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ई कईसन लडाई गरीबन खातिर ? छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला, 73 जवान शहीद

गरीब आ विकास के नाव पे ई नरसन्हार , ई कईसन लडाई हवे गरीबन खातिर , का एह तरह के लडाई से गरीबन के स्थिति मे सुधार हो जाई ?

रायपुर।। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के गश्ती दल पर मंगलवार को हमला कर दिया, जिसमें 73 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या और ज्यादा हो सकती है। पिछले चार दिनों में सुरक्षाकर्मियों पर नक्सलियों का यह तीसरा हमला है। 

पुलिस के अनुसार दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार इलाके में नक्सलियों ने सीआरपीएफ के जवानों पर हमला बोला, जिसमें 73 से ज्यादा
सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए । इस घटना के बाद दंतेवाड़ा में जवानों ने व्यापक खोजबीन अभियान शुरू कर दिया है। बचाव कार्य भी जोरों पर हैं। नक्सलियों के इस हमले से गृह मंत्री पी. चिदंबरम हैरत में हैं। 

हमारे सहयोगी टीवी चैनल टाइम्स नाउ के अनुसार नक्सलियों ने उस समय सीआरपीएफ के जवानों पर हमला कर दिया, जब वे गश्त लगा रहे थे। घटनास्थल से घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए बस्तर जिला मुख्यालय से एक हेलिकॉप्टर भेजा गया है। बस्तर के डीआईजी टी.जे.लांगकुमेर ने कहा है कि यह सुनियोजित नक्सली हमला है। उन्होंने कहा कि नक्सलियों ने पहले सीआरपीएफ के बंकर को उड़ा दिया और फिर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। 

गौरतलब है कि 2 अप्रैल को माओवादियों ने उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में जवानों पर हमला किया था, जिसमें कई सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस घटना पर दुख जताया है। उन्होंने बताया कि मुठभेड़ की जगह पर खोजबीन करने वाले सुरक्षाबलों पर भी नक्सलियों की ओर से गोलीबारी की जा रही है। रमन सिंह ने कहा कि नक्सली समस्या का हल एक दिन में नहीं निकल सकता और प्रशासन को बेहद सावधान रहने की जरूरत है।


स्रोत - नभाटा

लाल झंडों के नीचे ये लोग कसम खाते हैं कि जब तक अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर लेंगे चैन से नहीं बैठेंगे. ये कार्यकर्ता अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते हैं और इनके दिमाग में इतना जहर भरा जाता है कि वे सही और गलत की पहचान करना ही भूल जाते हैं.

ये माओवादी गुरिल्ले हैं – जिन्हें अब आतंकवादी कहा जा सकता है. ये आतंकवादी विदेशी नहीं हैं, घर के ही हैं और घर में ही आग लगा रहे हैं.

(सरकार ने माओवादियों पर लाल आंख करते हुए उन्हे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया है. अब माओवादी भी लश्कर ऐ तैयबा, उल्फा और हिजबुल मुजाहिद्दीन की श्रेणी मे आ गए हैं.गौरतलब है कि बंगाल की वाममोर्चा सरकार शुरू से ही माओवादियों पर प्रतिबंध के खिलाफ रही थी और कहती आई थी कि प्रतिबंध लगाने से कुछ नही होगा. परंतु लालगढ में माओवादियों ने ही वाम सरकार के कई कार्यकर्ताओं को मार डाला और इलाके पर कब्जा कर लिया. अब माओवादियों को आतंकवादी संगठन घोषित करने पर भी विरोध शुरू हो गया है और जाहिर है वामदल इसमें सबसे आगे हैं.)

नक्सलवाद की शुरूआत:

नक्सली अभियान की शुरूआत पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग से हुई थी. 1967 में सीपीआई(एम) के कुछ कार्यकर्ताओं ने नक्सलबाड़ी के जमींदारों के खिलाफ बगावत कर दी थी. उस समय यह एक छोटा सा गुट हुआ करता था, लेकिन समय के साथ यह गुट पूरा वटवृक्ष बनता गया. 2004 इस आंदोलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण था. इस वर्ष सभी छोटे छोटे गुट आपस में मिल गए और भारतीय कम्प्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ.

maoist


क्या चाहते हैं माओवादी?

