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का ऱवुआ याद बा कि अपने के आखरी बार मन भर कब हंसले रहनी? अईसन जोरदार हंसी कि हंसत-हंसत लोटपोट हो गईल होई, कि मुंह दुखाऐ लागल होखे, कि आंख से लोर निकलल होखे, कि पेट में बाथा उपट गईल होखे…। याद नईखे आवत नू! आज-काल्ह के तनाव वाला ऐह दौर में हंसी वाकई महंगा हो गईल बावे। लोग के लगे सब चीज खतीरा समय बा बाकीर हंसे-हंसावे खतीरा नईखे, जबकि हंसी के फायदा केतना बावे शायद केहु जानतो नईखे।

 

हंसी से बड़ कोवनो दवा नईखे. . .

ऐहबात के हमनी हमेशा सुनेनी जा, बाकीर मानले शायद कम बानी जा काहेकि बिना कवनो खर्चा के इलाज के बात बढीया से हजम ना होला। वईसे भी, जिंदगी के दवुडान अउर तनाव लोग के हंसल भुलावा देला बा। एगो आर्टीकल कही पढले रहनी कि पहीले लोग रोजो करीब 18 मिनट हंसत रहे, अब 6 मिनट ही हंसत बालो जबकि हंसल बहुत फायदा वाला बवो।

 

 

त आज से हमनी के ईहे करे के बा कि जादा ना त दिन भर में कम से कम 5 बार हंसल जाई अउर दोसरा के भी हंसावल जाई।


                                   

ऐह शहर मे कवनो मंदीर नईखे, कहँवा हम प्रभू से आशीश लेम।

सोचत बानी कि हर रोज एगो, रोअत इंसान के हम हँसा देम।।

जय भोजपुरी

Tags: संजीव

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Replies to This Discussion

मंहगा फरमाईश

"अरे सुनत बानी?" फुलमतिया जी खदेरन के कहली।

"हूँ" खदेरन के संक्षिप्त जवाब रहे।

"पाठक बाबू कंचन दीदी के ढेर महंगा-महंगा जगह से घुमा कर के आईल बाडे।" फुलमतिया जी कहली।

कवनो उधेर-बुन में लागल, खदेरन फेरू "हूं-हां" में ही जवाब देहले।

ई देख फुलमतिया जी के लागल कि सीधे मुद्दा पर आवल जाव। बोलली, "हमरो के भी कही महंगा जगह पर घुमावे ले चली ना!"

खदेरन ओही धुन में बोलत चल गईले, "चल तईयार हो जा, चलल जाव।"

खुश भईल फुलमतिया जी के मन में शंका भी जनम लेहलस, उन्हा के दूर कईल ही उचित समझनी। पूछनी, "कहां-कहां ले चलल जाई?"

खदेरन कहले , "पहीले पेट्रोल पंप चलल जाई, फेर गैस एजेन्सी के इंहा और अंत में सब्जी मंडी।

हा हा हा हा हा हा हा सही बा

हा हा हा हा... हंसी त आवता लेकिन फेर लागता कि ई सांचो सबसे महंगा जगह हवे...

ji jarur bhai ji |

bada mahanga jagah khojla hahahahaa|

असल के जिनगी

एक दिन आशुतोष भईया अउर प्रवीन भाई टीवी पर फिलीम देखत रहे लो। फिलीम के अंत देख के प्रवीन भाई बहुत भावुक हो गईले। उनका आंख से टप-टप लोर गिरे लागल।

आशुतोष भईया कहनी, "अरे प्रवीन रोअत काहे बाड? कवनो असल के जिनगी थोड़े ह। फिलीम ह।"

प्रवीन भाई लोर पोछत कहले, "अच्छा। भईया! फिलमी जिनगी अउर असल जिनगी में का फ़र्क़ होला?"

आशुतोष भईया बतवनी, "फिलीम में बहुत मुश्किल के बाद शादी होला, अउर असल जिनगी में शादी के बाद मुश्किल के पता चले ला।"

संजीव भाई हमरा देखे से आशुतोष भाई के जगहि प राउर नाव ढेर नीमन कहाईत , टटके के अनुभव बा ;-)

हा हा हा हा हा हा प्रवीन जी त अभी चानी काटत बाडे ;-)

हा हा हा हा

गलती हो गईल हवे।

हा हा हा हा... हमहुँ नवीन भाई से सहमत बानी... ;)

हाहा हा हा ...................हा हा हा हा,
संजीव भाई का का मुस्किल पता चलल ह तनी हमनीओ के बताय्म राउर अनुभव त ट्ट्का ह नु...................

त्याग

आज अचानक ही मन मे खयाल आईल हवे कि अन्ना हजारे अउर मल्लिका शेरावत मे कवन गुण एके लेखा बा?

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अब याद आईल कि दुनु जाना मे त्याग के भावना एक लेखा बा।

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अन्ना जी ------------------- भोजन त्याग देहले ----------------------- देश खतीरा।

मल्लिका जी -----------------कपडा त्याग देहली ---------------देशवासीयन खतीरा।

हा हा हा हा... आ दूनो जाना त्याग के "फल" से जन-जन के नित्य-स्मरणीय बन चुकल बा लोग... :)

hahhhahaa|

badhiya darja a mel kaila bhaiya |

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