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रिटेल कारोबार में विदेशी पूंजीनिवेश : एगो बड़का बवाल

संसद के शीतकालीन सत्र शुरू होखते ही संप्रग सरकार रिटेल कारोबार में विदेशी पूंजीनिवेश के मंजूरी देके एगो बड़का बवाल शुरू क देले बा . एकर आंच त इतना निठाह हो गईल बा की लोकसभा के कार्यवाही तक झुलसी  गईल बा.  अब त इतना रंगदारी बढ़ी गईल बा की  पहिले कानून बना दिहल जाता , ओकरा बाद में ओपर सरकार की मर्जी आ सुविधा के हिसाब से बवाल होला पर ओपर बहस करावल जाता. अब त विपक्ष के भी मुद्दा सरकार तय क देता. दरअसल सरकार मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार  आ कुल मिला के हर मोर्चा पर नाकाम होखला की बौखलाहट में  खुदरा ब्यापारी, किसान, बिपक्ष सबसे बिना विचार  कईले इ फैसला क देले बा.ए बात के अनदेखी क के की ए कदम से रोजगार ( जवन की उ उपलब्ध नईखे करा पावत) के मौका बढ़ी. ए बात के अनदेखी ना कईल जा सकेला की खुदरा बाजार के पूंजी के जरूरत बा , लेकिन का एकरा खातिर आम दूकानदार , किसान, आ उत्पादन तंत्र के भी बलि चढा दिहल जाऊ?

दूसर तर्क बा की ए कदम से लोगन के सस्ता दर पर सामान मिली.  जबकि वास्तविकता ऐसे कोसो दूर बा.

तिसरका तर्क बा  कि दस लाख से ज्यादा आबादी वाला शहरन में ही विदेशी कंपनियां के आपन स्टोर खोले के  अनुमति बा, एकरा चलते छोट शहर पर एकर असर ना होई. त का बड शहर में छोट छोट ब्यापारी नईखे?  सच्चाई इ बा की बड शहर  में विदेशी रिटेल स्टोर खुलते ही छोट शहरन के भी खुदरा व्यापारी जरूर प्रभावित होयिन्हे?

ए कदम से देश के ऊपर का असर पड़ सकेला :

१ . खुदरा ब्यापारी विदेशी कम्पनीं से प्रतियोगिता ना क पाई लोग. उन्हन लोग के अस्तित्व समाप्त हो जाई.

२ . एकर असर रोजगार पर पड़ी आ बेरोजगारी ( ब्यापारी वर्ग /अकुशल आदमी ) के बढ़ी जाई.

३ . खुदरा ब्यापार देश के रीढ़ ह, एहमे बहुत सारा लेन देन उधारी पर चलला के कारण एक तरह के सामाजिक समरसता बनल रहेला. एह्पर भी बाउर असर पड़ी.

४ .  विदेशी कम्पनीं आपन लाभ के प्रतिशत ( जवन बाद में खुदरा ब्यापारी लोग के नाथे के काम में खर्च होई) कायम रखे खातिर चीन से सस्ता माल मंगवा के बेचल शुरू कर दी, जेसे करोड़ो किसान, मजदूर आ ब्यापारी तबाह हो जयिन्हे.

५ .  ए बात केहू से छिपल नईखे की किसानन के आपन उत्पाद के जवन कीमत मिलेला उ उपभोक्ता तक पहुंचत पहुंचत कई गुना हो जाला. त बीचवा की दलालन के नाथे खातिर सरकार का करी?

 

इतना बड़का मुद्दा आप सब के सामने चर्चा खातिर राख तानी . हर विचार के स्वागत बा.

जय भोजपुरी

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चन्द्र प्रकाश जी प्रणाम,

फ़ायदा आ नुकसान से ज्यादा बड़हन सवाल बा एकर समय के ले के...कंही इ लोकपाल के धार कमजोड के प्रयास टी नईखे...दरअसल इ सरकार कुछ वकीलन, कुछ बयूरोक्रैट्स, आ कुछ राज परिवार के भरोसे चल रहल बिया..आ एह सरकार के जमीनी  वास्तेवीकता, जरूरत से कवनो वास्ता नईखे..इंहवा हर चीझ सीर्फ तर्क आ गुना भाग पर आधारीत बा..एह से एह सरकार से मनिव्या संवेदना के..आम आदमी के दर्द के महसूस करके अपेक्षा ही गलत बा...आम आदमी के पास सीर्फ ek ही रास्ता बा आम चुनाव मेंम आपण संतोष आ नाराजगी देक्ल्हावे के...लेकिन का हमनी के आपण अधिकार आ कर्त्तव्य के सही से निर्वहन करत बानी जा.......??????????


जय भोजपुरी

आशुतोष जी,

जय भोजपुरी,

राउर अंदेशा सोलह आना सच बा. दरअसल एह समय रिटेल कारोबार में विदेशी पूंजीनिवेश के मंजूरी देके सरकार मंहगाई, चिदंबरम पर टू जी घोटाला से सम्बंधित रोल से उपजल फजीहत , अन्ना के सरकार पर बढ़त दबाव , आरक्षण में आरक्षण , मदेरणा कांड आ कुल मिला के " पवित्र राजपरिवार " के काला  धन ( जवन जमा कईल गईल बा) से लोगन के ध्यान हटावे के सोचल समझल निति के तहत ए योजना के अंजाम दे रहल बा.

सबसे बड़ा दुर्भाग्य बा की भोजपुरि के इतना बरियार मंच पर एकर चर्चा नईखे होखत.

प्रनाम आ जय भोजपुरी 

हमरा आजु के बैश्विक जुग मे एफ डी आई बाउर नईखे बुझात ! आजु एगो आम आदमी ( हम आ रउवा त छोडिये दी जा ) सबेरे मुह धोवे से ले के राति खा सुते ले 70 प्रतिशत से बेसी समान बिदेशी भा बिदेशी कम्पनी के युज करेला ) 

चन्द्रप्रकाश जी 

1- भारत मे पहिलही अईसन कम्पनी चलत बाडी स बिग बाजार रिलायंस फ्रेश आ और 7-8 गो बाडी स त का असर परल ओह से ? आ ई 10 लाख से बेसी वाला शहर मे खुले वाला बा ! 

