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प्रणाम आ जय भोजपुरी

 

बस त जईसन हेडिंग कहत बा ओहि हिसाब से लाग जाये के बा ।

 

 

नियम एके बा की जेकर कविता ह ओकर नाव लिख दी आ नईखे मालुम नाव त अज्ञात लिख दी ।

 

बाकी अपना पसन के कविता छापी एजुगा तनि औरि लोग त जानो की राउर का पसन बा ।

 

 

जय भोजपुरी

Tags: कविता, कापी, गजल, गीत, नज्म, पेस्ट

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Replies to This Discussion

तमीरे है खैरात है औ' तीरथ हज भी होते है, 
यो खुन के धब्बे दामन से ये पैसेवाले धोते है ... 

महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन

तन्हाई के हद के कवनो हिसाब काहे नईखे,

किस्मत के सवाल के कवनो जबाब काहे नईखे?

 

मोहब्बत भईल बाकीर दिल ना चोरावल गईल,

सिखावे जे इश्क अईसन किताब काहे नईख?

 

अपना के भुला देहनी उनका के याद क के,

तबो उनका हाथ मे एगो गूलाब काहे नईखे?

 

उनकर याद त अब दिल से ना निकलेला,

जे भूलवा देवे अईसन कवनो शराब काहे नईखे?

 

पहीले अपने सुधर जाई फेर सुधारी देसरा के,

सभका खातीर रवुआ अँखीयन मे ख्वाब काहे नईखे?

 

का साँचो बदल जाई दुनिया बदल के कानून,

बदलीत इंसान अइसन कवनो इंक्लाब काहे नईखे? 

ज़रा-सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये,
दिये से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है..

- मुनव्वर राना

परदेस ने हमे बरबाद कर दिया मगर, 
माँ सब से कह रही है कि बेटा मजे मे है...

मुनव्वर राना

बादलों के दरमियाँ कुछ ऐसी साजिश हुई, 
मेरा घर मिट्टी का था मेरे ही घर बारिश हुई ।

जिनके नसीब मे हो सफ़र उनसे पूछना,

घर आके लोग ज़मीं चूमते हैं क्यों !

 

     ..........

                       कतकी पूनो

छिटक रही है चाँदनी

 मदमाती उन्मादिनी

 

कुहरा झीना और महीन

 झर-2 पड़े आकाश नीम

 

 कॅलागी मौर सजावले

 कास हुए है बावले

 

पकी ज्वार से निकल शॅशो की जोड़ी गई फलांगति

आँधियरे मे वांक नदी की जागी चमक कर झाँकती

 

मन मे दुबकी है हुलास ज्यों परछाई हो चोर की

तेरी बाट अगोरते ये आँखें हुई चकोर की

                                                      अग्येय

 

(ई कविता के पढ़ला ढेर दिन भइल बा ए से कावनो ग़लती होखे त माफी चहेब)

12 बांस, 24 गज अंगुल अष्ट प्रमान !!
ता ऊपर सुलतान है मत चूको चौहान !!

                                                   - का जाने

chandarbardayi - prithviraj chouhan ke upar likhle bade 

      पुष्प की अभिलाषा

 

चाह नही मैं सुरबला के गहनों में गूँथा जाउ,

चाह नही प्रेमी माला में बिन्ध प्यारी को ललचाउँ.

चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरी डाला जाउं,

चाह नहीं देवो के सर पे चढ़ु भाग्य पे इठलाउँ.

मुझे तोड़ लेना वनमाली देना तुम उस पथ में फेंक,

मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक.

 

                 अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

मुकेश जी ई कविता के शिर्षक हवे "पुष्प की अभिलाषा" अउर ऐह कविता के रचनाकार के असली नाम माखनलाल चतुर्वेदी हवे। ध्यान से याद करी बिहार बोर्ड के सातवा कलास के हिन्दी के किताब मे शायद ई तिसरा पाठ हवे।

बाकीर माखनलाल चतुर्वेदी ही सही रचनाकार हवुअन ऐह कविता के। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' गलत बावे।

धन्याबाद संजीव भाई

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