जब से मुलायम सिंह से अमर सिंह का साथ छुटा है अचानक ही अमर सिंह को अपनी जाति और अपने क्षेत्र की याद सताने लगी है । और वो याद ऐसी कि कई रैलियो का आयोजन होने लगा है और ऐसा लग रहा है जैसे पुर्वांचल अब जा के गरीब हो गया है , क्षत्रिय अब जा के गरीब होने लगे है ।
नेतावो का ढकोसला प्रेम तो हमे हर जगह देखने को मिलता है और शायद अमर सिंह उस कडी की सबसे मजबुत कडी है । ज्ञात हो कि पुर्वांचल एक ऐसा इलाका है जो क्षत्रिय बहुल माना जाता है और पिछले कई सालो से क्षत्रिय उम्मीदवार कई जगहो से जीतते आये है । एक तरह से कहा जाय कि पुर्वांचल पे अगर क्षत्रियो का प्रभुत्व है तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी ।
अमर सिंह अब क्षत्रिय और क्षेत्र ( पुर्वांचल) के मुद्दे को जिस प्रकार से हवा दे रहे है और पुर्वांचल के मांग करने वाले छोटे छोटे दलो का जिस प्रकार से समर्थन उन्हे मिल रहा है उस हिसाब से अगर देखा जाय तो ये मुद्दा आने वाले चुनाव मे एक बहुत बडा हथियार साबित होने वाला है ।
उनके ब्लाग पे लिखी यह लाईन अपने आप पे उनकी मंशा को जाहिर करती है - अब पूर्वांचल और उत्तरप्रदेश के बटवारे को रोकने की मुहीम चला रहे है. यहाँ आज़मगढ़ का यादव भी चींख-चींख कर कह रहा है “ए भाई कबले हमहने के ईहाँ इटावा राज करी, कल्बों हमहनों क आपन राज आई की ना”.
इस जनवाणी की व्याख्या मुझसा तुच्छ प्राणी क्या करे. ईश्वर करे की मेरे भूतपूर्व दल के अभूतपूर्व नेता उत्तराखंड की भाँती पूर्वांचल, हरितप्रदेश और बुंदेलखंड की जनाभावनों के प्रतिकूल अपने राजनैतिक आचरण को सुधारें वरना उन्हें राजनीति के हाशिये पर जा कर अपने ही गृह जनपद इटावा के प्रसिद्द कवि श्री गोपालदास नीरज का यह गीत न गाना पड़े, “कारवाँ गुजर गया और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे.”
भले ही यह वाक्य उन्होने ने नेताजी ( मुलायम सिंह ) के लिये कहा हो लेकिन उनकी मंशा साफ जाहिर हो रही है साथ मे अभी हाल फिलहाल मे उनका दिया हुआ यह बयान - शेष जिंदगी का मकसद पूर्वाचल राज्य और अति पिछड़ों व मुस्लिमों को हक दिलाना है।
जहा तक मेरी जानकारी है अमर सिंह को बलिया के सांसद नीरज शेखर तथा एम एल सी रविशंकर सिंह उर्फ पप्पु सिंह का भीतरी समर्थन मिल रहा है और इसी प्रकार से अन्य शहरो मे भी उन्हे क्षत्रिय समाज से काफी प्रोत्साहन और समर्थन मिल रहा है ।
और अगर बात पुर्वांचल का है तो हो सकता है अन्य नेता भी पृथक राज्य कि मांग को लेकर उनके साथ जुड सकते है और इसका वजह ये भी है कि पुर्वांचल मे विकास लगभग नगण्य है । ( सच्चाई यह है कि जितना पैसा 1992 से पुर्वांचल को मिला है अगर उतना पैसा किसी और क्षेत्र को मिला रहता तो शायद वो क्षेत्र विकास के लहजे से बहुत आगे रहता )। अभी हाल ही मे वीर लोरिक सेना के प्रदेश अध्यक्ष व लोक मंच के नेता मनोज कुमार यादव ने कहा कि पृथक पूर्वाचल राज्य का गठन हुए बगैर 85844 वर्ग किमी क्षेत्र में फैले 27 जनपदों का भला नहीं हो सकता। लोक मंच के संस्थापक अमर सिंह की अगुवाई में पृथक राज्य की यह लड़ाई रंग लायेगी और पूर्वाचल को उसका हक मिलेगा।
कुछ और चीजे जो सामने उभर के आ रही है और मेरा खुद का अनुभव कह रहा है कि अमर सिंह एक तीर से कई शिकार करना चाह रहे है ।
1- पुर्वांचल से इस समय कोई कद्दावर नेता नही है ( मुरली मनोहर जोशी है लेकिन उनका पुर्वांचल मे कितना चलता है वो पुर्वांचल ही जानता है )
2- जिस प्रकार पृथक राज्य कि मांग चल रही है और यु पी जितना बडा है उसे देख कर ऐसा लगता है कि आज ना कल अगर लोग अमर सिंह के बैनर के नीचे या अन्य पार्टियो के बैनर के नीचे जुटते है तो पुर्वांचल शायद एक राज्य बन जाय।
3- नेता विहीन पुर्वांचल का शायद पहले मुख्यमंत्री बनना चाह रहे है।
4- चुकि अमर सिंह को मालुम है कि उनका अपना कोई जनाधार नही है इस लिये पुर्वांचल और क्षत्रिय का मुद्दा उन्हे बना बनाया मिल जायेगा जो इन्हे जनाधार के साथ साथ कुर्सी तक पहुचा सकता है ।
5- शायद इन्हे राष्ट्रीय पार्टी मे से किसी एक का समर्थन अलग राज्य पे मिल सकता है, क्योंकि दोनो ही राष्ट्रीय पार्टिया पुर्वांचल मे वोट , जनाधार और सीट पाने की जुगत मे है ।
कुछ फिल्मो से जुडे लोगो के साथ होने , कुछ जनता का पुर्वांचल के मुद्दे पर साथ, कुछ क्षत्रिय मुद्दे की वजह से , और कुछ राष्ट्रीय पार्टी का साथ शायद अमर सिंह को वो सपना दिखाने पे मजबुर कर दिया है जिसे अमर सिंह ने पहले कभी नही देखा है लेकिन इस सपने मे पुर्वांचल एक बार फिर से लुटने वाला है ।
धन्यवाद और आभारी
नवीन भोजपुरिया
नोट - ई लेख हम एगो हिन्दी पत्रिका खातिर लिखले रहनी एह से हिन्दी मे बा ।
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