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Come, let's do something for Bhojpuri...

हमनी के समाज में कुछ बात/ नियम औरतन खातिर और राउर विचार।

हो सकेला ई सब चीज हर जगह होखे लेकिन हमनी के आपन समाज देखे के बाटे ओह के बारे में सोचे के बाटे एही से हम एह विषय के शुरुवात करत बानी , रउवा सब से हम ई उमेद करत बानी की रउवा सब भी कुछ बात विचार के जोड़ब और साथ साथ में ओह नियमन / बातन / विचारन पे आपन विचार और प्रतिक्रिया देब |

रउवा सब लोग जानत होखब की का का पाबंदी लईकिन पे जन्मे से रहेला कुछ हम लिख देत बानी बाकी रउवा सब लिखी आ देखल जाऊ की का का विचार अंत में मिल रहल बा |

शायद ओह विचारन से ओह सुझाव से ओह नियम से हमनी के आगे आवे वाला पीढ़ी कुछ बढ़िया निर्देश दे के जाईब जा |

ई कवनो बहुत सोचे वाला विषय नईखे बस हमनी के आम जिनगी में हो रहल चीजन के ऊपर लिखे के बाटे |

हम कुछ सवालन के संकेत के रूप में जाने खातिर लिख देत बानी आ हम ई उमेद करत बानी की अईसन बहुत सारा सवाल रउवा सब के मन में भी आवत होई भा आई |

लईकी के पैदा भईला पे कुछ सवाल


१- लोग काहे कहेला " फलनवा के फेरु से बेटी हो गईल " जबकि लईका होला ता कहेला की बड़ा ख़ुशी के बात बाटे " फलनवा के बेटा भईल बा "

२ - लईका भईला पे लोग काहे मिठाई बाटे ला जबकि लईकी भईला बताशा भी ना ( सामान्य बात बा कबो कबो केहू बाँट देत होई लेकिन अमूमन बहुत कम देखे के मिलेला )

लईकी के तनी बड भईला पे कुछ सवाल

१- काहे लोग कहेला की तोरा ( लईकी के ) पढला से का होई तोरा ता दुसरे के घरे जाए के बा ?

२ - लईकिन के दोसरा गाँव में पढ़े खातिर भेजे लायक नईखे

लईकी के तनी और बड होखला के बाद
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१- दोसरा के घरे ढेर देर तक ना रहल जाला

२- ई कुल ( कबड्डी , फूटबाल , क्रिकेट , गुल्ली डंडा जईसन खेल ) तहनी (लईकिन ) के खेल ना हा
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बियाह के बेर ( पाहिले और बाद में ) के कुछ बात

१- लईकी देखावे के बाटे ( लईका काहे ना )- एह में चाल ढाल रूप रेखा सब आ जाला

२- तोहार ( लईकी के भा पतोह के भा भौजी के भा दुल्हिन के ) माई बाप ई कुल ना सिखावले रहल हां लो का
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ता अईसन और भी बहुत सारा सवाल बाटे जवना के विषय में हमनी के वाद प्रतिवाद कईल जाऊ , और भी जवन बाचल बात बाड़ी सा ओकरा के लिखल जाऊ आ फेरु कुछ बढ़िया चीज के रूप में एगो बढ़िया परिणाम के रूप में अईसन सार ( भाव ) निकालल जाऊ जवना से सब के बढ़िया रहो और सबके हित के बात होखे और एगो बढ़िया भोजपुरिया समाज के गठन होखे | आज हमनी के 4000 से ऊपर बानी जा आ हमरा उमेद बाटे की हमनी के कुछ बढ़िया कई सकेनी जा |

रउवा सब के बातन के सुझावन के विचारन के इन्तेजार में !

