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बलिया: विकास के मामले में मारीशस ने भले ही अर्श की ऊंचाइयां छू ली हो लेकिन इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि वह महकता है तो भोजपुरी की सोंधी सी खुशबू से ही। कारण कि यहां की करीब आधी से अधिक आबादी भोजपुरी क्षेत्र के लोगों की ही है। खास बात यह कि वहां के कानून ने भी भोजपुरी को वैकल्पिक भाषा का दर्जा दे रखा है। संस्कृति की चर्चा करे तो शादी के वक्त दूल्हे पूर्वाचल का पहनावा धोती-कुर्ता ही पहनते है। रोजी-रोजगार की तलाश में अरसे पहले इस क्षेत्र के लोगों ने यहां की धरती पर कदम रखा और आज वहां इतनी तरक्की कर ली है। वे अपनी मातृभूमि को भी विकास के मामले में कतई पीछे नहीं देखना चाहते। यहां बता देना जरूरी है कि इनमें से कुछ लोग वहां के उच्च पदों को भी बखूबी सम्भालते हुए औरों के लिए नजीर बने हुए है।

 

बागी धरती की अगर बात करे तो यहां के लोग मौजूदा व्यवस्थाओं व सुविधाओं से भले ही संतुष्ट हों लेकिन मारीशस में भारतीय मूल के म्यूनिसिपल कमिश्नर चित्तमन दुखी राय यहां के सूरत-ए-हाल को देख काफी आहत है। यहां केइन्फ्रास्ट्रक्चर में तत्काल बदलाव की आवश्यकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि समझ में नहीं आता कि जंग-ए-आजादी में अव्वल रहने वाला बलिया विकास के मामले में इतना पीछे क्यों है। उन्होंने कहा कि अफसोस की बात है कि भारत की आजादी से पहले ही स्वतंत्रता हासिल कर लेने वाले उत्तर प्रदेश के बलिया, पश्चिम बंगाल के मिदनापुर व महाराष्ट्र के सतारा विकास की उन ऊंचाइयों को आज भी नहीं छू सके है जिसके ये हकदार है। बता दें कि स्थानीय कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए यहां आये चित्तमन दुखी राय इस जनपद के अंतर्गत शिवपुर के मूल निवासी है। यह गांव कब का ही गंगा की लहरों में समाहित हो चुका है। रोजी-रोटी की तलाश में इनके पूर्वज वर्ष 1880 में मारीशस गये थे और उसके बाद वहीं के होकर रह गये। शुक्रवार को 'जागरण' से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे अब तक करीब सत्तर देशों का भ्रमण कर चुके है और 'इण्डियंस इन इण्डिया, मारीशस एण्ड साउथ अफ्रीका' के अलावा दो दर्जन पुस्तकें अंग्रेजी व फ्रेंच में लिख चुके है।

 

स्रोत - जागरण

Tags: -, कुर्ता, धोती

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Replies to This Discussion

जहवा आजु के समय मे भोजपुरिया क्षेत्र के लोग , शादी बिआह के समय दुल्हा के टाई - सुट - बुट पहिनावत बा ओजुगे मारिसस अईसन देसन मे अधिकतर दुल्हा लोग बिआह के बेरि आजुवो " धोती -कुर्ता " पहिनत बा । 

आपन संस्कार आ संस्कृति के कबो भुलाये के ना चाही । अगर केहु अपना संस्कार , संस्कृति आ मातृ भाषा मे टंच बा त उ एहि तरे जीट जाट मे बा ओकरा कुछु मुह पे आ देहि पे लभेरे आ अलगा से तोपे ढांके के जरुरत नईखे ।

Namaskar Navin ji!!

 

jaibhojpuri ke bare main pahile na janat rahni hai....ab pata chalal ba ta accnt banyile bani....dusro ke bare main to kuchh nahi bol sakta bt apan shadi main dhoti-kurta jarur pehnam...soch ke rakhle bani...bt shadi main abhi bahut time ba!!

समय के साथ सब कुछ में थोडा बहुत परिवर्तन जरुरी होला. बाकिर एकर मतलब इ न की आपन संस्कृति के भुला जाईल जाव. हमारा ईहा अभियो बियाह धोतिए पहिरा के होला. भले दुलहा अपना घरे से जीट-जाट होके थ्री पिस पहिर के जास बाकिर बियाह के बेरी पाईट उतार के धोती खोंसे के पड़ेला.

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