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भोजपुरी संस्कार गीतों में पर्यावरण चेतना
लेखक :- जितेन्द्र कुमार "देव"
बलिया ( उत्तर - प्रदेश )
पिन कोड :- २७७००१
भारतीय संस्कृति में प्राकृतिक अनुराग एवं प्रकृति संरक्षण की चिरंतर धारा प्रवाहित है | प्रकृति अनुराग हमारी पुरातन संस्कृति में इस कदर रचा - बसा हुवा है कि हम प्रकृति से अपने को पृथक अस्तित्व कि कल्पना ही नहीं कर सकते | इस तरह हम प्रकृति के हम अबिभाज्य अंग है | हम प्रकृति से एवं प्रकृति हम से अलग हो ही नही सकती |
यही कारण है की भारतीय मनीषियों सम्पूर्ण प्राकृतिक शक्तियों को देव - देवी स्वरुप माना है | देव पूजा , देवी पूजा बृक्षपूजा एवं पशु-पक्षियों कि पूजा भारतीय भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बन गया और हमारे जीवन में रच - बीएस गया | हमारे मनीषियों को यह भली-भाति मालूम था कि जड़-जगत अथार्त पृथ्वी , नदी , पर्वत और वन आदि का चेतन जगत से पारस्परिक उसका परिणाम चक्र पूरी पर्यावरण प्रणाली को प्रभावित करतीहै ,इस लिए उन्होंने सचराचर जगत के प्रति स्दास्यता, दया एवं प्रेम कि भावना पर बल दिया अर्थात " जियो और जीने दो " |
भारतीय मनीषियों द्वारा स्थापित पर्यावरण चेतना की यह धारा युग-युग से हमारे समाज में संचालित होती रही और हमारे जीवन का अंग बन गई | यही कारण है कि लोकगीतों, लोकोक्तियों एवं कहावतों में भी पर्यावरण चेतना की स्पष्ट झलक दिखाई देती है जो जन-जन के जीवन से जुदा हुवा है | प्रस्तुत लेख में भोजपुरी संस्कार गीतों में पर्यावरण चेतना पर ही बिशेष रूप बल प्रकाश डाला गया है |
उर्जा के अपरिमित स्रोत सूर्य को देवता माना गया है और यह यथार्थ भी है , कारण की सूर्य हमारा अर्थात इस ग्रह का जीवन दाता है | सूर्य के बिना वनस्पतियों का और परोक्ष रूप अन्य जीवो का अस्तित्व असम्भव है | संभवत इसी लिए भोजपुरी संस्कार गीतों में सूर्य पूजा ( सूर्यषष्ठी ) का
उदाहरण मिलता है | जैसे :-
केरवा जे मंगनी शहर से ,बालक दिहले जुठियाई |
रोवेले तिरिया झनक के, नैना ढरे हो बहु लोर |
हमरा सुरुजमल के अर्घिया ,बालक दिहले जुठियाई |
पुत्र प्राप्ति के लिए भी सूर्य पूजन का बिधान भोजपुरी लोक गीतों में मिलता है | जैसे :-
फाड़ बान्हि नेहू तिल चाउर, हथवा गेडउ पानी हो |
भउजी अंगना में आदित्य मनाव,होरिला होई हेंन हो |
...........................................................................
आदित्य म्नाव्ही ना पवली, सुरुज गोड़ लगेली हो |
भुइया गिरेले नन्दलाल , महल उठे सोहर हो .......|
बस्तुतः सूर्य हममे , सभी प्राणियो में , वनस्पतियों में जीवन का संचार करता है और आदि काल से ही सूर्य रश्मिया जीवन को संचालित करती आ रही है| ऐसे जीवन दाता के रूप किसी दैविक
शक्ति के प्रतीक रूप की कल्पना यदि की गई है तो यह सर्वथा समाचीन है | यही नही सूर्य के
अतिरिक्त अन्य देवी, देवतावो का भी वर्णन संस्कार गीतों में आया है |
यदि हम प्रकृति के सता को स्वीकार करते है और वह सत्ता अगर किसी एक शक्ति द्वारा संचालित होता है तो उस शक्ति का वर्णन भी संस्कार गीतों में 'देवी' रूप में मिलता है |
जैसे :-
निमिया के डाढ मइया लावेली हिंडोलवा की झूली-झूली ना ,
मइया मोरी गावेली गितिया की झूली-झूली ना ................२
..................................................................................