जय भोजपुरी

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१. हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, १९५६
२. हिन्दू अल्पवयस्कता और संरक्षता अधिनियम, १९५६
३. हिन्दू दत्तक ग्रहण तथा भरण पोषण अधिनियम, १९५६
४. स्त्रियों का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, १९५६
५. हिन्दू विवाह अधिनियम, १९५५
६. शारदा एक्ट
७. हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, १८५६
८. विशेष विवाह अधिनियम, १९५४
९. दहेज़ निरोधक अधिनियम, 1961
स्त्रियों की स्तिथि से सम्बंधित उपुक्त वर्जित विभियन विधाओ और अधिनियमों के पारित होखला से उओंकर सामाजिक आर्थिक और पारिवारिक स्तिथि में महत्वपूर्ण परिवर्तन भएइल बा .. एकरा के हम कई भागो में बाटल जा सकेला .जवन ऊपर लिख देहले बनी .जय भोजपुरी ...इईए लव भोजपुरी
"ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी
शशि भाई ,
जवन तू तर्क देले बड़ा पाहिले ता हम ओकरा खातिर साधुवाद देव माने के पड़ी केतना सुन्दर इ पंक्ति के बखान कैला हा ..........तुलसीदास जी भी खचोलिया भर आशीर्वाद देत होइहे ..................मगर हम तोहार एक भी बात से सहमत नैखी ..कोनो बात के बचाव पक्ष राखल और वास्तविकता में बहुत अंतर होला और ई ता शायद तू औरत होता ता बहुत अच्छे से समझ पईता ..खैर
तुलसीदास के अगर नारी जाति से इतने वैर रहित त सीता जी के भी ना छोड़तन
सही कहला मगर सीता जी व्यक्ति विशेष रहली और और रामजी के पत्नी रहली जेकर उ परम भक्त रहलन यदि उ सामान्य नारी रहती तब उहो उहो न बचती ........

ढोल---</</u>b>भाई हम ता तोहे संगीत और संगीत से सम्बंधित वाद्द्य यंत्र के कुशल जानकार बुझत रहनी हा ....मगर यहा ता पाहिले ढोल,ढोलक,ढोलकी के परिभाषा बतावे के पड़ी
जवन तू अंगूरी के थाप के बात करतारा उ ढोलकी और ढोलक पर होला ..ढोल पर न
ढोल के गला में लटका के दुनु तरफ छड़ी नुमा लकड़ी से पीटल जाला ...ई लिंक पर ढोलक और ढोल के परिभाषा देख सकेला .http://encarta.msn.com/dictionary_561538492/dholak.हटमल

गंवार-शुद्र अब सामाजिक ढांचा अइसन रहे कि इनका लोग में विद्या के कमी रहे, सोच विचार के शक्ति तनी कम रहे | सामाजिक सरोकार से कोई खास मतलब ना... त एह लोग के खाली पिटाई करब त काम कैसे चली | इनका लोग के बात इनके भाषा में समझे के चाहीं | अंगूठा छाप के सामने डिक्सनरी के के महत्त्व मत बतायीं ओकर भदेश बोली आ ज्ञान के समझीं

भाई जी ,
तुलसीदास जी गावर और सुदर दू शब्द प्रयोग कईले बाडन और दुनु के अर्थ भी अलग अलग बा
gawar --माने अनपढ़ जेके कोनो तौर तरीका और ज्ञान न रहेला .....ऐसन लोग के खाली समझे(ताड़े से ) से काम कैसे चली भाई उ गवार के सभ्य बनावे खातिर कोनो कड़ा रुख अपनावे के पडला काहेसे की खाली प्यार से कोनो चीज समझ न आवे आपन बच्हन के भी कबो कबो सुधारे खातिर पिटे के पड़ेला ...खाली ताडले से काम न चले
शुद्र ..
कोई भी साहित्यकार कवि ,रचीता अपने समय के आईना होला माने ओ समय के परिवेश के बहुत बढ़िया से आपन रचना में दर्शावेला ..तुलसीदास जी भी उहे कईलन ओ समय सुद्रन के जवन हाल रहे केहू से छिपल नइखे ... यदि कोनो ब्राम्हण के मार्ग में भी कोनो सुदर दिख जात रहल ता उ मार्ग धोवल जात रहल और उ सुदर के मारत मारत अधमरा कर दिहल जात रहल .......
तब ऐसन परिवेश में सुदर के ताड़े वाली बात हमरे समझ से परे बा
नारी---अब जहा तक पुरुष के नारी के समझे(ताड़े) वाली बात बा.उ ता तुलसीदास जी अपने पत्नी के न समझ पावलं उ दोसरा के का सलाह दिहन .....जब पुरुष के अंह के नारी द्वारा ठोकर लागेला ता उ तिलमिला जाला...और नारी पुरुष से ज्यदा ज्ञानी हो जाय ई कैसे भला पुरुष के बर्दास्त होई और एहे कारन बा की नारी के दबावे खातिर ताड़ना वाली बात आइल होई .....
आपन पत्नी द्वारा दुद्कराला के बाद शायद तुलसीदास जी के मन में ई ख्याल आइल होई ........