माओवादियों को वर्तमान शासन व्यवस्था पर विश्वास नहीं है और वे इसमें आमूल चूल परिवर्तन चाहते हैं. उन्हे लगता है कि वर्तमान शासन पद्धति शोषण करती है और गरीबों, महिलाओं तथा अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों को प्रोत्साहन देती है.

ये लोग अमेरिका और अमेरिकन नीतियों के घोर विरोधी हैं तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी संस्थाओं के भी खिलाफ हैं.

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो इनका उद्देश्य एक ऐसे वातावरण का सृजन करना है जहाँ कोई भेदभाव ना हो, जातिप्रथा ना हो और अमीर और गरीब ना हो. सब समान हो.

लेकिन रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ये सब बातें सुनने में अच्छी लग सकती है परंतु अब इस अभियान का उद्देश्य इससे कहीं आगे जा चुका है. नक्सलियों की पीठ के पीछे भारत विरोधी ताकतें लगी हैं और इनका मूल उद्देश्य सामाजिक समीकरण ठीक करना नहीं बल्कि भारत को अंदर से खोखला करना है.

कितना बडा यह अभियान?

इसका सही सही जवाब देना मुश्किल है लेकिन इस समय कोई 10 हजार हथियारबंद माओवादी लडाके देश में मौजूद हैं (कश्मीर में आतंकवादियों की संख्या इससे काफी कम है). देश मे कुछ 630 जिले हैं और उनमे से करीब 180 जिले नक्सल प्रभावित हैं. देश के जिन राज्यों मे नक्सलियों की अच्छी पैठ है वे हैं आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ, बिहार और महाराष्ट्र.

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कितने खतरनाक हैं माओवादी आतंकवादी?

काफी खतरनाक. शुरूआत में इनके पास लडने के लिए मात्र तीर कमान हुआ करते थे लेकिन आज उनके पास लगभग हर आधुनिक हथियार है. इन हथियारों में शामिल है एके47, कार्बाइन, सेल्फ लोडिंग गन, राकेट लांचर, बारूदी सुरंग आदि.

इस तथ्य पर गौर करिए – पिछले कुछ वर्षों में माओवादी आतंकवादियों ने जितने लोगों और सुरक्षाकर्मियों को मारा है उतने तो कश्मीर में भी नहीं मारे गए.

दिल्ली के समीप पकड़े गए एक आतंकवादी मदनी ने खुलासा किया था कि पाक स्थित आतंकवादी संगठनों का भारत के माओवादियों के साथ गहरे संबंध हैं. इससे स्पष्ट होता है कि दुश्मन देश इन लोगों का उपयोग कर भारत को खोखला करना चाहते हैं. माओवादियों के सक्रीय रहने से भारत को अपने रक्षा संसाधन देश के अंदर ही लगाने पडते हैं और इससे बाहरी आतंकवादियों को अपना अभियान चलाने में काफी आसानी हो जाती है.

भारत के लिए चिंता की स्थिति

नक्सलवाद भारत के लिए चिंताजनक है. एक तरह राज्य सरकारे तथा उनकी पुलिस नक्सलवादियों पर काबू पाने में विफल हो रही हैं और दूसरी तरफ माओवादियों के पाँव अब 180 जिलों से बाहर जा रहे हैं.

ऐसे में सरकार के लिए चिंता की बात यह है कि कहीं इनसे निपटने के लिए सेना का सहारा ना लेना पड जाए. भारतीय सेना भी गुप्त रूप से यह स्वीकार करती है कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों के काबू से बाहर जा रहे माओवादी आतंकवादियों को कुछलने के लिए उन्हें मैदान में आना पड सकता है.

यह मैदान देश के हृदय में स्थित है. उन्हे यदि लडाई लडनी पडी तो उनकी लडाई देश के नागरिकों के साथ ही होगी

स्रोत - तरकश

Tags: 73, ?, , कईसन, खातिर, गरीबन, छत्तीसगढ़, जवान, नक्सली, में, More…लडाई, शहीद, हमला

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सबसे बड़ा नक्सली हमला, 73 जवान शहीद

