Come, let's do something for Bhojpuri...
Tags:
Permalink Reply by संतोष "सम्राट" on January 4, 2010 at 11:22am
Permalink Reply by mrs. saroj on January 18, 2010 at 12:35pm @तुलसी दास जी एक महान रचैता रामायण के रचाna कैनी ................हमू बहुत श्रधा भाव से पढ़नी सुन्दरकाण्ड और रामायण .................मगर जब ई दू लाइन पढेनी ता हमार मन विषाद से भर जाला "ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी "एकर चाए जे भी सफाई दे मगर ई तुलसीदास जी गलत लिखले बाडन ............उ अपान पत्नी के ताड़ना देले पर द्वेस होगइल उनका ???????शायद ओंकर स्वभिमान के ढेस लागल होई ........
खैर हम माफ़ी चाहब इ लिखे खातिर केहू के ठेस लागल होई ई तुलसीदास जी के आलोचना कैला पर .........
ई बात के जिक्र हा इसे कैनी हा काहेकी कोनो ग्रन्थ या महान पुस्तक के प्रभाव ओ समय के जनता पर बहुत पड़ेला
महिला लोग के स्थिति के पतन ओही समय से से सुरु हो गइल रहे ,,
@सरोज दी,
हम एह फोरम के सब जवाब पढ़ लेनी | सभे विचार आन्दोलनकारी बा आ सराहना के योग्य बा बाकि राउर एक बात हमरा ठीक ना बुझाईल, तुलसीदास के जवन चौपाई के भावार्थ के गलत मतलब निकल के उनका के गलत कहल |
"ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,सकल ताडना के अधिकारी " के रौआ भी उहे माने बतवनी जे लोग भ्रमवश बतावेला | तुलसीदास के अगर नारी जाति से इतने वैर रहित त सीता जी के भी ना छोड़तन |
रामचरित मानस अवधी भाषा में लिखल गईल बा | अगर शब्दन के हिंदी माने लगाइब त फेरा में पड़ जाईब | अवधी भाषा के अनुसार "ताड़ना" के शुद्ध मतलब ह "समझना" | आ संस्कृत के शब्द "ताड़" (हिंदी अर्थ- पिटाई) आ अवधी के "ताड़"(समझ) में बहुत अंतर बा | हम राउर सब बात ताड़ गईनी बस एहिजे अटक गईल बानी |
अब एह चौपाई के भावार्थ समझीं -
"ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी "
ढोल के अगर पीटे से संगीत बन जाई त आज सब कोई ढोलकिया बन जाई, काहे से कि ढोल पीटे सब कोई के आवेला | ढोल के हरेक थाप हरेक टंकार के समझे के पड़ेला | अंगूरी, अंगूठा, हथेली कवन कहाँ आ केतना जोर से लागी कि कवन स्वर पैदा होई | अब इ त बजावेवाला खातिर बा, अब साथे गावेवाला आ सुनेवाला के अगर इ बोल के उतार चढाव नइखन ताड़त (समझत) त इ संगीत उनका खातिर शोर हो सकेला |
गंवार-शुद्र : अब सामाजिक ढांचा अइसन रहे कि इनका लोग में विद्या के कमी रहे, सोच विचार के शक्ति तनी कम रहे | सामाजिक सरोकार से कोई खास मतलब ना... त एह लोग के खाली पिटाई करब त काम कैसे चली | इनका लोग के बात इनके भाषा में समझे के चाहीं | अंगूठा छाप के सामने डिक्सनरी के के महत्त्व मत बतायीं ओकर भदेश बोली आ ज्ञान के समझीं |
पशु- राउर मतलब से कवनो सीधा सुधा जानवर (गाय) के ताड़त (पिटत) रहीं | दु दिन बाद उहो सिंघ चलावे लागी | तनी पुचकार दिन त उहो राउर हाथ चाटते लागी | मारला पे पोसुआ कुकुर भी गुर्गुराले , आ तनी पुचकार दीं त पोंछ हिलावेले | जानवर के मन के भाव पढ़ीं ओकर हाव भाव के ताड़ी | पिटी जन... अबोलता धान ह, ओकर बोली के त समझहीं के परी |
नारी: पहिले के जमाना में नारी परदा के भीतर रहत रही | पुरुष प्रधान समाज में अब आपन मन के भाव उ कैसे बतावस |
नारी के मन के भाव पुरुष पढ़ेला | नारी हर बात समाज में ना कहे | घर परिवार आ पुरुष के ताड़े( समझे) के पड़ेला कि नारी के का जरुरत बा...
आशा बा, चौपाई के भाव समझ जाईब आ जब भी सुन्दर कांड पढ़ीं त एह दु लाइन पे तुलसीदास जी के धन्यवाद जरुर दीं | लिखेवाले लोग ढेरे लिखले बा, बाकि कबो कबो आपन समझ के भी आगे रख के सोचीं कि के गलत के सही |
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 18, 2010 at 3:18pm
Permalink Reply by Rajput Jitendra Kumar Singh on January 19, 2010 at 2:36am
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on January 26, 2010 at 10:36pm
Permalink Reply by NEHA SHARMA on January 29, 2010 at 5:02pm
Permalink Reply by नवीन भोजपुरिया ( NB ) on April 13, 2010 at 3:10pm © 2012 Created by Admin.