2- कईसे रोजगार प परी तनी खुलि के बताई 

3- खुदरा ब्यापार कवनो कीत प कबो खतम ना हो सकेला कतनो कुछ आ जाउ ,,, आ सामाजिक समरसता के नाव जवना के धरत बानी उ लुट खसोट ह जवन जमि के बिचौलिया लो करेला आ कतने ब्यपारी आ किसान के मुवे के परि जाला एहि उधार बाकी मे । गलत के नीमन के पैजामा पहिनावल सही ना कहाई 

4- चीन से पहिलही सस्ता माल आ अनघा आवत बा ! आ एह के मंगावे वाला अउरी केहु ना राउर खुदरा व्यपारी लो ही बा ! आ जायंट , कैरीफोर जईसन कम्पनी उच्च क्वालिटी के माल राखेली स ई हम देखले बानी । एह से राउर ई अन्देशा भी गलत बा ! 

5- एफ डी आई मे कम्पनी आ किसान के डाईरेक्ट कांटेक्ट बा । 

-- 

हम चाह्ब की बिन्दुवार रउवा एफ डी आई के फायदा भी लिखी तब तनी तुलना करे मे नीमन लागी ! 

जय भोजपुरी 

जय भोजपुरी औरि प्रणाम बाबा

लागतावे की बाबा रवूवा carrefour एजा खोलवाएब जरुरे

नविन भाई,

जय भोजपुरी,

रउवा सवाल के क्रमवार जबाब :

बिदेशी कम्पनी के सामान प्रयोग कईला के इ मतलब नईखे की बिदेशी कम्पनी के सामान बेचे के आ लूटे के खुलल छुट दे दिहल जाऊ. एहिजा बात विदेशी सामान के इस्तेमाल के नईखे होखत बल्कि ( विदेशी पूंजी निवेश , FDI ) ब्यापार के होता.

नविन भाई लागता रिलायंस फ्रेश, शापर्स स्टॉप, वेस्ट साइड, लाइफ स्टाइल, नामधारी, फूडवर्ल्ड, मोर, नीलगिरी(सब देशी कंपनी) आ वालमार्ट (अमेरिका), कैरीफोर (फ्रांस), टेस्को (ब्रिटेन) व मेट्रो (जर्मनी) की कार्यशैली आ मनसा में आपके के फरक नईखे लउकत. जबकि सब जानता की एह कंपनीन के मूल उद्देश्य मात्र कमाई कईल बा, देशी कपनी केतनो लोभी होई त अपना देश के प्रति ओकर लगाव जरूर रही. मुर्हाइल हँसुआ भी अपनिये ओर खींचेला.

और आपके जानकारी खातिर बतावल चाहब की भारतीय बाजारन में लउकत भारी मुनाफा के कमाए खातिर विदेशी कंपनीन में केतना बेचैनी बा की वालमार्ट सिर्फ भारत में लाबिंग करे खातिर लगभग 70 करोड़ रूपया आ नेता लोग/मिडिया के बिदेश में घुमे खातिर खर्चा उठा रहल बा. फिर दोनों के चिन्ता करे के का जरूरत बा ? एक ओर जापान, जर्मनी अउरी  दक्षिण कोरिया जईसन देश बा जहां खुदरा व्यापार ओहिजा के नागरिक खातिर सुरक्षित बा. दूसरी ओर न्यूयार्क शहर जहां लाख कोशिश कईला के बाद भी वालमार्ट के दाल ना गलल. वालमार्ट के कारनामा, सोच आ शैली जाने खातिर ए लिंक पर देखि. (http://pnnhindi-post.blogspot.com/).

जवन १० लाख आबादी वाला शहर के बात बा त बहुत जल्द “ रिटेल शार्क” अपना साम दाम के बल पर बाद मे इ सीमा किमी.के आधार पर करवा ली. जब ए कंपनी के पंहुचा धरा देब जा त गटई तक पहेंचे में देर ना लगाई.

खुदरा व्यापार में लागल विदेशी कम्पनिन के अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल कईला के कारण  कम श्रमिकन/कर्मचारियन के जरुरत होला. बड़का शापिंग माल में सामान पर रेडियो लेबल(आर.एफ.डी.आई) लगावला के कारण सामान के स्टाक के जानकारी आ कैश रजिस्टर के  काम कईल काफी आसान हो जाला. जेकरा चलते  काफी कम कर्मचारिन से भी अईसन  शॉपिंग केंद्र के देख-भाल सम्भव हो जाला.

अपना मुनाफा बढ़ावें खातिर सीधे उत्पद्कन से माल खरीदला के चलते कंपनि खुदरा बाजार में लागल बिचौलियन के पत्ता काटी देला जेसे बेरोजगारी के  कतार और अधिक लमहर हो जाला. हमनिके बिचौलिया ना केवल अर्थव्यवस्था के मजबूती देल सन(अगर राजनीती से दूर रह के काम होखे तब) बल्कि देश के सामाजिक ढांचा के भी ठीक राखे में सहायता करेला.

दरअसल भारत में  बेलगाम मंहगाई तब से बनल जबसे  बड़ कारोबारी घरानन के खुदरा कारोबार में प्रवेश (2005 से) भईल. ए कंपनिन के पास बड़-बड़ गोदाम होला जन्हवा  बहुत बड़ा पैमाने पर जमाखोरी कईल जाला. जवना से बाद में  कृत्रिम आभाव पैदा कके मुनाफाखोरी होला . आ एमे सरकार के हाथ होला. मुनाफाखोरी के पैसा पार्टी फंड में जाला जवना से विश्वासमत हासिल कईल जाला.नुक्लियर डील मुद्दा पर विश्वासमत हासिल करे खातिर का अमेरिकी सरकार / उद्योग जगत के पईसा ना लागल रहे ?

वाल मार्ट के 70 फीसदी उत्पादन चीन में होला. एकर मतलब इ बा कि वालमार्ट सामान दुनिया के चाहे कवनो भी कोना में बेचे,लेकिन ओकर 70 फीसदी उत्पादन चीन में ही होइ . सरकार अगर रिटेल में विदेशी मल्टीनेशनल कंपनिन के आवे के मंजूरी दे तिया त ऐसे रोजगार त नाही बढ़ी लेकिन लागत के मामले में भारतीय कंपनिन के प्रतिस्पर्धा जरूर करे के पड़ी.

अब इहाँ दिक्कत इ बा कि अगर लागत प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय कंपनिन के कवनो नुकसान होई त ऐसे रोजगार प्रभावित होई. जाहिर सी बात बा कि अगर कंपनिन के मुनाफा घटी त उ छंटनी करल शुरू करिह सन. जेसे  लोगन के  रोजगार छीनाइ .

