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प्रणाम आ जय भोजपुरी

 

बस त जईसन हेडिंग कहत बा ओहि हिसाब से लाग जाये के बा ।

 

 

नियम एके बा की जेकर कविता ह ओकर नाव लिख दी आ नईखे मालुम नाव त अज्ञात लिख दी ।

 

बाकी अपना पसन के कविता छापी एजुगा तनि औरि लोग त जानो की राउर का पसन बा ।

 

 

जय भोजपुरी

Tags: कविता, कापी, गजल, गीत, नज्म, पेस्ट

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शीर्षक - मातृभाषा

जैसे चींटियां लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई अड्डे की ओर
ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा ।



~ तहलका से (केदारनाथ सिंह की एक कविता)

अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा ।

इतना बढ़िया बात हम ना देखले रही आज ले ......................

बहुत धन्यवाद .......

भयानक सूखा है
पक्षी छोड़कर चले गए हैं
पेड़ों को
बिलों को छोड़कर चले गए हैं चींटे
चींटियाँ
देहरी और चौखट
पता नहीं कहाँ-किधर चले गए हैं
घरों को छोड़कर

भयानक सूखा है
मवेशी खड़े हैं
एक-दूसरे का मुँह ताकते हुए

कहते हैं पिता
ऐसा अकाल कभी नहीं देखा
ऐसा अकाल कि बस्ती में
दूब तक झुलस जाए
सुना नहीं कभी
दूब मगर मरती नहीं-
कहते हैं वे
और हो जाते हैं चुप

निकलता हूँ मैं
दूब की तलाश में
खोजता हूँ परती-पराठ
झाँकता हूँ कुँओं में
छान डालता हूँ गली-चौराहे
मिलती नहीं दूब
मुझे मिलते हैं मुँह बाए घड़े
बाल्टियाँ लोटे परात
झाँकता हूँ घड़ों में
लोगों की आँखों की कटोरियों में
झाँकता हूँ मैं
मिलती नहीं
मिलती नहीं दूब

अन्त में
सारी बस्ती छानकर
लौटता हूँ निराश
लाँघता हूँ कुँए के पास की
सूखी नाली
कि अचानक मुझे दिख जाती है
शीशे के बिखरे हुए टुकड़ों के बीच
एक हरी पत्ती
दूब है
हाँ-हाँ दूब है-
पहचानता हूँ मैं

लौटकर यह ख़बर
देता हूँ पिता को
अँधेरे में भी
दमक उठता है उनका चेहरा
'है- अभी बहुत कुछ है
अगर बची है दूब...'
बुदबुदाते हैं वे

फिर गहरे विचार में
खो जाते हैं पिता

 

~केदारनाथ सिंह

शाम बेच दी है
भाई, शाम बेच दी है
मैंने शाम बेच दी है!

वो मिट्टी के दिन, वो धरौंदों की शाम,
वो तन-मन में बिजली की कौंधों की शाम,
मदरसों की छुट्टी, वो छंदों की शाम,
वो घर भर में गोरस की गंधों की शाम
वो दिनभर का पढना, वो भूलों की शाम,
वो वन-वन के बांसों-बबूलों की शाम,
झिडकियां पिता की, वो डांटों की शाम,
वो बंसी, वो डोंगी, वो घाटों की शाम,
वो बांहों में नील आसमानों की शाम,
वो वक्ष तोड-तोड उठे गानों की शाम,
वो लुकना, वो छिपना, वो चोरी की शाम,
वो ढेरों दुआएं, वो लोरी की शाम,
वो बरगद पे बादल की पांतों की शाम
वो चौखट, वो चूल्हे से बातों की शाम,
वो पहलू में किस्सों की थापों की शाम,
वो सपनों के घोडे, वो टापों की शाम,

