JaiBhojpuri.com

Come, let's do something for Bhojpuri...

दिल में आवे वाली कवनो दू गो , चार गो लाइन के शायरी लिख देबे के बाटे |

बस अइसन होखे के की सब लोग पढ़ सके |

Views: 523

Replies to This Discussion

चनरमा आ
चाँदनी के, 
फेरा मे, 
भकुवाईल, 
बबुआ के , 
जब लागल ठेस, 
सुखले भहरईले 
आ, 
लिलार, भुभुन फुटल 
तब बुझाईल, 
माटी के मोल का होला ..

पछिम के हवा चलल अईसन बदलल नजारा सगरे,
ना त शब्द " राउर " पुरबियन के खुन मे बसत रहे ...

का भईल भईया????

ऐतना समाजीक शेर काहे खातिर....?

मातृभाषा मे कुछ अपना माटी खाति लिख के त देखी,
माई के हाथ के रोटी मन ना परल त हमार नाव बदल देब ...

मातृभूमि, मातृसभ्यता, मातृसंस्कृति अउर मातृभाषा,
ईहे  चारू  मिल के  देले  सन इंसान  के साँच परीभाषा।

अंहार के सवख जब देखनी अपना आरी कगरी, 
अंजोर करे खाति आपने घर फुंके के परि गईल..

जब जब माई
हमरा के मन पारी के  
आपन आँख भिजावेले
तब तब
पूरब के हवा
नम बनिके
हमरा देहि के सिहरावेला
माई के याद दियावेला  

माडर्न ह टटका ह
इहे डिमांड बा
मनोरंजन के नाव प
मातृभासा बदनाम हो गईल
जवना माटी मे
भरल बा खजाना
उ अछईत , धईले धईले
जिआन हो गईल..

शहर के किसी
पांच सितारा होटल मे
धोती और फटा कुर्ता पहने
काँधे पर गमछी लिये
एक कवि ने अपनी कविता मे
भुखे किसान का नाम लेकर
उंची आवाज मे
जब उसका दुखडा सुनाया
सुट बुट पहने
इतर गुलाब से सजी
उस भरी महफिल मे
जोरदार तालियो के बीच
हर शख्स की लबो पर
सिर्फ " वाह वाह " नजर आया
सिर्फ " वाह वाह " नजर आया

  • उ कहsता , चीर देबि फार देबि, कुन्चि देबि मारि देबि,
    ई कहलsस जा बुआ खाना खा लs माई बोलावत बिया..

जबसे हर युवा ने खुद को "डान" कहलाने का शौख पाला,
हमे अजीब नही लगा किसी मोड पे होते अपराध देखकर...


तहरा बुझाउ चाहे जनि बुझाउ , हमार अतने काम बा,
आपनो मुहवा देखी आ लोगन के शीशा देखावत चली...

RSS

© 2012   Created by Admin.

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service