सामाजिक समरसता के मतलब आपस में नगदी उधार लेन देन से ह, हम रोज ए बात से दो चार होनी. हमहू केहू से उधार लेके केहू के उधार बेचेनी. ए तरह के लेन देन में एगो आपसी भरोसा आ मरौवत के बहुत स्थान होला. जवन की कवनो  देशी विदेशी रिटेलर से सपना में भी ना सोचल जा सकेला. ओहिजा त आजकल आपके जवन सामान दिहल जाई ओ पन्नी के भी २ रूपया तक ले लिहल जाता. इहाँ खुदरा ब्यापार के खतम होखे के ना ओपर पड़े वाला संकट के बात होता.

एहिजा मतलब चीनी सामान से ढेर, देशी उत्पाद, रोजगार आ भारतीय उद्योग तंत्र के सामने आये वाला संकट से बा. नाकि चीनी उत्पाद आ गुणवत्ता से.

वालमार्ट आ अउरी कंपनी भारत में  मात्र व्यवसाय करे खातिर आ रहल बाड़ी सन,( success at any cost , किसी भी कीमत पर सफलता के उद्देश्य’ वाक्य के साथ.)  उन्हन के मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कामवाल बा, ना की कवनो सहकारी समिति की तरह किसानन के लाभ पहुंचावल. पिछले चार साल में रिटेल स्टोर की ओर से कृषि उपज के भंडारण आ ओसे जुडल बुनियादी सुबिधा खातिर कवनो खास पहल नईखे कईल गईल. केश एंड कैरी बैक एंड आपरेशन में सौ फीसदी एफडीआई के बावजूद भी कंपनीन के तरफ से बुनियादी सुबिधा के विकास में लमहर निवेश नईखे कईल गईल. इहे ना इ  कंपनी सब अनुबंध खेती के नाम पर किसानन के साथ संबंध स्थापित करे के कोशिश त कईली सन , लेकिन करार के अनुचित शर्तन के कारण इ  कोशिश भी विफल हो गईल. ए अनुभव के झेल चुकल किसानन के अनुबंध खेती से मोहभंग हो चुकल बा.

संसदीय समिति ए सुझाव देले बा कि सरकार एगो “राष्ट्रीय खुदरा माल नियामक” कानून ले आवे जेमे बाजार में प्रतिस्पर्धा के मार्ग विधिवत रूप से खुलल रहें अउरी कोई भी कंपनी बाजार पर आपन एकाधिकार जमा के मनमानी न कर सके. बिक्री के एकाधिकारी प्रविर्तिन से उत्पाद्कन के  आय घटेला,काहे की उन्हन लोग के पास आपन उत्पाद बेचे खातिर सीमित विकल्प रहेला. 1997 से 2002 के बीच कॉफ़ी बीन के फुटकर कीमत 27 फीसदी तक घटल.जबकि किसानन के चुकाए जाये वाला कीमत 80 फीसदी तक गिर गईल. दुनिया में 50 करोड़ कॉफ़ी उपभोक्ता बा लोग. लेकिन कॉफ़ी के व्यापार के 45 फीसदी चार गो बड एग्रीबिजनेस कंपनीन के हाथ में बा.

 

आजादी के बाद  से लेके अब तक कृषि जगत में बुनियादी तौर पर कई गो प्रमुख समस्या जईसे सड़क, भण्डारण, बिजली, सिचाई, उन्नत बीज, खाद, अउरी ओकर मार्केटिंग इत्यादि बनल रहल बा. जेमे सबसे  प्रमुख समस्या बा भण्डारण के . जेकरा खातिर सीधे तौर पर सरकार जिम्मेदार बा. लेकिन सरकार किसानन के भण्डारण के उचित सुविधा मुहैया करावे में असफल रहल बा. जेकरा चलते गोदामन में चाहे खुलल आसमान के नीचे अनाज सरी त जाता,पर  भुखमरी से मरत लोगन तक अनाज नईखे पहुँच पावत. भारत सरकार के बजट लाखों – करोड़ों में होला. समूचे देश में भण्डारण– व्यवस्था के दुरुस्त करे खातिर मात्र 7687 करोड़ रुपये की लागत आई. लेकिन सरकार एकरा के दुरुस्त करे के बजाय अउरी आपन कमी के छुपावे खातिर  विदेशी निवेशन के के दया पर कृषि (किसानन) के छोड़ी रहल बिया. इ अपने आप में आश्चर्यजनक बा.

इ देखे के चाही की अउरी देशन में इ विदेशि कंपनी का कईली सन, विश्व में जहां भी सबसे सस्ता माल मिली, इ उहे माल ले आके भारत में बेचींह सन. इन्हनिके मुख्य उद्देश्य सस्ता खरीद के 8-9 गुणा महंगा बेचल बा.

 एगो प्रमुख समस्या ह विद्युत् उत्पादन के. विद्युत् मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 – 2011 के दौरान सभी श्रोत से कुल विद्युत् उत्पादन 811 .143 बिलियन यूनिट भईल. मांग अधिक और सप्लाई कम होखला की वजह से नियमत: बिजली जात रहेला, जवन कोल्ड-चेन के परिचालन के बेहद मुश्किल बना देला. बड रिटेलर अपने स्वार्थ खातिर भण्डारण के व्यवस्था त सुधार सकेला लेकिन  सड़क अउरी बिजली के मुद्दा के नाही सुलझई ह सन. सरकार ए  प्रमुख नाकामियन में सुधार करें ना कि अपनी जिम्मेदारी से पीछे भागे आ अपना कमी के तोपे खातिर वालमार्ट जईसन  बहुराष्ट्रीय कंपनि के खुदरा क्षेत्र में प्रवेश देहला के नाम पर करोड़ों लोग के बेरोजगार कर सड़क पर ले आवे बाद में इहे बेरोजगार लोग लोग देश के विकास में अवरोध बनी के सरकार के सबसे बड़ सरदर्द बनी जाई.

सरकार विदेशी निवेश से महंगाई कम होखे के तर्क भी दे रहल बा कहे की इनका आ जयिला से  भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुमानित 400 करोड़ डॉलर के निवेश होई. जवन कि शुरुआती दौर में अवश्य ही भारतीय अर्थव्यवस्था की खातिर सही हो पर बाद में एहे कम्पनि एहिजा से आपन  फंड जनरेट कईल शुरू कर दिह सन. धीरे धीरे भारतीय पूंजी के प्रवाह केने मुडी जाई, सब जानता .

साथे साथ हमनिके इहो समझे के पड़ी की अभी भारत के हालत चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री कार्यकाल के तरह नईखे भईल कि विदेश से करजा लेके आपन अर्थव्यवस्था के बचावल जाऊ. भारत जईसन देश जहां के आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो , आर्थिक सुधार के अत्यंत आवश्यकता बा लेकिन आर्थिक सुधार भारतीयन के हित के ध्यान में रख के तय करे के चाही ना कि  विदेशियन के हित के ध्यान में रख के.