जय भोजपुरी


Shashi Ranjan Mishra said:
@तुलसी दास जी एक महान रचैता रामायण के रचाna कैनी ................हमू बहुत श्रधा भाव से पढ़नी सुन्दरकाण्ड और रामायण .................मगर जब ई दू लाइन पढेनी ता हमार मन विषाद से भर जाला "ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी "एकर चाए जे भी सफाई दे मगर ई तुलसीदास जी गलत लिखले बाडन ............उ अपान पत्नी के ताड़ना देले पर द्वेस होगइल उनका ???????शायद ओंकर स्वभिमान के ढेस लागल होई ........
खैर हम माफ़ी चाहब इ लिखे खातिर केहू के ठेस लागल होई ई तुलसीदास जी के आलोचना कैला पर .........
ई बात के जिक्र हा इसे कैनी हा काहेकी कोनो ग्रन्थ या महान पुस्तक के प्रभाव ओ समय के जनता पर बहुत पड़ेला
महिला लोग के स्थिति के पतन ओही समय से से सुरु हो गइल रहे ,,



@सरोज दी,
हम एह फोरम के सब जवाब पढ़ लेनी | सभे विचार आन्दोलनकारी बा आ सराहना के योग्य बा बाकि राउर एक बात हमरा ठीक ना बुझाईल, तुलसीदास के जवन चौपाई के भावार्थ के गलत मतलब निकल के उनका के गलत कहल |
"ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,सकल ताडना के अधिकारी " के रौआ भी उहे माने बतवनी जे लोग भ्रमवश बतावेला | तुलसीदास के अगर नारी जाति से इतने वैर रहित त सीता जी के भी ना छोड़तन |
रामचरित मानस अवधी भाषा में लिखल गईल बा | अगर शब्दन के हिंदी माने लगाइब त फेरा में पड़ जाईब | अवधी भाषा के अनुसार "ताड़ना" के शुद्ध मतलब ह "समझना" | आ संस्कृत के शब्द "ताड़" (हिंदी अर्थ- पिटाई) आ अवधी के "ताड़"(समझ) में बहुत अंतर बा | हम राउर सब बात ताड़ गईनी बस एहिजे अटक गईल बानी |
अब एह चौपाई के भावार्थ समझीं -
"ढोल गंवार शुद्र ,पशु,नारी ,ये सब ताडन के अधिकारी "
ढोल के अगर पीटे से संगीत बन जाई त आज सब कोई ढोलकिया बन जाई, काहे से कि ढोल पीटे सब कोई के आवेला | ढोल के हरेक थाप हरेक टंकार के समझे के पड़ेला | अंगूरी, अंगूठा, हथेली कवन कहाँ आ केतना जोर से लागी कि कवन स्वर पैदा होई | अब इ त बजावेवाला खातिर बा, अब साथे गावेवाला आ सुनेवाला के अगर इ बोल के उतार चढाव नइखन ताड़त (समझत) त इ संगीत उनका खातिर शोर हो सकेला |
गंवार-शुद्र : अब सामाजिक ढांचा अइसन रहे कि इनका लोग में विद्या के कमी रहे, सोच विचार के शक्ति तनी कम रहे | सामाजिक सरोकार से कोई खास मतलब ना... त एह लोग के खाली पिटाई करब त काम कैसे चली | इनका लोग के बात इनके भाषा में समझे के चाहीं | अंगूठा छाप के सामने डिक्सनरी के के महत्त्व मत बतायीं ओकर भदेश बोली आ ज्ञान के समझीं |
पशु- राउर मतलब से कवनो सीधा सुधा जानवर (गाय) के ताड़त (पिटत) रहीं | दु दिन बाद उहो सिंघ चलावे लागी | तनी पुचकार दिन त उहो राउर हाथ चाटते लागी | मारला पे पोसुआ कुकुर भी गुर्गुराले , आ तनी पुचकार दीं त पोंछ हिलावेले | जानवर के मन के भाव पढ़ीं ओकर हाव भाव के ताड़ी | पिटी जन... अबोलता धान ह, ओकर बोली के त समझहीं के परी |
नारी: पहिले के जमाना में नारी परदा के भीतर रहत रही | पुरुष प्रधान समाज में अब आपन मन के भाव उ कैसे बतावस |
नारी के मन के भाव पुरुष पढ़ेला | नारी हर बात समाज में ना कहे | घर परिवार आ पुरुष के ताड़े( समझे) के पड़ेला कि नारी के का जरुरत बा...