रायपुर [छत्तीसगढ़]। नक्सलियों के खिलाफ केंद्र सरकार के रणनीतिक कौशल पर नक्सली भारी पड़ रहे हैं। इधर, हमारे राजनेता एक-दूसरे को अपनी जिम्मेदारी समझने की नसीहतें दे रहे हैं और उधर, नक्सली हमले पर हमला करते जा रहे हैं। मंगलवार को अब तक का सबसे बड़ा हमला करते हुए सैकड़ों की संख्या में आए नक्सलियों ने सीआरपीएफ के 73 जवानों को मौत के घाट उतार डाला। पिछले चार दिन में हुई तीसरी नक्सली कार्रवाई के बाद गृह मंत्रालय ने कहा है कि यह घटना सुरक्षा की गंभीर चूक का नतीजा है।

छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा जिले के मुकराना के जंगलों में सुबह से ही नक्सलियों के खिलाफ 'आपरेशन ग्रीन हंट' की कार्रवाई की तैयारी चल रही थी। इसके तहत सीआरपीएफ और राज्य पुलिस के जवान एक सड़क पर से अवरोध हटाकर वापस लौट रहे थे। सुबह छह से सात बजे के बीच का समय रहा होगा। सुरक्षा बलों के ट्रक के आगे एक एंटी लैंडमाइन वाहन चल रहा था। सबसे पहले नक्सलियों ने इस वाहन को आईईडी [इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस] विस्फोट से उड़ा दिया। वाहन के ड्राइवर की तभी मौत हो गई। इसके बाद सुरक्षा बलों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गई। हालांकि सुरक्षा बलों ने भी जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। लेकिन नक्सली चूंकि पास की पहाड़ी पर जमे हुए थे, इसलिए सुरक्षा बल उनके छापामार युद्ध का आसानी से शिकार हो गए। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के हेलीकाप्टर को भी निशाना बनाया, लेकिन कामयाब नहीं हुए।
नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाले दंतेवाड़ा में हुए इस हमले के बाद सुरक्षाकर्मियों के 73 शव निकाले जा चुके हैं। हमले में घायल आठ जवानों को घटनास्थल से निकाल कर अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है।

घटना के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गृह मंत्री पी. चिदंबरम से फोन पर बातचीत की। चिदंबरम ने कहा कि यह घटना सुरक्षा बलों की किसी गंभीर चूक का परिणाम है। सीआरपीएफ के महानिदेशक विक्रम श्रीवास्तव दिल्ली से दंतेवाड़ा के लिए रवाना हो गए। इलाके में अतिरिक्त सुरक्षा बल भेज दिए गए हैं। छत्ताीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्व रंजन ने बताया कि घायलों और मृतकों को बाहर निकालने के लिए हेलीकाप्टर की सेवाएं ली जा रही हैं।

बहुत बड़ी चूक हुई: चिंदबरम

गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने नक्सलियों द्वारा किए गए मौत के तांडव के बारे में दुख प्रकट करते हुए कहा कि हमारे अभियान में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक हुई है।

उन्होंने कहा, 'हताहतों की संख्या बहुत ज्यादा है और लोगों के मारे जाने से मुझे गहरा सदमा पहुंचा है। इससे उनका हिंसक और नृशंस रवैया दिखाई देता है। यह उनकी क्रूरता हद को दिखाता है। हमारे वरिष्ठ अधिकारी जल्द ही वहां पहुंच रहे हैं।'

चिदंबरम ने कहा, 'छत्तीसगढ़ सरकार और सीआरपीएफ दोनों ने मिल कर इस अभियान की योजना बनाई थी। उन्होंने प्रदेश सरकार के जवानों और सीआरपीएफ दोनों को वहां भेजा था। लेकिन कहीं न कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ी हुई है। ऐसा लगता है कि हम नक्सलियों के जाल में फंस गए।'

-दंतेवाड़ा जिला

अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण छत्तीसगढ़ का दंतेवाडा जिला बहुत ही महत्वपूर्ण है। इस जिले की सीमाएं एक साथ तीन पड़ोसी राज्यों से मिलती हैं। दंतेवाड़ा पूर्व में उड़ीसा, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से जुड़ा है। दंतेवाड़ा का क्षेत्रफल 10,238.99 वर्ग किमी है। जिन इलाकों से इसकी सीमाएं जुड़ी हैं, सभी नक्सल प्रभावी है। इस आदिवासी बहुल जिले का भूभाग पहाड़ों, नदियों और जंगलों से ढंका है। साक्षरता के मामले में यह देश का सबसे पिछड़ा जिला है, जहां साक्षरता दर मात्र 30.17 है। साथ ही देश के सबसे कम साक्षर पुरुष [39.75 प्रतिशित] भी यहीं हैं।