 

 

 

 

 

रउवा मय कहि देहनी बाकी असली चीझुईये नईखी कहत !

ओह कम्पनियन के कमाई के कतना पईसा भारत मे रहे वाला बा ? एह प तनी लाईट बारी ? उ पईसा कहा लागे वाला बा एह प तनी लाईट मारी ।

बिदेशी पुंजी निवेश , भारत मे रिटेल के छोड के लगभग हर जगहा बिदेशी पुंजी निवेश होत बा , चीन मे त बहुत पहिले से एह क्षेत्र मे पुंजी निवेश होत बा त ई कवनो अईसन बात नईखे जवना से चिहाये के परो ! ह लोगन के चिहावे खातिर एगो गलत चीझु देखावे के कोशिश होत बा ।

मनसा , ए महराज जे रोज रोज किसानन के लुटत बा ओकर मनसा रउवा सामाजिक समरसता के लागत बा आ एकनी के मंसा खालि एह से बाउर लागत बा काहे की एकनी के बिदेशी हवन स ? फेरु राउर नैनो के राउर लुलु के कईसे केहु चलावे दी अपना किहा ? का रउवा मालुम नईखे की गल्फ मे वालमार्ट कैरी फोर जायंट के होखला के बादो ओजुगा लुलु टाप प चलत बा । जी लु लु एगो भारत के ब्यपारी ह जवन गल्फ मे सगरे छपले बा आ दाम पीटत बा ! आ नैनो त एह घरी अमेरिका आ युरोप मे लोगन के मुहे चढ गईल बिआ त का कईल जाउ ओजुगा के लोग एकनी के बिरोध शुरु कई देउ ? आजु के समय वैश्विक बाजार के समय बा डराणी घींचे के चाही बाकी बाउर के एह से नीमन कही दिहल जाउ की उ राउर आपन ह त ई सही नईखे , बाउर के आपन रहन सुधारे के चाही आ सुधारे के मोका त कई साल से मिलल बा आ आगहु मिली ।

माल बाजार प आवत बानी , छोट छोट ब्यापारी आ खरीददार के देखी ।

का हमरा पाव भर चीनी लेबे के होई त हम माल मे जाईब ?

का हमरा पाव भर भा सई ग्राम चाह पती लेबे के होई त हम माल मे जाईब ?

का हमरा एगो कछी खरीदे के होई त हम माल मे जाईब ?

का हमरा 2 किलो चाउर लेबे के होई त हम माल मे जाईब ?

आ अईसन बहुत कुछ बा जवना खाति माल मे ना जाईल जाई ।

कम्पनी , एगो बात बताई की कवन अईसन कम्पनी बिआ जवन दुध से नहाईल धोवाईल बिआ ?

आ एगो समाचार रउवा खाति बा जवना प सब केहु गुंगी साधि के बईठल बा एको हाली संसद बन ना भईल एह खाति- 

चंडीगढ़/जयपुर। जिस आलू को किसानों ने कड़ी मेहनत से इस उम्मीद के साथ पैदा किया कि वो उन्हें बाजार में अच्छी कीमत दिलाएगा, वही आलू अब सड़कों और खेतों में फेंका जा रहा है। बाजार में बेशक आलू 5 से 10 रुपए प्रति किलो के भाव से बिक रहा हो लेकिन किसानों को आलू के दाम एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से भी नहीं मिल रहे। इस साल भी अच्छी पैदावार के बाद नए आलू के बाजार में आने से पुराने आलू को कोई नहीं पूछ रहा है। लिहाजा, किसान पुराना आलू सड़कों पर फेंकने को मजबूर हैं।

दरअसल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात और राजस्थान में आलू किसानों के लिए अभिशाप बन गया है। इसकी वजह ये है कि देशभर में आलू की इस बार भी अच्छी पैदावार हुई है। और देश में जितनी मांग है उससे कहीं ज्यादा बाजार में नए आलू की भरमार है। ऐसे में आलू की अच्छी फसल के जरिए किसानों के भारी लाभ कमाने की उम्मीदों पर पानी फिर गया है।

पंजाब में भी आलू और किसान दोनों का यही हाल है। बाज़ार में दोनों को पूछने वाला कोई नहीं है। किसानों को बाज़ार में आलू की कीमत एक रुपए प्रति किलो भी नहीं मिल रही है जबकि इसे उगाने में किसानों को कहीं ज्यादा लागत आती है। यही वजह है कि लुधियाना के समराला में कई टन आलू हाइवे पर यूं ही फेंक दिया गया। पंजाब में आलू की पैदावार करने वाले सभी जिलों का यही हाल है। होशियापुर के किसान तो अपने खेतों में लगी आलू की फसल को उखाड़ कर फेंक रहे हैं।

बाजार की बात करें तो होशियारपुर की मंडी में आलू की खुदरा कीमत लगभग 10 रुपए प्रति किलो है। जबकि थोड़ी ही दूर खेत से मंडी तक आने से पहले यही आलू थोक व्यापारी ने महज एक रुपए प्रति किलो के भाव से किसानों से खरीदा। इसके बाद थोक व्यापारी ने इस आलू को तीन से चार रुपये प्रति के हिसाब से खुदरा व्यापारी को बेच दिया। और खुदरा व्यापारी इसी आलू को पांच से दस गुना ज्यादा भाव यानी 10 रुपये प्रति किलो के हिसाब से हमें और आपको बेच रहे हैं।

लिंक -  http://khabar.ibnlive.in.com/news/63967/1

तनि काम बा हमरा एह से आफिस जात बानी , फेरु एह प लिखब !

