANI JA HAMNE KE BHASA CULTURE SABKUCH MEL NA KHALA AHISE PICHLA 60 SAL SE HAMNI KE 100 SAL PICHE HO GAYEL BANI JA
ha hamaro vichar ba ki purwanchal rajya bane aur okara ka vikas ho
hum 60 salon se jahan ke tahan hai hindustan ke most importent chairs per log purvanchal chetra se hi rahe hain aur chetra ke liye kuch nain kiya kyon ki hame granted liya gaya.Sayad iseliye purvanchal kise bhi tarah ke devlpt se vanchit rakh diya gaya aur isiliye it is never late jab jogo tab savera aab jaldi se jaldi ham longo ko vikash ke liye alag ho he jana chahiye main yahan nam nahin lena chonga sare cehre aap ke samne aa hi gaye honge. kya main galat hoon.
उदयवीर जी प्रणाम आ जय भोजपुरी

अलगा हो गईला के बाद के राज करी ?
उहे नु जवन 60 साल से करत बा फेरु का फायेदा ?

alag rajya banawal..kawno samasya ke hal na hoi..hanar ichha ba ki pura deshwe ego hokhe...sab ..mil ke rahe ..aur khali vikas ke bare me soche...rajya banawal khali rajniti ke hissa ba..vikas kauno dhyey naikhe eme..

 

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