मल्होरिया अवासवा की चली भइली ना
इस गीत में शक्ति के प्रतीक शीतला माता निम् की डाल पर झुला झूल रही है और झूलते -झूलते उन्हें प्यास लगती है तो वह मलिन के घर जाती है | प्रश्न यह उठता है की देवी माँ मलिन
के घर ही क्यों जाती है अन्यत्र क्यों नही ? चुकी हम शभी जानते है की माली के घर पुष्प पौधों की अधिकता होती है , अनेको तरह के पुष्प के सुगंध से उसका आंगन भरा होता है | चुकी माता स्वयं एक प्रकृति का ही रूप है | इस लिए उन्हें प्रकृतिक सौन्दर्य उक्त जगह ही जाना अच्छा लगता है | इस लिए इस गीत में न केवल शक्ति की आराधना की बात है बल्कि
यह भी स्पष्ट हो जाता है की हमें पेड़ - पौधों को लगाकर उनका संरक्षर करना चाहिए | तभी देवी प्रसन्न होगी | वायु में भी दैवीय शक्ति की कल्पना की गयी है , कारण की वायु ही प्राण बन कर शरीर में वास करता है | वायु का वर्णन भी संस्कार गीतों में मिलता है |
जैसे :-
निमिया के छाह करुवैनी , शीतल बतास बहे ए |
ए बतासवा में माई जी बइठली, एही से पूरा उजियार हे ......|
भगवान शिव को प्रकृति का रक्षक माना जाता है | जितने भी बिषैले जीव -जन्तु है , सभी उनके गण है अर्थात भगवान शिव उनकी रक्षा करते है |और माँ गंगा को अपनी जटा में धारण करते है | भारतीय संस्कृति में जल को भी देवता माना गया है , ताकि जल स्रोतो को देवता मानकर हम उनकी रक्षा करे और जल को प्रदूषित न करे | नदियों को जीवन दायनी भी कहा गया है | हमारी पुरातन संस्कृति में नदियों , तलाबो और पोखरों में मल -मूत्र बिसर्जन की कल्पना भी नही की जा सकती है | बल्कि नदियों को माता मानकर उनकी पूजा की परम्परा कायम रही है , जिसकी झलक भोजपुरी संस्कार गीतों में मिलता है |
जैसे :-
गंगा त हइ हमार माई , हम उनकर बेतवा नदान |
हमार माई आपन लहर सिकोर , हम जेब ओही हो पार |
गंगा माई हमके पुतवा जे देइहन, शिर नवैब बार-बार |
बबुवा के .........................................भुत होई उपकार |
और भी बहुत से गीत माता गंगा पर लोकगीत में मिलते है | भोजपुरी संस्कार गीतों में कुवा खुदवाने का भी वर्णन मिलता है |
जैसे :-
अंगना में कुअवा खनावल पियर माटी हो |
अहो माई रे जगावहु सब देवता लोग ,
रउरा घरे ललना भाईले हो ...................|
पोखरों एवं तालाबो का भी वर्णन भोजपुरी संस्कार गीतों में हुआ है | और सरोवर को घर का बुनियाद माना गया
है | सरोवर को दमाद दहेज के रूप में मांगता है और सरोवर न मिलने पर रूठ जाता है | बेटी भी अपने पिता से
कहती है कि जब इतना धन - दौलत , गाय आदि आप दहेज में दिए तो एक सरोवर में क्या रखा है | यह बात बेटी
का पिता सुन कर कहता है कि बेटी सरोवर हमारी बुनियाद है | फिर बेटी के आग्रह पर पिता कुछ हिदायतों के साथ सरोवर को भी दे देता है | यहा पर इस प्रसंग का तात्पर्य यह है कि सरोवर के प्रति लोगो का कितना लगाव
है | सरोवर जल का एक स्थाई स्रोत होता है , इस लिए इसके प्रति सबकी चाह होती है -
एकली आगिन , एकली गाभिन , एकली दिहली किलोर जी |
अतना दहेज हम बेटी के देहली , सरवर लागी रुसले दमाद जी ||
सभा अलोते होई बेटी अरज करे बाबा से , सुन बाबा अरज हमार जी |
अतना दहेज बाबा बेटी के दिहल , सरवर कवन बुनियाद जी ||
सरवर - सरवर जनि कर बेटी , सरवर कवन मोर बुनियाद जी |
ओही सरवर बेटी चकवा - चकइया , गइया पियेले जुड़ पानी जी ||
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दह जनि लनघिय , पुरइन जनि धंगीयह , बिरइन जनि उठ्वास जी |
एकही घटवे नहइय ए बेटी , अररा सुखइय लागी केस जी ||
गीत को पढने पर पता चलता है की कैसी संरचना हमारी भोजपुरी संस्कार गीत में छिपी हुई है | भोजपुरी संस्कार गीतों में बृक्ष की
महता को भी स्वीकार किया गया है |
जैसे -
निमिया के दाढ़ मइया लावेली---------------|
भोजपुरी संस्कार गीतों में इस बात का भी चिंतन किया गया है की जब तक कोई फूल प्रत्य विकसित न हो तब तक उसे तोडना नही चाहिए |
जैसे -
बनवा में फुले ला ब्येलिया त मन रीति भावन रे |
मालिन जे हाथ पसरे ली की , कब फुलवा लोड्हब हे||
धीर धरु हे मालिन , धीर धरु हो , अभी त कोढ़ी फूल हे |
जब फूल होइहे कचनार त फूल तू लोध लिय हो |
समाप्त
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Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on March 5, 2010 at 9:41pm
Permalink Reply by Satyendra Upadhyay "भोजपुरम" on March 6, 2010 at 11:10am
Permalink Reply by sanjay kumar singh on March 13, 2010 at 7:24pm
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on November 26, 2011 at 9:44am सही कहनी संजय भाई एक दम सही बात
Permalink Reply by Rajnish Kumar Singh on March 13, 2010 at 8:14pm
Permalink Reply by Sudhir Kumar on March 16, 2010 at 7:36am
Permalink Reply by pankaj on April 7, 2010 at 10:37am
Permalink Reply by अनुपम पांडेय "कमल" on April 13, 2012 at 12:08pm जितेंद्र जी प्रणाम आ जै भोजपुरी
सबसे पहिले रौआ एह लेख खातिर धन्यवाद
ई लेख पढ़ के ओह लोगन के ज़रूर शरम आई आ ओह लोगान के आँख खुल जाई जे भोजपुरी मे गंदगी फैला रहल बा !
Permalink Reply by jitendra kumar thakur " dev " on April 14, 2012 at 8:39pm BHUT-BHUT
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