-सलवा जुडूम यानी जनता का अभियान

गोंडी भाषा में सलवा जुडूम का अर्थ होता है शांति अभियान। नक्सलियों के खिलाफ सरकार द्वारा अभियान छेड़े जाने से पूर्व, छत्तीसगढ़ में आदिवासियों ने सलवा जुडूम शुरू किया था। इस जनआंदोलन की शुरुआत 2005 में आम लोगों के प्रयासों से हुई थी। जिन्होंने प्रशासनिक विफलता को देखते हुए, खुद नक्सलियों से लोहा लेना शुरू किया। बाद में इस आंदोलन को राजनीतिक दलों का समर्थन मिलने लगा। अंतत: कुछ साल पहले सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ आदिवासियों के इस अभियान को स्वीकृति दी और इसे अपना लिया। ताकि उन क्षेत्रों में लोकतांत्रिक शासन को बहाल किया जा सके, जहां नक्सलियों ने प्रभाव जमा लिया है। सलवा जुडूम की मदद के लिए सरकार ने आदिवासियों को स्पेशल पुलिस आफिसर [एसपीओ] के रूप में प्रशिक्षण देना शुरू किया।

स्रोत - जागरण
एहि बीच मे नक्सलियन के तरफ से 48 घण्टा के बन्द भी रहल जवना के असर एह चित्र मे मिल जाई !

एह घटना के जेतना निन्दा कइल जाव, कम बा. पिछला साल जुलाई में भोजपुरिया डॉट कॉम पर अनिल ओझा नीरद जी के एगो आलेख आइल रहे, जवना में उहाँ का नक्सलवाद के तालीबानी रुप के जिक्र कइले रहनी. ओह आलेख के हम आज एजिहा पोस्ट कइल चाहेब.


भारत में तालिबान बनत माओवाद !

लगभग आतंक के पर्याय बनि चुकल माओवाद, जवना तरह से धीरे-धीरे, सधल पांव, भारत के धरती पर आपन पांव पसार रहल बा, ओह से कबो अफगानिस्तान में एही तरे पसरत- पसरत सत्ता पर कब्जा जमा लेबे वाला तालिबानियन के याद ताजा हो रहल बा। क्रूर एह हद तक कि जवना के लिखे में कलम आ बोले में जबान तक घबरा जाता आजो. हलांकि हमरा ओकर वर्णन नइखे करे के एहिजा, फेर से, कारण ओह लोग के क्रूरता जग जाहिर बा, आ आजुवो ऊ लोग ओही तरी सक्रिय बा अफगानिस्तान से बेदखल भइला का बादो, जवना के नजारा हमनी का देखे के मिलि रहल बा, लगातार पाकिस्तान के स्वात घाटी में।

खैर, हम बात करे चलल बानी अपना देश में ठीक ओही राह पर चलत, बढत, पसरत माओवाद के। माओवाद जवना के जन्म नक्सलवाद से मानल जाला, आ जवना के बारे में ई कहल जाला कि एकर जन्म गरीबी, अन्याय, शोषण, असमानता आ सरकार के दू-मुहाँपन के चलते भइल अउर सबसे पहिले आदिवासी इलाका मे भइल, हलांकि अबहियों ई मुख्य रुप से आदिवासिये इलाका में सक्रिय बा, लेकिन धीरे-धीरे एकर वर्चस्व इतर गांवन के अलावा शहरन तक में होत लउके लागल बा, जहाँ ई शोषित आ उपेक्षित मजदूर वर्ग के सहारा लेके आपन पैठ निरंतर बनावे के कोशिस करत लउकि रहल बा।

शोषण के प्रति कवनो विरोध भा विद्रोह के हम कबो के विरोधी ना हईं, ना भइल चाहबि, कारण हमहूं एही सर्वहारा चाहें मजदूर वर्ग के एगो हिस्सा हईं, लेकिन एकरा बादो विद्रोह के एह स्वरुप के हम कबो समर्थन ना कइ पाइबि, जवन स्वरुप आज के दिन कहीं नक्सलवाद चाहें माओवाद के नाम पर एह दल के लोग अख्तियार कइ रहल बा। विरोध ना नरसंहार ह। राउर लडाई सरकारी तंत्र से बा त रउआ ओकरा से लडीं, लेकिन जवना मासुम आ शोषित जनता खातिर हथियार उठवले बानी, चाहें खुद अपना के जवना वर्ग के मानि रहल बानी, मौका पवला पर ओहू असहाय जनता के संहार करे से जब नइखी चूकत, त फेर रउआ सर्वहारा कवना लेहाज से भइनी? का त कभी- कभी आपन जान बचावे खातिर इहो करे के परेला, पुछ्ला पर राउर जबाब इहे रहल बा, त फेर फर्क का रहि गइल नरसंहारी शासक वर्ग में आ रउआ सभ में? आपन जान केकरा ना प्यारा होला साहब?

