Come, let's do something for Bhojpuri...
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 4, 2012 at 11:48pm तमीरे है खैरात है औ' तीरथ हज भी होते है,
यो खुन के धब्बे दामन से ये पैसेवाले धोते है ...
महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन
Permalink Reply by संजीव सिंह on January 5, 2012 at 12:24pm तन्हाई के हद के कवनो हिसाब काहे नईखे,
किस्मत के सवाल के कवनो जबाब काहे नईखे?
मोहब्बत भईल बाकीर दिल ना चोरावल गईल,
सिखावे जे इश्क अईसन किताब काहे नईख?
अपना के भुला देहनी उनका के याद क के,
तबो उनका हाथ मे एगो गूलाब काहे नईखे?
उनकर याद त अब दिल से ना निकलेला,
जे भूलवा देवे अईसन कवनो शराब काहे नईखे?
पहीले अपने सुधर जाई फेर सुधारी देसरा के,
सभका खातीर रवुआ अँखीयन मे ख्वाब काहे नईखे?
का साँचो बदल जाई दुनिया बदल के कानून,
बदलीत इंसान अइसन कवनो इंक्लाब काहे नईखे?
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 5, 2012 at 5:40pm
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 5, 2012 at 7:43pm परदेस ने हमे बरबाद कर दिया मगर,
माँ सब से कह रही है कि बेटा मजे मे है...
मुनव्वर राना
Permalink Reply by संजीव सिंह on January 8, 2012 at 10:47am बादलों के दरमियाँ कुछ ऐसी साजिश हुई,
मेरा घर मिट्टी का था मेरे ही घर बारिश हुई ।
Permalink Reply by मुकेश मिश्र (राजू बाबा) on January 12, 2012 at 11:00am जिनके नसीब मे हो सफ़र उनसे पूछना,
घर आके लोग ज़मीं चूमते हैं क्यों !
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Permalink Reply by मुकेश मिश्र (राजू बाबा) on January 13, 2012 at 10:51pm कतकी पूनो
छिटक रही है चाँदनी
मदमाती उन्मादिनी
कुहरा झीना और महीन
झर-2 पड़े आकाश नीम
कॅलागी मौर सजावले
कास हुए है बावले
पकी ज्वार से निकल शॅशो की जोड़ी गई फलांगति
आँधियरे मे वांक नदी की जागी चमक कर झाँकती
मन मे दुबकी है हुलास ज्यों परछाई हो चोर की
तेरी बाट अगोरते ये आँखें हुई चकोर की
अग्येय
(ई कविता के पढ़ला ढेर दिन भइल बा ए से कावनो ग़लती होखे त माफी चहेब)
Permalink Reply by संजीव सिंह on January 16, 2012 at 11:18pm 12 बांस, 24 गज अंगुल अष्ट प्रमान !!
ता ऊपर सुलतान है मत चूको चौहान !!
- का जाने
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on April 11, 2012 at 9:13am chandarbardayi - prithviraj chouhan ke upar likhle bade
Permalink Reply by मुकेश मिश्र (राजू बाबा) on January 21, 2012 at 3:27pm पुष्प की अभिलाषा
चाह नही मैं सुरबला के गहनों में गूँथा जाउ,
चाह नही प्रेमी माला में बिन्ध प्यारी को ललचाउँ.
चाह नहीं सम्राटों के शव पर हे हरी डाला जाउं,
चाह नहीं देवो के सर पे चढ़ु भाग्य पे इठलाउँ.
मुझे तोड़ लेना वनमाली देना तुम उस पथ में फेंक,
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक.
अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'
Permalink Reply by संजीव सिंह on January 21, 2012 at 3:35pm मुकेश जी ई कविता के शिर्षक हवे "पुष्प की अभिलाषा" अउर ऐह कविता के रचनाकार के असली नाम माखनलाल चतुर्वेदी हवे। ध्यान से याद करी बिहार बोर्ड के सातवा कलास के हिन्दी के किताब मे शायद ई तिसरा पाठ हवे।
बाकीर माखनलाल चतुर्वेदी ही सही रचनाकार हवुअन ऐह कविता के। अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' गलत बावे।
Permalink Reply by मुकेश मिश्र (राजू बाबा) on January 21, 2012 at 3:49pm धन्याबाद संजीव भाई
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