वो नए-नए सपनों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

वो सडकों की शाम, बयाबानों की शाम,
वो टूटे रहे जीवन के मानों की शाम,
वो गुम्बद की ओट हुई झेपों की शाम,
हाट-बाटों की शाम, थकी खेपों की शाम,
तपी सांसों की तेज रक्तवाहों की शाम,
वो दुराहों-तिराहों-चौराहों की शाम,
भूख प्यासों की शाम, रुंधे कंठों की शाम,
लाख झंझट की शाम, लाख टंटों की शाम,
याद आने की शाम, भूल जाने की शाम,
वो जा-जा कर लौट-लौट आने की शाम,
वो चेहरे पर उडते से भावों की शाम,
वो नस-नस में बढते तनावों की शाम,
वो कैफे के टेबल, वो प्यालों की शाम,
वो जेबों पर सिकुडन के तालों की शाम,
वो माथे पर सदियों के बोझों की शाम
वो भीडों में धडकन की खोजों की शाम,

वो तेज-तेज कदमों की शाम बेच दी है,
भाई, शाम बेच दी है, मैंने शाम बेच दी है।

 

~केदार नाथ सिंह

जन्म स्थान ग्राम चकिया, जिला बलिया, उत्तर प्रदेश, भारत
किसने बनाए

वर्णमाला के अक्षर

ये काले-काले अक्षर
भूरे-भूरे अक्षर
किसने बनाए

खड़िया ने
चिड़िया के पंख ने
दीमकों ने
ब्लैकबोर्ड ने

किसने
आख़िर किसने बनाए
वर्णमाला के अक्षर

'मैंने...मैंने'-
सारे हस्ताक्षरों को
अँगूठा दिखातेहुए
धीरे से बोला
एक अँगूठे का निशान

और एक सोख़्ते में
ग़ायब हो गया

~केदारनाथ सिंह
पहाड़ियों पर घिरी हुई इस छोटी-सी घाटी में
ये मुँहझौंसी चिमनियाँ बराबर
धुआँ उगलती जाती हैं।
भीतर जलते लाल धातु के साथ
कमकरों की दु:साध्य विषमताएँ भी
तप्त उबलती जाती हैं।
बंधी लीक पर रेलें लादें माल
चिहुँकती और रंभाती अफ़राये डाँगर-सी
ठिलती चलती जाती हैं।
उद्यम की कड़ी-कड़ी में बंधते जाते मुक्तिकाम
मानव की आशाएँ ही पल-पल
उस को छलती जाती हैं।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

डरो मत शोषक भैया : पी लो
मेरा रक्त ताज़ा है, मीठा है हृद्य है
पी लो शोषक भैया : डरो मत।

शायद तुम्हें पचे नहीं-- अपना मेदा तुम देखो, मेरा क्या दोष है।
मेरा रक्त मीठा तो है, पर पतला या हल्का भी हो
इसका ज़िम्मा तो मैं नहीं ले सकता, शोषक भैया?
जैसे कि सागर की लहर सुन्दर हो, यह तो ठीक,
पर यह आश्वासन तो नहीं दे सकती कि किनारे को लील नहीं लेगी

डरो मत शोषक भैय : मेरा रक्त ताज़ा है,
मेरी लहर भी ताज़ा और शक्तिशाली है।
ताज़ा, जैसी भट्ठी में ढलते गए इस्पात की धार,
शक्तिशाली, जैसे तिसूल : और पानीदार।
पी लो, शोषक भैया : डरो मत।

मुझ से क्या डरना?
वह मैं नहीं, वह तो तुम्हारा-मेरा सम्बन्ध है जो तुम्हारा काल है
शोषक भैया!

 

अज्ञेय

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती 
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती 
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो, 
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!' 