इहे सब देखि के हमरा लागि रहल बा कि एह देश में रउआ सभ के माध्यम से एगो नया तालिबान के जन्म हो रहल बा, ना त साहब गांव-घर से शुरु होखे वाला विरोध भा विद्रोह करे वाला के पास आजु अति आधुनिक अइसन अइसन हथियार भला कहाँ से आ गइल, जवन आजु ले पुलिस भा सेना तक के पास में नइखे। असलहा, बारुद, विस्फोटक ई कुल्हि का बिना पइसा के मिलि रहल बा रउआ सभ के? त फेर ई पइसा आवत कहाँ से बा? जाहिर बा एहिजे के डरल- सहमल पुंजीपति लोग से, हत्या आ अपहरण से, भा एकरा भय से खौफजदा लोगन के पास से। यानि ठीक ओही तरीका से जवना तरह से तालिबानी आ नेपाली माओवादी लोगन का मिलत रहे। लेकिन भारतीय माओवादी भाई साहब सभे, रउआ सभे शायद ई भुला जा रहल बानी कि अपना लाख प्रयास के बावजुद एही तालिबानी लोगन का अफगानिस्तान से आ नेपाली माओवादी लोगन के नेपाल के सत्ता तक पहुँचला के बादो ओकर सुख भोगल नसीब ना भइल। जाहिर बा, भारत में रउओ सभ के मनसा पूरा ना हो सके, अगर इहे रवइया रहल त।

साभार: भोजपुरिया डॉट कॉम
बहुत दुखद घटना बा, एइजा योजना में खामी आ खामी के खामियाजा साफ लउकत बा । भाई सुधीर जी के कहल एकदम सही बा, ई माओवाद , तालीबानी रुप धइले जात बा । ए घटना में नक्सलियन द्वारा चीनी हथियार के इस्तेमाल के सबूत मिलल बा जउन बेहद खतरनाक आ चिन्तनीय बा । केन्द्र आ राज्य के सफाई देहला के बजाय अब्बो से चेतल जरूरी बा ।
इससे पहले भी हुए हमले :

22 मई 2009 : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सली हमले में 16 पुलिसवालों की मौत।

26 सितंबर 2009 : छत्तीसगढ़ के जगदालपुर में नक्सलियों ने बीजेपी सांसद बलिराम कश्यप के बेटे को अगवा किया फिर उसकी हत्या कर दी।

30 सितंबर 2009 : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलियों ने कोर्ची और बेलगाम ग्राम पंचायत की इमारत उड़ाई।

8 अक्टूबर 2009 : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में ही नक्सली हमले में 17 पुलिसवाले मारे गए।

28 फरवरी 2010 : नक्सलियों ने दानापुर-हावड़ा रेल लाइन उड़ाई।

4 अप्रैल 2010 : उड़ीसा के कोरापुट ज़िले में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग उड़ाई जिसमें दस पुलिसवालों की मौत।
नक्सली को बढ़ावा देने मे किसी ना किसी रूप मे हमारे राजनीति कर्ता ही दोषी है | कही जाती के नाम पर तो कही धर्म के नाम पर | क्या है ये सब ......? आतंक यही से पैदा होता है और उसी का ख़ाम्याजा है दंतेवरा का नक्सली हमला | ये(नक्सली) बोलते है की हम ग़रीबो की भलाई के लिए लड़ रहे है ....मेरे समझ से ये बिल्कुल ही झूठ है...भला किसी की जान लेकर भलाई होती है | यह भलाई नही ग़रीबों के लिए बुराई हो रही है | इनका ये मकसद नही है | इस तरह से ये अपना दवदावा बनाना चाह रहे है | इसे अब कम नही आक्ना चाहिए |प्रशासन को अब सावधानीपूर्वक कोई ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है | तब तो इस समस्या का कुछ हाल निकल सकता है | नही तो आए दिन रोज ऐसी घटना सुनने को मिलते ही रहेंगे
naveen bhai pranam, e aesan lada e ho rahal biya ki dono pash ke jeet aur har dono me nuksan hoee,waise maral gaeel sab jawan ke prati apan shardhanjali ba aur dukh ke e samay me bhagwan unuka parivar wala log ke shakti aur e dukh se nikale khati atam bal praden kare.......