आशा बा, चौपाई के भाव समझ जाईब आ जब भी सुन्दर कांड पढ़ीं त एह दु लाइन पे तुलसीदास जी के धन्यवाद जरुर दीं | लिखेवाले लोग ढेरे लिखले बा, बाकि कबो कबो आपन समझ के भी आगे रख के सोचीं कि के गलत के सही |
बदलाव के बेयार बह रहल बा , लोगन के अब धीरे धीरे बुझाये लागल बा की जब तक बेटी हर तरह से मजबुत ना होईहन स तब तक घर के भला ना हो सकेला , घर चाहे मायका मे हो भा ससुराल मे , अउर एकर नतीजा ई बा कि लोग अब अपना लईकिन के हर तरह से सहयोग कई रहल बा पढावे खातिर -


एक नजर एह समाचार पे ->


सुहाग की निशानी पर भारी बेटियों की पढ़ाई

यह मेरा मंगलसूत्र है, सुहाग की निशानी। इसे गिरवी रख लीजिए। बस चार हजार रुपये की आवश्यकता आ पड़ी है। कल ही बेटी की परीक्षा की फीस भरनी है। दुकानदार को आश्चर्य हुआ। बोला 'बेटी की पढ़ाई के लिए मंगलसूत्र गिरवी?

प्रखंड के चैता से आई कुसुम देवी की बात सुन वह अवाक रह गया। संझौली बाजार का यह वाक्या भले ही साधारण समझा जाए, पर महिला की बातों में दम दिखा। आंकड़ों की पड़ताल में इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बातें सामने आई। बेटों की तरह मां-बांप लाडलियों की पढ़ाई में भी कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं।


जेवरात, जमीन यहां तक कि घर बेचने में भी उन्हें हिचक नहीं। क्षेत्र के संझौली, उदयपुर, सिअरुआ, सुसाड़ी, अमैठी, मसोना, तिलई, बेनसागर, सियांवक, बुकनाव, बाजितपुर जैसे गांवों में शिक्षा के क्षेत्र में मूक क्रांति आ रही है। कई किसानों ने अपने खेत तक बेच डाले। कई ने गिरवी भी रखे हैं।

महिलाएं जेवरात बेचकर लाडली की पढ़ाई पूरी करने में लगी हैं। खेतलपुर की संगीता देवी, शोभा देवी, बहोरी की चंद्रकांती देवी बताती हैं कि बेटी की ट्यूशन फीस भरनी थी। गांव में किसी के पास पैसे नहीं मिले। इसपर जेवरात [मंगलसूत्र] को बेच दिया। इसमें हैरत की बात ही क्या है। मानती हूं, मंगलसूत्र सुहाग की निशानी है। तो क्या बेटियां सुहाग की निशानी नहीं?

कालेजों व विद्यालयों में छात्राओं की बढ़ती संख्या इसकी गवाह हैं। उजागिर चौधरी मेमोरियल कालेज के प्राचार्य डा. हरेन्द्र सिंह बताते हैं कि विगत दो-तीन वर्षो से अभिभावकों में बेटियों को पढ़ाने को ले जागरुकता आई है। पूर्व में मात्र 40-45 लड़कियां ही कालेजों में दिखती थीं। आज उनके सिर्फ उनके कालेज में 1500 से अधिक छात्राएं हैं। उच्च विद्यालय गंगाजल में भी लड़कों से अधिक 260 लड़कियां पढ़ती हैं।

केके विद्यालय में 103 तथा उच्च विद्यालय छुलकार में 200 छात्राएं हैं। मात्र एक शिक्षक के सहारे चलने वाले प्रोजेक्ट बालिका विद्यालय में भी 84 छात्राएं हैं। प्रखंड के मध्य विद्यालयों में 2053 तथा प्राथमिक विद्यालयों में 4600 लड़कियां पढ़ रही हैं।

एक अनुमान के मुताबिक 3000 लड़कियां बिक्रमगंज, नोखा व सासाराम के कालेजों में भी जाती है। प्राचार्य वृज बिहारी सिंह, ओमप्रकाश तिवारी की मानें तो लड़कियां विद्यालयों में नियमित रूप से आती हैं। क्लासों में फ‌र्स्ट, सेकेंड व थर्ड की श्रेणी में अधिकांश छात्राएं ही हैं। जाहिर है पढ़ाई में लड़कों को भी मात दे रही है।