आ जात एगो बात हम जरुर कहब की जहिया ले भारत के लोग अपना देस मे बनल सामान के प्रयोग कईल शुरु ना करी लो तहिया ले कुछ ना हो सकेला ।

आ सामाजिक समरसता यानि की क्रेडिट ओकरे मिलेला जेकरा लगे दाम रहेला जेकर भाव ताव रहेला एगो आम आदमी के एगो गरीब किसान के क्रेडिट आ भाव ताव ना मिलेला । हमहु ओहि जगहि के हई जहा के सामाजिक समरसता के बात रउवा कहत बानी

नवीन जी,

जय भोजपुरी,

राउर लिखल तथ्य से अवगत भयिनी. काफी जानकारी बा एमे. लेकिन अब हमरा इ नईखे बुझात की रौवा रिटेल कारोबार में विदेशी पूंजीनिवेश के पक्ष में बानी की ओकरा विपक्ष में ? जैसे आप के लिखल :( ओह कम्पनियन के कमाई के कतना पईसा भारत मे रहे वाला बा ? एह प तनी लाईट बारी ? उ पईसा कहा लागे वाला बा एह प तनी लाईट मारी ।

बिदेशी पुंजी निवेश , भारत मे रिटेल के छोड के लगभग हर जगहा बिदेशी पुंजी निवेश होत बा , चीन मे त बहुत पहिले से एह क्षेत्र मे पुंजी निवेश होत बा त ई कवनो अईसन बात नईखे जवना से चिहाये के परो ! ह लोगन के चिहावे खातिर एगो गलत चीझु देखावे के कोशिश होत बा )

एहिजा मुद्दा मात्र खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश आ ओसे उपजे वाला संकट से ( खासकर  " रिटेल शार्क" वालमार्ट ) पड़े वाला असर प् बा नाकि अन्य क्षेत्र में विदेशी निवेश के.

सबसे पहिले हम स्पष्ट क देबे चाह तानी की हम विदेशी निवेश के खिलाफ नईखी.

जब भारत खुला ब्यापार नीति के अपनाये वाला देश ह त एहिजा विदेशी निवेश होई, भारत भी विदेश में पूजी निवेश करी. इ त इ समझौता के शर्त होला.

दिक्कत तब शुरू होई जब भारतीय लचर ब्यवस्था, लालफीताशाही, कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति , व्यक्तिगत राजनैतिक हित, नपुंसकता की हद तक के नजरअंदाज करे वाला आदत की चलते विदेशी अर्थव्यवस्था के संजीवनी देवे खातिर " रिटेल शार्क" जईसन कंपनी भारत के संसाधन, श्रोत, धन, श्रम के दुहल शुरू क  के आपन घर भरल शुरू क दिह सन.

जवन कवनो भारतीय कंपनी विदेश में काम शुरू कईले बा त ओकरा प्रतिभा देखि के , ओ देश के कड़ा नियम के तहत, ओ देश के नफा नुक्सान के आकलन के आधार पर ही ओके  इजाजत मिलल बा. ना की दया आ खैरात के तौर पर. भारतीय कंपनी  सम्बंधित देश के नियम कनून के दायरे में रही के अपना मेहनत, नीति, कार्यशैली , श्रम के बल पर आपन सिक्का जमावत बाड़ी सन.

 ओकरा उल्टा विदेशी कंपनी भारतीय रीती नीति के सिमसिमाहपन के फायदा उठा के सिर्फ आपन उल्लू सीधा करिह सन. एकर ज्वलंत उदाहरण : भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदार कंपनी (Union Carbide Company, Houston , Texas ,USA), १९९२ में ८ रूपया प्रति यूनिट के दर से बिजली देबे  के फरमान सुनावे वाला एनरान कार्पोरेशन, टेक्सास, अमेरिका, पेप्सी( गुणवत्ता में दोहरापन)  आ और कई गो. दरअसल निवेश की आड़ में इ कम्पनीं के इरादा सिर्फ आ सिर्फ संसाधन के दोहन बा.

का विदेशी कंपनी के नजर में सब देश एक सामान होला ?

एहिजा बंगलौर में आई टी कम्पनी में एक ही सामान पद/योग्यता खातिर देशी कर्मचारी आ विदेशी कर्मचारी के पगार अलग अलग काहे दिहल जाला.?

काहे आर्थिक मंदी के नाम पर अमेरिकी आई टी कम्पनी से सिर्फ भारतीय इन्जिनयरन के हटावल जाला. ?

काहे  भारतीय काल सेंटर से अमेरिका के वाईट हॉउस के परेशानी होता ?

बात जब अपना जान प आई त केहू अपने बारे में ही सोची. इ गलत नईखे .

त अगर अपना देश के लोग अपना भविष्य के बारे में चिंतित बा त इ कहाँ से गलत हो गईल?

विदेशी कम्पनीन के भारत के बाजार के दोहन कके कमायिल पैसा के कालांतर  में कहा कहाँ उपयोग होला कहीं से पता करी.

बहरहाल चर्चा खातिर आपके आभार बा.

 

 

 

 

 

हम पछ मे बानी की बिपछ मे ई माने नईखे राखत माने ई राखत बा की का हम एह मुद्दा के नीमन से जानत बानी ? बिदेशी कम्पनी जवन रिटेल मार्केट मे निवेश करिहन स आ ओह से जवन ओह कम्पनियन के लाभ होई ओकर तीस टाका किसानन के हित मे लागे जात बा ( पचास भा तीस ) जवना मे कोल्ड स्टोरेज से ले के इंफ्रास्ट्रक्चर से ले के माटी के परीक्षण तकले होई । माने की एजुगा डायरेक्ट फायदा किसानन के बा ! आ ई दुसरका फायदा बा !

रउवा बिदेशी निवेस के बिरोध नईखी करत , रउवा आजु ले जवना जवना छेत्र मे बिदेशी निवेस भईल ओकर बिरोध ना कईनी लेकिन अबकी बिरोध करत बानी काहे करत बानी ई हमरा ना बुझाईल काहे कि " भारतीय लचर ब्यवस्था, लालफीताशाही, कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति , व्यक्तिगत राजनैतिक हित, नपुंसकता की हद तक के नजरअंदाज करे वाला आदत " ओहु घरी रहे , ह ई जरुर बा की ओह घरी ई कुल्हि बहरी निकल के ना आवत रहे बाकी अब बहरी निकल के आ जात बा आ लोग थुकतो बा खुलेआम ।

अब भारतीय लचर ब्यवस्था, लालफीताशाही, कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति , व्यक्तिगत राजनैतिक हित, नपुंसकता की हद तक के नजरअंदाज करे वाला आदत  के डरे मय चीझु के छोड छाड के मुह लटका के थोथा नियर मुह कई के बईठला से नीमन बा की आगे बढे के पडी आ आगे बढि के सोचे आ करे के परी ! जवन चीझु बा ओह के पहिले खतम कई के बाद मे अउरी कुछ कईल जाई त हम एगो बात बहुत साफ साफ कहल चाहब की बिश्व मे कवनो अईसन देश नईखे जहा भ्रष्टाचार ना होखे जह घुसखोरी ना होखे जहा राजनैतिक इच्क्षाशक्ति के कमी ना लउकत होखे भा जहवा व्य्कतिगत राजनैतिक हित ना देखल जात होखे भा जहवा के नेता नपुंसक ना होखस ! नाव ध के बता देब कवन देश बा जहवा ई कुल्हि नईखे ।

दया आ खैरात के बात कहा से आ गईल ? ई बिजनेस ह एह मे दया आ खैरात ना होला ना देखल जाला , बिदेसी कम्पनी भारत आवत बाडी स त ओकनी के आपन फायदा देखत बाडी स आ बिदेशी निवेश खाति मारकेट खुलत बा त एह मे भारत के फायदा देखल जात बा ! हमार पलानी के घर बा त एकरा माने हम बलब ना जराई काहे की कही तार शाट क जाई त आगि लागी जाई वाला हिसाब से बाचे खाति हम पहिले पाका के घर बनवाई वाला हिसाब हमरा बुझाईल ना !