Jai Bhojpuri,
E t bahut hi nindanye ghatana ba bhai log, sahi me ekra uper sochla aur kcuhh kayila ke jarurat ba.
Lekin kya kare ye Nakksali logo ko bhi hamare kai Rajneta logo ka support milal ba.
Na t CRPF camp par hamla karal itna aasan naikhe bhai log.
तुम अभी जीते नही हो ,
हम अभी हारे नही है ...
तुम सोचते हो कि इतने से डर जायेंगे ,
तुम्हे अन्दाजा नही है , कि हम कैसे है ...
तुम्हारे लाल झण्डे को
तुम्हारे खुन से लाल कर के दिखायेंगे ..
और तुम्हे उसी मे लपेट कर दिखायेंगे ।

~ मित्र योगेन्द्र चौधरी
ई अईसन हादसा भईल कि हर हिन्दुस्तानी के दिल दहल गईल... नक्सल लोगन के नाक में नकेल डाले खातीर अब सरकार के तौयार हो जाए के चाहीं... बात बहुत हो गइल आब Action होखे के चाहीं..
एह तरह के Discussion शुरू कईला खातीर नवीन जी के संजीदगी आ देश प्रेम के हमार सलाम.......
नवीन जी प्रणाम !

बहुत -बहुत धन्यवाद कि रौवा एह संवेदनशील आ ज्वलंत मुद्दा के फोरम पर रखनी |

नक्सलवाद एगो विचारधारा के रूप में पनपल | चारु मजुमदार आ कानू सान्याल के नेतृत्व में इ विचारधारा एगो ख़ास वर्ग में आपन जड़ भी जमा लेहलस | इ वर्ग हर तरह से शोषित आ वंचित रहे | माओ के बहुचर्चित नारा - सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है , इ वर्ग के काफी प्रभावित कैलस | हाथ में हथियार उठा के अपना अस्तित्व खातिर शुरू संघर्ष शीघ्र हीं अपना राह से भटक गइल | भटकहीं के रहे काहें कि कवनो हिंसक आन्दोलन के परिणाम रचनात्मक नइखे हो सकत | आज चीन माओवाद के लबादा के उखाड़ के फेंक देले बा लेकिन भारत में रेड कारीडोर के एरिया बढ़ल जात बा | आश्चर्य के बात इ बा कि जब भी सरकार नक्सली सन पर सख्ती बरतेले त सामाजिक न्याय के तथाकथित पैरोकार लो के पेट में दर्द होखे लागेला , आ सरकार आपन कदम खिंच लेले |

इ घटना एक बार फेर से साबित कर देले बा कि नक्सली सन के भारतीय संविधान में कवनो आस्था नइखे | हिंसा ओकनी के प्रवृति हो गइल बा | ऐसन हिंसक पशु सन के साथे सभ्यता से पेश आइल हमनी के कमजोरी के प्रतिक बा | एगो पक्ष इहो बा कि सरकार के प्रयास से आम आदमी रोजगार पा रहल बा | सलवा जुडूम ऐसन संगठन के वजह से एकनी के आधार कमजोर हो रहल बा | इ तरह के घटना के अंजाम देके आपन ताकत ना बल्कि कमजोरी दिखा रहल बाडन स नक्सली |

भारत सरकार के एह परिस्थिति में उहे कदम उठावे के चाहीं जवन श्रीलंका सरकार लिट्टे के खिलाफ उठावलस | आपन सारा ताकत लगा के नक्सली सन के नेस्तनाबूद कर देबे के चाहीं | इ सबक ना सिर्फ देश के अन्दर के विघटनकारी तत्वन खातिर एगो सिख होई बल्कि देश के बाहर के दुश्मन सन खातिर भी जवन एह तत्वन के उकसा रहल बाडन स |

हो सकत बा हमार इ विचार कुछ लोगन के अतिपंथी लागो | लेकिन दुसर उपाय का बा ?

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