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नरहीं (बलिया): टूटते सामाजिक मूल्यों, नैतिक पराभव और आधुनिकता की चकाचौंध में एक तरफ सामाजिक परिवेश जहां तेजी से बदल रहा है वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसी भी लोक परम्पराएं हैं जो सामाजिक समरसता को बनाये हुए हैं।

 

विकास खण्ड सोहांव के नरहीं गांव में आज भी ऐसी ही एक परम्परा कायम है और वह है शादी विवाह के कार्यक्रम से पूर्व गांव में कहंतरी (हांडी) बांटने की परम्परा। यही कारण है कि यहां इन अवसरों पर दही की छिलबिल हो जाती है। आज जहां काज प्रयोजन में दही खिलाने की परम्परा समाप्ति की ओर है वहां नरहीं में दही की नदी बह जाती है। इस पुरानी परम्परा को आज भी लोग जीवित रखे हैं। पुरनियों की कहानी के अनुसार सदियों पूर्व इस परम्परा को अस्तित्व में लाने के पीछे उद्देश्य यही था कि गांव के लोगों में एकजुटता बनी रहे। भाईचारा कायम रहे।

दूसरा पहलू यह है कि जिसके घर शादी रहती थी उसकी मदद भी हो जाती है। साथ ही थोड़े से प्रयास में अमृत तुल्य पवित्र दही सभी बारातियों घरातियों या और भी खाने वालों को मिल जाती है। इस परम्परा के अनुसार जिसके घर परोजन रहता है उस परिवार के लोग घर-घर हांड़ी पहुंचा देते हैं। परोजन के दिन दही से भरी कहंतरी (हांड़ी) सम्बंधित व्यक्ति के घर गोंड या खरवार बिरादरी के लोगों के माध्यम से पहुंचा दी जाती है। इसमें भी होड़ रहती है कि किसके घर की दही सबसे उम्दा है। इस परम्परा को जीवित रखने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि रुपये का न्योता देने में इस गांव के लोग शर्मिन्दगी महसूस करते हैं।

 

वर्तमान समय में कुम्हारों के धंधे पर गहराये संकट की वजह से हांड़ी की दिक्कत होती है लेकिन इससे परम्परा पर कोई असर नहीं पड़ता। खास बात यह कि इस परम्परा में वे लोग भी शामिल होते हैं जिनका एक दूसरे के यहां आना-जाना न हो, खान-पान भोज-भात न हो लेकिन हांड़ी की लेन देन देन चलती रहती है।

 

स्रोत - जागरण

Tags: कहंतरी, दही, परम्परा, विवाह, शादी

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Replies to This Discussion

नवीन जी 

परंपरा भी अब हॅम्नी के जिला तक ही सिमट गैएल बा. 

भईया प्रणाम

 

जी बलिआ , आरा छपरा सिवान बक्सर देवरिया गाजीपुर मे त हम खुद देखले बानी , बाकी धीरे धीरे शहरी करण जवन होत बा ओकर असर ई बा की कहंतरी के दही नईखे मिलत पहुंचावल आ नेवता मे दिहल त दुर के बात बा !

 

बाकी गांव गांव मे अबहियो ई चलत बा !

 

धन्यवाद राउर जे आपन विचार देहनी

 

जय भोजपुरी

ek dum sahi naveen bhai jee humni kihanwa e abahiyon ba ! bayno ba !

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