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी 
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी! 
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो, 
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

 

~जयशंकर प्रसाद

ऊँचा खड़ा हिमालय 
आकाश चूमता है, 
नीचे चरण तले झुक, 
नित सिंधु झूमता है। 

गंगा यमुन त्रिवेणी 
नदियाँ लहर रही हैं, 
जगमग छटा निराली 
पग पग छहर रही है। 

वह पुण्य भूमि मेरी, 
वह स्वर्ण भूमि मेरी। 
वह जन्मभूमि मेरी 
वह मातृभूमि मेरी। 

झरने अनेक झरते 
जिसकी पहाड़ियों में, 
चिड़ियाँ चहक रही हैं, 
हो मस्त झाड़ियों में। 

अमराइयाँ घनी हैं 
कोयल पुकारती है, 
बहती मलय पवन है, 
तन मन सँवारती है। 

वह धर्मभूमि मेरी, 
वह कर्मभूमि मेरी। 
वह जन्मभूमि मेरी 
वह मातृभूमि मेरी। 

जन्मे जहाँ थे रघुपति, 
जन्मी जहाँ थी सीता, 
श्रीकृष्ण ने सुनाई, 
वंशी पुनीत गीता। 

गौतम ने जन्म लेकर, 
जिसका सुयश बढ़ाया, 
जग को दया सिखाई, 
जग को दिया दिखाया। 

वह युद्ध–भूमि मेरी, 
वह बुद्ध–भूमि मेरी। 
वह मातृभूमि मेरी, 
वह जन्मभूमि मेरी।

 

सोहनलाल द्विवेदी

कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास 
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास 
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त 
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त ।


दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद 
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद 
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद 
कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद ।

 

~ जनकवि बाबा नागार्जुन

"दिल एक मंदिर" फिलिम के गाना

रुक जा रात ठहर जा रे चंदा, बीते न मिलन की बेला
आज चांदनी की नगरी में, अरमानों का मेला
रुक जा रात ...

पहले मिलन की यादें लेकर, आई है ये रात सुहानी
दोहराते हैं चांद सितारे, मेरी तुम्हारी प्रेम कहानी
रुक जा रात ...

कल का डरना काल की चिंता, दो तन है मन एक हमारे
जीवन सीमा के आगे भी, आऊंगी मैं संग तुम्हारे
रुक जा रात ...

रचनाकार: शैलेन्द्र

दूर-दूर तक फैली इस परती में
बेचैन आत्मा तुम्हारी
पोसुए हरिनों की तरह नहीं भटकती ?
 
कर्मठ चमड़ी से चिपटी तुम्हारी सफ़ेद इच्छाएँ
मुक्ति की राह खोजते
जल कर राख हो गईं
चंदन की लकड़ी और श्री ब्राँड घी में
और किसी सफ़ेदपोश काले आदमी के हाथों
पत्थरों की तह में गाड़ दी गईं
मंत्रों की गुँजार के साथ
...पाक रूह तुम्हारी काँपी नहीं??
 
अच्छा, एक बात तो बताओ पिता-
विदेशी कैमरों के फ्लैश से
चौंधिया गई तुम्हारी आँखें
क्या देख पा रही हैं
मेरे या मेरे जैसे
ढठियाए हुए करोड़ो चेहरे???
 
तुम्हारी पृथ्वी के नक्शे को नंगा कर
सजा दिया गया
तुम्हारी नंगी तस्वीरों के साथ
सजा दी गई
तुम्हे डगमग चलाने वाली कमर घड़ी
(तुम्हारी चुनौती)
 
रूक गई वह
और रूक गया सुबह का चार बजना??
 
और पिता
तुम्हारे सीने से निकले लोहे से नहीं
मुँह से निकले 'राम' से
बने लाखों हथियार
जिबह हुए कितने निर्दोष
 
क्या दुख नहीं हुआ तुम्हे?
 
शहर में हुए
हर हत्याकाण्ड के बाद
पूरे ग्लैमर के साथ गाया गया-
रघुपति राघव राजा राम
माथे पर तुम्हारे
चढ़ाया गया
लाल-सफेद फूलों का चूरन
 
बताओं तुम्हीं लाखों-करोड़ों के जायज पिता
आँख से रिसते आँसू
पोंछे किसी लायक पुत्र ने??
 
तुम्हारे चरखे की खादी
और तुम्हारे नाम की टोपी
पहन ली सैकड़ों -लाखों ने
 
कितने चले
तुम्हारे टायर छाप चप्पलों के पीछे...??

 

विमलेश त्रिपाठी  - हरनाथपुर, बक्सर, बिहार

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