वर्ष 2008-09 के मैट्रिक परीक्षाफल को देखें तो लड़कों के 72 फीसदी पर लड़कियां 76 फीसदी उत्तीर्णता हासिल कर भारी पड़ी थीं। इंटर कला में 78 व वाणिज्य में 76 फीसदी ने परचम लहराया था ।





स्रोत - जागरण
नवीन जी बहुते सही बात उठवले बाडा !सबसे पहिले त भोजपूरिया समाज पुरुष प्रधान समाज बा !जेतना भी नियम बनल बा ,उ मर्दन के पक्ष मे मर्दन के द्वारा बनवल गैईल बाडान स !दूसरा क्रम पर औरतन मे शिक्षा की कमी जबाब्दर बा,तीसरे दहेज प्रथा जबाब्दर बा !हमरा दू
गो बेटी बाड़ी स , जब कबे गावे जानी , बूढ पुरनिया आजी चाची लोग कपारे पर आशीष
क हाथरख के बाबू के एगोलॅयीका जो जाव आएसन आशीर्वाद ज़रूर मागे ली जा !नविनजी घी केलड्डू टेढ़ोभला आज भी भोजपूरिया समाज पर परंपरा ,रिवाज के नाम पर बदनुमा दाग बन के थोपा गैइल बा !शुक्रगुज़ार बानी ताहार की समाज की नाभिपर चोट काईले बाडा !
J J RAJPUT
बदलाव के बेयार मे भोजपुरिया क्षेत्र के औरतन के एगो नया मिशाल

खनकती चूडि़यों के बीच हरित क्रांति

संझौली (रोहतास)। पहले जारी होता था सासू जी का फरमान-बहू, घर से बाहर मत निकलना, खानदान की नाक कट जाएगी। पर, अब ऐसी बात नहीं। बदलते परिवेश के साथ जमाना काफी बदला है। सासूजी खेत की मेड़ पर बच्चों की देखभाल कर रही हैं और बहुरिया खेती का काम।

रोहतास जिले के संझौली प्रखंड के मथुरापुर गांव में महिलाएं पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गयीं हैं।

इनके हाथों की खुरपी, कुदाल, टोकरी ने हरित क्रांति को बल दिया है। झुंड की झुंड महिलाएं खेतों में काम करते नजर आती हैं। कभी घूंघट में रहने वाली बहुरिया आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गयी है। सब्जी की खेती कर औरों के लिए प्रेरणास्रोत बनीं 'गृहस्थी' का वास्तविक किरदार निभा कर घर की माली हालत को मजबूत कर रही हैं। खेतों में गूंजती चूड़ियों की खनक से राहगीरों की नजर अनायास ही उधर टिक जाती है। मेहनत से ये महिलाएं आलू, बैंगन, गोभी, टमाटर, मिर्च, सेम जैसी सब्जियों की खेती कर रही हैं।


मैट्रिक पास कुंती बताती है कि महंगाई में सिर्फ पति की कमाई से गृहस्थी की गाड़ी खींच पाना संभव नहीं है। पति-पत्‍‌नी न कमाएं तो जिंदगी से तंगहाली दूर नहीं हो सकती। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में भी खर्च है। सरस्वती देवी, मीना देवी, ऊषा देवी, मानती देवी, कौशल्या देवी, लीलावती समेत कई आज गृहस्थी की गाड़ी खींचने में पस्त पुरुषों का सहारा बन गई हैं। इनके हौसले को देख स्वयं सेवीसंस्था कस्तूरबा के सचिव डा. पारसनाथ इनके पथ प्रदर्शक बने। उन्हें इकट्ठा कर स्वयं सहायता समूहों का गठन किया। शुरू में आपस में थोड़ा पैसा इकट्ठा कर सब्जी की खेती शुरू की गयी। अंतत: उनकी मेहनत रंग लाई।


इन्हें एक ही बात खलती है कि अब तक उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। जबकि बैंकों में खाते भी खुल गये हैं। मुखिया सावित्री देवी इसे पूरी तरह महिलाओं की जीत मानती हैं। कहती है उन्हें अनुदान दिलाने की कार्यवाई की जा रही है। डीएम अनुपम कुमार कहते हैं कि अनुदान में आनाकानी करने वाले बैंक अफसरों पर कार्रवाई होगी।

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बदलाव केहु के रोकला माही के नईखे आ जब शुरु हो गईल बा त ई हो के रही , आ एकर मिशाल बा ई एगो नया शुरुवात। सलाम बा एह जज्बा के ।


जय भोजपुरी

स्रोत - जागरण
हम राउर सभे प्रश्न के एक ही प्रतिउत्तर में समाहित करे के प्रयास कर रहल बानी जेह से की राउर सभे प्रश्न के प्रतिउत्तर एक साथ ही मिल जाव.

