दहेज़ मांगना गलत है. पर क्या दहेज़ देना प्रेम नहीं है? हम अपनी लरकी को क्यों नहीं उसके जीवन में काम आने
वाली चीज़े ना दें. क्यों नहीं हम ग्रैंड शादी को बस पारिवारिक शादी में समारोह में सम्मिलित करा दें. क्या अगर बंद नहीं बजेगा , पटाखे नहीं छुटेंगे ४०० लोग नहीं कहेंगे तो शादी नहीं होगी?
इस तरह की शादी तब के लिए ठीक थी जब marriage registration नहीं होता था. पर अब तो marriage registration होता है और निमंत्रण कार्ड तो हम किसी की भी शादी का छपवा सकते हिन्. बस हज़ार दो हज़ार का खर्च है. कोर्ट में एक बार किसी इव teasing के मुकदमें में लार्के ने उस लरकी से अपनी शादी का कार्ड दिखा दिया और मुकदमा ख़ारिज हो गया. कार्ड कंप्यूटर से चाप था. कार्ड के यही वैधता है. ४०० लोगों को बुलाने की जगह अगर दोनों तरफ के १०० लोग ही हों और लरकी को उसके future होम की चीज़े हों यह जयादा जरूरी है.ना कि बाराती dash एंड dine . ( खाए पिए घीसके ) उसके बाद
RSVP में लोगों को १ महीना पाहिले लोगों को बताना परेगा कि कितने लोग आ रहे हैं. और उसी हिसाब से खाना बनेगा . क्या फरक परता है अगर मेरी शादी में 400 लोग थे ya १०० या ५० या ७५ लोग hee थी. agar mere paas ghar men sab sukh subidha ke saamn hai par 400 log meree shadee naheen attend kiye hai.
वेस्टर्न समाज में लरका लरकी एक साथ रह कर अपने जीवन में काम आने वाली चीज़े खरीद लेते है. फिर पार्टी का पैसा जमा करते हैं उससे शादी करते है. ( जिसे मैं कहूंगी कि लरकी का exploitation है क्योंकी उसमें २-४ -६ साल रहने के बाद "
ईट इस ओवर" भी हो जाता है) . तब तक शादी कि क्या बात की जाये मंगनी भी नहीं हुई होती है.वेस्टर्न समाज में लरका लरकी की शादी होती है मम्मी पापा के बच्चों की नहीं. मम्मी पापा गेस्ट्स की तरह बस शादी attende करने आते है. गिफ्ट देते हैं.उन्हें कोई ख़ास खर्च नहीं करना परता है. और अगर उनके मन की शादी नहीं है तब तो बिलकुल ही नहीं खर्च करते हैं.
तो क्या हम लोग अपने रिवाज दोनों पक्ष के फायदे के हिसाब से simple marriage में नहीं बदल सकते है. और मैं कहूंगी कि arrange marriage एक बहुत ही दूर्दार्ध्र्शिता का प्रातः है इसे कायम रहने दें.