रउवा नजर मे भारतीय कम्पनी हर जगहा सब कुछ नीमन के हिसाब से आपन सिक्का जमावत बाडी स तबो पुरा बिश्व मे आपन राज नईखी स कई पावत आ ई कुल्हि कम्पनिया कई लेत बाडी स काहे जी ? वालमार्ट जायंट कैरी फोर आज के डेट मे बिश्व के सबसे धनी आ बरिआर कम्पनी बाडी स एह छेत्र मे त आखिर कुछ होई तबे नु ? आ नीमन बाउर सबका संगे बा ! एह से पहिले ई तय कई ली कि रउवा काथि के बिरोध मे बानी ? आ का रउवा बिरोध करत बानी त अउरी देश भी बिरोध करो ? आ रउवा काहे खाली एहि के बिरोध करत बानी अउरी के काहे ना ? सबसे जादा त निवेश आई टी के छेत्र मे भईल बा त फेरु का कहनाम बा राउर ? आजु अमेरिका भसल त भारत के लगभग मय आई टी कम्पनी लो बाईँ बाईँ करे लागी लो एह बात के रउवा जानत बानी ( कम से कम हम त इहे देखत बानी की पचास परसेंट से बेसी लोगन के जे आई टी से बा ओकर धरम करम अमेरिका के कम्पनी से चलेला )

रउवा गिनती मे दु गो कम्पनी भेटाईल ह आ हम जोडावे लागब , मन्युफैक्चरिंग से ले के आई टी से ले के , हास्पिटालिटी से ले के , कपडा उद्योग जगत से ले के इंफ्रास्ट्र्कचर से ले के त अनेको कम्पनी भेटईहन स जवनन के नाव रउवा लेत नईखी आ डो केमिकल आ एनरान के चट दे नाव ले लेनी ह ।

अपना कमी के सुधारे के चाही पलानी के घर बा त पाका के बनावे के चाही बाकी एकर माने ई ना भईल की जवना चीझु से किसानन के पुरा फायदा होत बा जवना चीझु से बिचौलिया लोगन के पाता साफ होत बा ओह के बिरोध !

एफ डी आई के बिरोध माने किसानन के नीमन भविष्य के बिरोध आ बिचौलियन के समर्थन के एगो ज्वलंत उदाहरण बा आ ई देखा रहल बा की भारत मे आजुओ लोग किसानन के बिरोध कवना हद ले जा के कई सकेला ।

खैर भारत ह कईसहु सम्हरी के ठाड हो जाला ! आ किसानन के त खाली एक हाली कविता मे कृषक देवता आ ग्राम्य देवता कहाईल बा बाकी समय त सगरे से लतियावले गईल बा !

अभी अंजोर होखे मे ताईम बा !

चन्द्रप्रकाश जी एगो अउरी आंकडा देखि ली ! आ ई उ छेत्र ह जहवा एफ डी आई के कवनो इफेक्ट नईखे परे वाला ।

छोटे शहरों के कंधों पर विकास:नील्सन

भारत के आर्थिक विकास के बारे में माना जाता रहा है कि उसकी गाड़ी का इंजन मेट्रो और अन्य बड़े शहर हैं मगर अब कहा जा रहा है कि उसे दिशा और गति छोटे शहर देंगे.

स्वतंत्र संस्था नील्सन के सर्वेक्षण में कहा गया है कि एक से दस लाख की आबादी वाले चार सौ शहरों में दस करोड़ मध्यम वर्ग के लोग हैं और वर्तमान में ये आबादी भारत में हाथो हाथ बिकने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की 20 फ़ीसदी खपत करती है.

इस समय भारत में तेज़ी से बिकने वाली इन उपभोक्ता वस्तुओं का बाज़ार 287 अरब रूपए का है, जो कि 2026 तक चार खरब रूपए का हो जाएगा.

इसका मतलब ये हुआ कि आने वाले समय में भारत की आर्थिक वृद्धि की रफ़्तार अगर कोई तय करेगा तो वो मध्यम वर्ग ही होगा, न कि बड़े शहरों का उच्च या उच्च मध्यम वर्ग.

मध्यमवर्गीय भारत 

सर्वे में पाया गया कि 2002 से भारत के छोटे शहरों में उपभोक्ता वस्तुओं का बाज़ार साढ़े तीन गुना बढ़ चुका है. पूरे भारत के लिए ये आंकड़ा 3.2 फ़ीसदी का है.

हाथों हाथ बिकने वाले 81 उपभोक्ता वस्तुओं की खपत के मामले में 49 वस्तुएं ऐसी हैं जिनका इस्तेमाल पिछले दो सालों में छोटे शहरों के मध्यम वर्ग में काफ़ी बढ़ा है.

सर्वे के मुताबिक़ 2010 से मई 2011 तक एक से दस लाख की आबादी वाले इन शहरों में उपभोक्ताओं के ज़रिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामानों में काफ़ी वृद्धि हुई. सबसे ज़्यादा बिक्री चीज़(पनीर) में देखी गई.

अन्य सामानों में बच्चों के इस्तेमाल में आने वाले डायपर, पैकटबंद चावल, आफ़्टरशेव लोशन, नारियल का तेल , शेविंग के सामान, सौंदर्य प्रसाधन, बैटरी, शीशा साफ़ करने वाला तरल , साबुन , केक, च्वयनप्राश, कफ़ सीरप, कंडोम , डिब्बाबंद चाय, एंटीसेप्टिक क्रीम, बेबी ऑयल, बिस्कुट, ग्लूकोज़ पाउडर जैसे सामान शामिल हैं.

सर्वे के मुताबिक़ चार सौ शहरों में सिर्फ़ पिछले तीन सालों में प्रति शहर 250 से ज़्यादा नए स्टोर खुले हैं.

जून 2008 में एक से दस लाख की आबादी वाले शहरों में आठ लाख 23 हज़ार स्टोर थे, जिनकी संख्या मई 2011 मे बढ़ कर नौ लाख 26 हज़ार तक पहुँच गई.