कहे की एह पुरुषप्रधान समाज में आज भी नारी के ओही स्थिति बा जे कई हजार साल पाहिले रहल ह. विकास के गति के साथ नारी के प्रति वैचारिक प्रगति के कारण ही आज भी ई सवाल बनल बा हमनी के समाज में एक कलंक के रूप में जबकि आज लड़की भी लड़िकन के साथ हरेक क्षेत्र में कदम से कदम मिलाकर के चले के तैयार बिया आ चल भी रहल बिया. कवनो क्षेत्र ऐसन नईखे जहाँ लड़की आपण उपस्थिति ना दर्ज करवा देहल. चाहे ऊ खेत में काम करेवाली मजदूरनी होखो भा अन्तरिक्ष में जाकर के भारत के नाम ऊँचा करेवाली कल्पना चावला होखस. घर में अपना परिवार खातिर रोटी-भात बनावे वाली कवनो बुचिया भा मेहरारू होखस भा एह देश के राष्ट्रपति महोदय सम्माननीय प्रतिभा पाटिल जी. चाहे डिफेन्स होखो भा पुलिस में आपण नाम स्वर्णाक्षर में लिखे वाली किरण बेदी होखस. लईकी हरेक क्षेत्र में आपण सफल उपस्थिति के दर्ज करा देहले बिया. लेकिन आज भी लड़की के उपेक्षित नजर से देखल जा रहल बा काहे की रुढिवादिता आ "लोगवा का कही" के अनावश्यक भय आ अशिक्षा आ जागरूकता में कमी एह विषय पर लोग के सकारात्मक विचार रखे से रोक रहल बा. लईकी के जनसँख्या के अनुपात इतना गंभीर रूप से प्रभावित भईल बा की भविष्य में लोग ई ना कही की-- "फलनवा के फेरु बेटी भईल बिया." बल्कि लोग ई कही की--"फलनवा लड़का खातिर दयिब (भगवन) एकठो लड़की त भेजलन की ओह लादिक्वा के बियाह हो रहल बा. ना जाने हमार बबुआ खातिर भगवान् कवनो लड़की काहे नईखन भेजत ?"

साथ ही एक बात और कहल चाहब की लड़की के प्रति माई-बाप आ समाज के असुरक्षा के भाव, दहेज़ प्रथा के कुप्रभाव के कारण अनावश्यक आर्थिक दबाव, बुढ़ापा में सहयोग पावे के अनुचित-स्वार्थ ही लड़की के कल्याण आ विकास में बाधक हो रहल बा. एह समाज में जब लड़की कुछ गलत करे ले त समाज के ऊपर धब्बा लाग जाला जबकि लड़का कुछ अपराध करेला त ओकरा पर कोई ध्यान न देवे आ केतना लोग त सीना फुलाकर के हाट-बाजार में कहेलन तरकारी वाला आ पंसारी के-- "का रे ! हमरो ले पैसा मांगबे ? जानेलास फलनवा के फूफा हईं, ऊहे जे ३०२ के दफा में जेल काट के जमानत पर आईल बा. बोल त तोहरो दोकान दौरी उठवा दिही एह दुनिया ले." केतना शर्मनाक आ अपराध के बढ़ावा देवे वाला वक्तव्य बा आ समाज के कवन दिशा आ दशा के सुनिश्चित करे वाला बा ?

हाँ हम ई भी कहब एक लड़की होखे के नाते की एक मर्यादा जरुर बनाल रहो, चाहे ऊ लड़की होखो भा लड़िका काहे की मर्यादा टूटी त बदनामी समाज में होयिबे करी. एह से आज लड़की के भा लड़िका के अनुशासित रूप से, चारित्रिक रूप से आ सकारात्मक रूप से सुशोभित भईल जरुरी बा काहे की हम भी एक लड़की बानी आ हमार परिवार में भी बंधन बा लेकिन हम जानिला की ई बंधन ना ह हमरा खातिर बल्कि एक मर्यादा ह अपना माई-बाप के सम्मान आ समाज में सम्मानित राखे खातिर. बाकी त सभे केहू देख समझ रहल ही बा की का हो रहल बा आज के समाज में.