औसत के लिहाज़ से देखा जाए तो प्रति शहर 250 स्टोर की बढ़ोत्तरी हुई.

सबके पास मोबाइल फ़ोन

सर्वे में पाया गया कि छोटे शहरों के मध्यम वर्गीय परिवारों में मोबाइल का इस्तेमाल काफ़ी बढ़ा है.

सिर्फ़ कुल आबादी के छह फ़ीसदी हिस्से के पास ही अपना निजी फ़ोन नही है.

घर के फ़ोन की जगह अब मोबाइल फ़ोन ने ले ली है. यहाँ तक कि हर गृहणी के पास भी मोबाइल फ़ोन है. साथ ही मनोरंजन के लिए केबल टीवी का वर्चस्व है.

सोशल मीडिया

आश्चर्यजनक रूप से 78 फ़ीसदी छोटे शहरों की मध्यम वर्गीय आबादी ने कभी भी इंटरनेट का इस्तेमाल नही किया, लेकिन जिनके पास इंटरनेट उपलब्ध है उन्हें सोशल नेटवर्किंग, माइक्रोब्लॉगिंग साइटों की भरपूर जानकारी थी.

सर्वे का आधार

नील्सन संस्था ने ये सर्वे भारत के चार शहरों में किया जिसमें 25 से 30 साल की उम्र की कामकाजी महिलाओं,18 से 24 साल के युवक- युवतियों और 35 से 40 साल के कामकाजी पुरूषों से बात की गई.

ये सर्वे पंजाब के भटिंडा , आंध्र प्रदेश के अनंतपुर , महाराष्ट्र के नांदेड़, उत्तर प्रदेश के झांसी और महाराष्ट्र के पुणे में किया गया. इन शहरों में पुणे शहर को मध्यम वर्ग के लिए मानक शहर माना गया.

नील्सन के सर्वे में इन छोटे मध्यम वर्गीय शहरों में रहने वाले लोगों की जीवनशैली और उपभोक्ता वस्तुओं के इस्तेमाल की बदलती आदतों का अध्ययन किया गया.

सर्वे में पाया गया है कि यहाँ का मध्यम वर्ग बेहतर आमदनी के चलते उपभोक्ता वस्तुओं के इस्तेमाल अब ज़्यादा करने लगा है.

और बढ़ते मध्यम वर्ग की बढ़ती क्रय क्षमता की वजह से इन उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों की नज़र इस आकर्षक बाज़ार पर है.

स्रोत - http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/12/111215_middle_india_survey...

नवीन जी, जय भोजपुरी, अगर इ सब सिर्फ कागज प् ना जमीनी स्तर पर होखे तबे किसानन के फायदा होई. का अपना देश के सरकार में एतना राजनैतिक इछाशक्ति बा की उ इ सब करवा ली? हम फिर से भोपाल गैस त्रासदी के जिम्मेदार कंपनी के जिक्र करब . का भईल ओकर? ओकरा मालिक के त मध्य प्रदेश से भागे में अर्जुन सिंह आ देश से भागे देबे में केन्द्र सरकार सहजोग कईलस. आ इ सब केकरा इशारा प भईल सब जानता. देखि, बिदेशी कम्पनी के इच्छा या मनसा जे भी होखे हमरा अपना सरकार की दृढ़ता आ राजनैतिक इछाशक्ति पर शक बा. आ इ शक भूतकाल में घटल घटना से बरियार हो रहल बा.

राउर ऊपर लिखल बात सच हो जाऊ त के ना खुश होई? आपके ए बात में दम बा. हालाँकि बतिया तबो निकली के आवत रहे, बाकिर  एतना प्रतिक्रिया, हंगामा (“जनता के थुकल” वास्तव में बरियार आ उचित संज्ञा बा.) जागरूकता, आंदोलन के बावजूद बतिया त उहें रही जाता. सरकार के सेहत पर तनिको फरक नईखे पडत. उल्टा गलत नीति के चलते सामाजिक विषमता (गरीबी अमीरी के बिच के खाई) और गहिर हो जा रहल बा.

भारतीय लचर ब्यवस्था, लालफीताशाही, कमजोर राजनैतिक इच्छा शक्ति , व्यक्तिगत राजनैतिक हित, नपुंसकता की हद तक के नजरअंदाज करे वाला आदत से डेरा के हाथ प हाथ ध के बैठे के बात नईखे, चौतरफा दबाव बना के आपन विकास करे के बा.

दया आ खैरात के बात (फेरु राउर नैनो के राउर लुलु के कईसे केहु चलावे दी अपना किहा ?) इ लाइन पढ़ी के आयिल ह. एतना जल्दी निष्कर्ष पर मती पहुंची. हम सरकारी नीति आ नियत के विरोध में बानी. हम केहू के इ नइखी कहत की देश विरोध करो. इ हमार व्यक्तिगत राय बा. का केहू के व्यक्तिगत राय राखे के अधिकार नईखे ? काहे की रिटेल से आम आदमी के जिनिगी पर फरक पड़े वाला बा, नाकि आई टी कम्पनी से.

रउवा कवना सन्दर्भ में नाव जोड़ाइब ? तनि स्पष्ट करी. हमार संदर्भ बा हमार बतावल कंपनी के नियत आ नैतिकता ( एमे एगो कंपनी निवेश कईलस, कमईलस, मुववलस आ हाथ झारी के सरकारी संरक्षण में निकल भी गईल.) बस एहिजा पूरा झोल बा. विदेशी कंपनीन के जबाबदेही के निर्धारित करी?करार के क्रियानव्यन के करवाई?

हम कब ऐसे अलग राय राखत बानी. लेकिन सुनहरा शब्द जाल के झांसा में भी त ना आवे के चाही.

महाराज रउवा त निष्कर्ष पर पहुंची गईनी. फैसला भी सुना दिहनी , एकर मतलब चर्चा खतम.