जहां तक अपने विआह शादी के समय रंग-रूप के बात कईनी ह, त अपने एक दिन देखब की जब स्त्री-पुरुष जनसँख्या अनुपात एही तरह से भाह्रात रही त कुरूप लड़की के भी लोग सहर्ष स्वीकार करी आ जब केहू कही की फलानिया के पतोह कुरूप बिया भा अपांग बिया त ओह पतोह के सास-ससुर (पतोह के परिवार) इत्यादि ही कहत मिलिहे दालान आ ड्योढ़ी अंगना में की--- "घीव के लड्डू टेढ़ो भला, हमार बबुआ के कुरूप भा अपंग मेहरारू मिलल, लेकिन जे कह रहल बा ऐसन ओकर बबुआ त बिन बियाहले बैठाल बारे. "

काहे के मतलब की आज नारी के आपण लडाई खुद लड़े पड़ रहल बा आ लगातार गर्भ में बालिका के हत्या हो रहल बा, लेकिन एक समय ऐसन आवे वाला बा एह जनसँख्या अनुपात के समस्या के कारण की लड़की के आपण लडाई लड़े के ना पड़ी बल्कि जे आज ओकर विरोध कर रहल बा ओकरा ऊपर दस ठो बंधन लगा रहल बा ऊहे लोग नारी के पक्ष के लडाई लड़ी काहे की जनसँख्या अनुपाद में गड़बड़ी के कारण भविष्य में ई समाज पुरुष प्रधान ना बल्कि "नारी प्रधान" हो जाई.
सासाराम [ब्रजेश कुमार]। 'माना, अंधेरी रात है पर दीया जलाना कब मना है।' हरिवंश राय बच्चन की इन पंक्तियों को साकार कर दिखाया है शहर की कुमारी अनुपम सिंह ने। विवाह के एक वर्ष बाद ही वैधव्य, पांच वर्ष तक अवसाद में जीवन गुजारने के बाद परिजनों की प्रेरणा से शिक्षा का दीप जलाया और बीपीएससी में पहले ही प्रयास में 15वां स्थान प्राप्त कर एसडीएम बन गईं।

अनुपम कहती हैं कि पहले मैं माता-पिता के सहारे थी। अब मैं लोगों की सेवा कर उनका सहारा बनूंगी। स्थानीय कंपनी सराय के दिनेश प्रसाद सिंह व विमला देवी की बड़ी बेटी अनुपम की शादी स्नातक करने के बाद 1998 में हुई थी। 1999 में पति के दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद वे विधवा हो गई। अपने एकमात्र पुत्र के साथ वापस मायकेरहने लगी।

पिता बताते हैं कि लगभग 5-6 वर्षो तक अवसाद की अवस्था में गुमशुम रहती थी। परिवर्तन का माहौल बनना तब शुरू हुआ जब इनकी छोटी बहनें पूर्णिमा व स्मिता ने मेडिकल कंपलीट किया। बड़ी बहन को पढ़ने के लिए प्रेरित करने लगी। सबकी प्रेरणा से 2005 में दिल्ली चली गई और वहीं सिविल सेवा की तैयारी करने लगी।

संस्कृत व दर्शन शास्त्र के साथ तैयारी में रंग दिखाना शुरू किया। बीपीएससी की 48-52वीं परीक्षा में सफलता प्राप्त करते हुए महिलाओं में दूसरा स्थान तथा मेधा सूची में 15वां स्थान प्राप्त किया है। अनुपम ने फोन पर बातचीत में अपनी सफलता को पति स्व. मुकेश कुमार व गुरुदेव गीता घाट बाबा को समर्पित करते हुए कहती है कि वे चाहती हैं कि उनकी सफलता विधवा औरतों के लिए प्रेरणास्रोत बने। वे समझें कि जीवन में सिर्फ अंधेरा ही नहीं, अपनी शक्ति को पहचाने, शिक्षित हो जीवन को संवारे।

पिता दिनेश सिंह कहते हैं कि हम लड़कियों को बोझ मानने की प्रवृति से मुक्त हो अवसर दें तो सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।


स्रोत - जागरण

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