अब रउवा सही मुद्दा के धइनी ह. जब एतना संभावना , एतना अवसर, उपभोक्ता,उत्पाद , संसाधन, श्रम , देश में बा, त एतना सब कुछ दूसरा के आगे काहे परोसल जाऊ. सब हमनिये का काहे ना करी जा. एतना निमन अवसर दूसरा के काहे दिहल जाऊ. काहे दूसरा के भरोसे किसान आ देश के उद्धार के आस लगावल जाऊ. सरकार के नीतिगत समस्या के चलते कुमार मंगलम बिड़ला, अजय पिरामल जईसन उद्योगपति आपन व्यापार देश के बाहर बढ़ावें के बारे में सोचल शुरू क देले बा लोग. सरकार भारतीय उद्योगपति के सहजोग दे के खुद इतना लमहर बाजार के लाभ काहें नईखे उठावे देत?ए सब कंपनी ओतना बड त नईखे लेकिन धीरे धीरे सब ठीक हो जाई. अंत में इहे कहब की समस्या बहुत बा अपना देश में, सम्भावना भी बहुत बा अपना देश में, समस्या के उपाई देशे में खोजे के पड़ी. अगर विदेशी कंपनीन से भविष्य में एकाधिकार से बचे के बा त. शायद आप के पता होई हिलेरी क्लिंटन के एगो बरियार शेयर बा वालमार्ट में उहो बड़ा जोर दे ताड़ी भारत सरकार पर.

(हम जवाब आपके प्रतिक्रिया के प्रश्न के आधार पर पैराग्राफ के हिसाब से लिखले बानी)

चन्द्रप्रकाश जी नीयत आ नैतिकता के बात जब होखे लागी नु त एगो कम्पनी चाहे उ भारत के होखे भा बिदेश के ना भेटाई ।

ना हम फैसला सुनावत बानी आ ना निषकर्ष प पहुंचल बानी , बाकी हम इहे देखावत बानी की राउर बिरोध के आधार छन छन मे बदलत बा ! रउवा कहा से कहा आ गईनी , माने जगहि छोडत आ अभी ले रउवा किलियरे ना भईनी की काहे ओकनी के बिरोध कईल जाउ ।

हमरा देखे से बिरोध के एक ही कारन बा की उ बिदेशी कम्पनी हई स बाकी दोसर कवनो कवनो कारन नईखे लउकत ।

लेकिन हम अतने कहब की जब एकनी के बिरोध एह से होत बा त की ई बिदेशी हई स त बकिया के काहे कोरा मे बईठावल गईल बा ।

नैतिकता आ नियत के दुहाई ओह घरी ना रहे का ?

आजु के डेट मे एगो बाबा के जग मे सैकडन लोग मुअत बा , केहु बा अंगुरी उठावे वाला ? हम एजुगा सरकार के पछ राखे खाति नईखी , रउवा हीक भर सरकार के गरियाई हमरा ओह से कुछ नईखे लेबे देबे के बाकी मुद्दा जवन बा ओह प हम आपन बात जरुर कहब हम सिक्का के दुनो ओरि देखब आ तबे आपन बात कहब ! आजु के बैश्विक जुग मे जब बात बाजार के होई त मय चीझु के देखे के परी । एगो के कोरा मे आ एगो के लतियावे वाला हिसाब किताब ना होखे के चाही !

काहे दोसरा के परोसल जाउ , सवाल सही बा , बाकी ई बताई का देश वाली कम्पनी लो प रोक लागल बा ? का देश वाली कम्पनी प ई बांड धराईल बा की तहरा कोल्ड स्टोरेज आ इफ्रास्ट्रक्चर मे हतना पईसा लगावे के परी ? जब ई कुल्हि बांड नईखे धराईल त एकरा माने भईल का ? काहे टाटा बिला गईल बिआ ? टाटा आजुओ टक्कर देत बिआ की ना ? आ उहो बिना सब्सिडी के त फेरु ?

अवसर सोझा बा , 10 गो ले कम्पनी पहिलही से ओह फिल्ड मे बाडी स अब का चाहत बानी ?

नाव जोडावे के हर सन्दर्भ मे आई टी से ले के हास्पिटालिटी ले हर सन्दर्भ मे जी !

काहे आजु रिटेल मे रउवा अवसर के तिकवत बानी आ बाकी छेत्र मे जहवा हनहनाई के कम्पनी आईल बाडी स ओह मे रउवा अवसर के ना देखनी ? ई त साफा साफी पार्सियलिटी नु भईल जी ?

का भारत मे डो केमिकल ही आजु ले एगो बिदेशी कम्पनी आईल बिआ ? आ की खलिहा एनराने आईल बिआ ? एह दुनो के अलावा भारत मे कवनो अउरी कम्पनी ना अईली स का ?

ई कुल्हि हेने होने भटकावे वाला बात बा , साफ साफ बात ई बा की जब वैश्विक बाजार मे उतरल बानी त अपना के मजबुत करे के परी आ जईसे हम कहनी ह की भारतीय कम्पनी भारत से बहरी टक्कर दे सकेली स त भारतो मे दे सकेली स आ एह बात के गवाह लु लु बा आ भारत मे पहुलही से रिलायंस फ्रेश आ बिग बाजार आपन भाव बनवले बा !

हम जवाब पैराग्राफ के आधार प नईखी देहले , राउर मय पोस्ट के लबो लुआब अभी ले ना बुझाईल की रउवा काहे बिरोध करत बानी !

एक हाली फेरु से मय पढी आपन आ हमार बात ! आ सत्संग वाली बात से बहरीनिकल के एक हाली देखी !

मय चीकने हो जाई त कहे के ना रहल ह ! नीमन बाउर समाज के हिस्सा ह आ एह के कई से सामजस्य आ बैलनेस आ नीमन के कईसे बेसी कईल जा सकेला ई सोचे के चाही ! एगो के धई के लटकल रही आदमी त लटकले रही जाई ।

आ स्वदेशी अपनावल सबसे जरुरी चीझु बा ठीक ओइसही जईसे भोजपुरी के जन जन के अपनावल आ एह खाति जमीन प उतरे के परी लागे के परी लोगन के नाफा नुकसान बतावे के परी आ जब एह मे सफल हो जाईल जाई त बिदेशी का मय लोग परा जाई ! बाकी तोशिबा , वायो , लेनेवो , एच पी के लैपटाप रही त बिदेशी प ठेहा लगावही के परी ।

सुननी ह आकाश मे भी आधवा से बेसी सामान चीनी बा !

खैर ... रउवा आपन विरोध जारी राखी हमरा दिमाग आ जतना हमार दिमाग बा ओह हिसाब से हम आप बात कहनी ह हमरा बात के कवनो शब्द से कवनो लाईन से रउवा कवनो तरह के कष्ट पहुंचल होई त हम क्षमा प्रार्थी बानी बाकी अंतिम बात हम जरुर कहब

सबेरे उठला से ले के राति खा सुतला तकले शहर मे रहे वाला 100 परसेंट लोग सबसे बेसी बिदेशी सामान के प्रयोग करेला ! ई बात ओतने सत्य बा जतना सुरज के पुरब मे उगल !

जय भोजपुरी

धन्यवाद आ हमरा ओरि से बस अतने :-)

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